हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस राकेश कैंथला ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि पारंपरिक बहुपति प्रथा (जोड़ीदारी व्यवस्था) के तहत यदि किसी संयुक्त पति (भाई) की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी संपत्ति का अधिकार उसके जीवित संयुक्त पति (भाई) को मिलता है, न कि उसकी संतानों को। कोर्ट ने कहा कि जब तक विवाह में शामिल सभी भाई जीवित रहते हैं, तब तक उनकी संतानों को संपत्ति में कोई अधिकार या विभाजन मांगने का हक नहीं होता। इस निष्कर्ष के साथ हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखते हुए नियमित दूसरी अपील (RSA) को खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद शिमला जिले के रोहड़ू तहसील स्थित पैतृक भूमि से जुड़ा है। मामले के अनुसार, दो भाइयों (संयुक्त पतियों) ने एक ही महिला से साझा विवाह किया था। दोनों भाइयों ने एक-दूसरे के पक्ष में ‘इज़ादीनामा’ (स्वीकृति पत्र) निष्पादित कर संपत्ति का संयुक्त स्वामित्व कायम किया था।
वर्ष 1935 (1992 विक्रमी संवत) में एक संयुक्त पति की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद राजस्व अधिकारियों ने वरासत का उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) जीवित संयुक्त पति के नाम दर्ज कर दिया।
मृतक संयुक्त पति के वंशजों (वादियों) ने बाद में दीवानी मुकदमा दायर कर यह दावा किया कि वे मृतक के हिस्से की संपत्ति के पूर्ण रूप से हकदार हैं और जीवित संयुक्त पति की संपत्ति में भी 1/5वें हिस्से के हकदार हैं। उन्होंने पूर्व में हुए एक पारिवारिक बंटवारे को शून्य घोषित करने और संपत्ति में हस्तक्षेप रोकने की मांग की।
पक्षों के तर्क
वादी पक्ष ने तर्क दिया कि विवादित भूमि मिताक्षरा हिंदू कानून से शासित संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति है। उन्होंने कहा कि उनके नाबालिग होने के दौरान उनकी मां द्वारा किया गया पारिवारिक बंटवारा उनके ऊपर बाध्यकारी नहीं है और वे अपने पिता के हिस्से को प्राप्त करने के हकदार हैं।
दूसरी ओर, प्रतिवादी पक्ष ने मुकदमे की maintainability और limitation पर सवाल उठाते हुए कहा कि मामला स्थानीय प्रथागत कानून (Customary Law) से शासित होता है। उन्होंने कहा कि साझा विवाह के कारण म्यूटेशन नियमानुसार जीवित संयुक्त पति के नाम दर्ज किया गया था। इसके अलावा, पक्षों की सहमति से 18 वर्ष पूर्व बंटवारा हो चुका था जिस पर अमल भी किया जा चुका था, इसलिए मुकदमा समयसीमा से बाहर था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने पाया कि चूंकि एक संयुक्त पति की मृत्यु 1935 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के लागू होने से पहले हुई थी, इसलिए उत्तराधिकार का मामला स्थानीय प्रथागत कानून से ही शासित होगा। अदालत ने शिमला पहाड़ी राज्यों से संबंधित ऐतिहासिक दस्तावेजों ‘पंजाब स्टेट गैजेटियर्स (1910)’ और डॉ. वाई.एस. परमार की पुस्तक ‘पॉलीएंड्री इन द हिमालयज (1975)’ का उल्लेख किया, जिनमें बशहर, किन्नौर और रोहड़ू क्षेत्रों में बहुपति प्रथा तथा ‘जेठोंग’ व ‘कांचोंग’ बंटवारे के नियमों का वर्णन है।
कोर्ट ने पूर्व निर्णय ‘प्रताप सिंह बनाम गुमान सिंह (2010)’ का हवाला देते हुए बहुपति विवाह में उत्तराधिकार के सिद्धांतों को रेखांकित किया:
“कई भाई मिलकर एक ही पत्नी से शादी करते हैं। उस साझा पत्नी से उत्पन्न संताने पूरे परिवार की संतानें मानी जाती हैं। बहुपति परिवार में, किसी एक भाई की मृत्यु पर, यदि उसके अन्य भाई जीवित हैं तो उसके बेटे उसकी संपत्ति के वारिस नहीं बनते। एक भाई दूसरे भाई का उत्तराधिकारी होता है, और जब सभी भाई मर जाते हैं तभी उनकी संताने संपत्ति की वारिस बनती हैं। चूंकि बहुपति परिवार में बेटों को सभी पिताओं की संतान माना जाता है, इसलिए जब तक सभी भाई जीवित हैं वे पितृहीन नहीं हो सकते। बेटों को भी आगे चलकर न केवल सामाजिक कारणों से बल्कि आर्थिक आवश्यकता के कारण संयुक्त रहना पड़ता है और साझा पत्नी रखनी पड़ती है। ये कारक परिवार के सदस्यों को संपत्ति के विभाजन या अलग होने का कोई अवसर या प्रोत्साहन नहीं देते…”
हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि बहुपति प्रथा में मिताक्षरा सहदायिकी (Coparcenary) का सिद्धांत लागू नहीं होता:
“यह स्पष्ट है कि जब एक भाई दूसरे भाई से उत्तराधिकार प्राप्त करता है और जब बेटों को पिछली पीढ़ी के जीवित रहने तक संपत्ति विरासत में पाने का अधिकार ही नहीं है, तो सहदायिकी की अवधारणा को पेश नहीं किया जा सकता। जोड़ीदारी व्यवस्था सहदायिकी की अवधारणा से पूरी तरह भिन्न है।”
कोर्ट का निर्णय
अदालत ने माना कि पारंपरिक मिताक्षरा हिंदू कानून की सहदायिकी के नियम बहुपति या जोड़ीदारी व्यवस्था पर लागू नहीं होते हैं। प्रथागत कानून के अनुसार, मृतक संयुक्त पति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति जीवित संयुक्त पति के पास ही स्थानांतरित हुई थी। चूंकि वादीगण के पास जीवित संयुक्त पति के जीवनकाल के दौरान उत्तराधिकार या विभाजन का दावा करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था, इसलिए उनका मुकदमा आधारहीन था। इन निष्कर्षों के साथ हाईकोर्ट ने नियमित दूसरी अपील खारिज कर दी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: शमशेर सिंह और अन्य बनाम चैन राम और अन्य
वाद संख्या: आरएसए नंबर 66/2008
पीठ: जस्टिस राकेश कैंथला
निर्णय की तिथि: 24 जुलाई 2026

