संपत्ति विवाद: कर्नाटक हाईकोर्ट ने बुजुर्ग महिला के खिलाफ आपराधिक मामला खारिज किया, कहा- सिविल मुकदमे में दबाव बनाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल गलत

कर्नाटक हाईकोर्ट ने संपत्ति के पारिवारिक विवाद में एक 73 वर्षीय विधवा और उनकी बड़ी बेटी के खिलाफ दर्ज आपराधिक केस को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दीवानी (सिविल) मामलों में अनुचित लाभ उठाने या दबाव बनाने के लिए आपराधिक कानून को हथियार नहीं बनाया जा सकता।

जस्टिस एम नागप्रसन्ना की पीठ ने 21 जुलाई के अपने आदेश में सिंगापुर में रह रही छोटी बेटी एम वी श्रुति (48) द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर को खारिज कर दिया। इस फैसले से 73 वर्षीय एम वी मैथिली और उनकी 50 वर्षीय बड़ी बेटी एम वी स्मिता को बड़ी राहत मिली है।

सिविल मुकदमे के बाद दर्ज कराया गया आपराधिक मामला

यह पूरा विवाद मैथिली के दिवंगत पति वसंत रंगन की संपत्ति के बंटवारे से जुड़ा है, जिनका 2015 में निधन हो गया था। वसंत रंगन अपने पीछे कई चल और अचल संपत्तियां छोड़ गए थे। छोटी बेटी श्रुति ने इस संपत्ति में अपने हिस्से का दावा करते हुए पहले बेंगलुरु की एक सिविल अदालत में बंटवारे का मुकदमा दायर किया था।

हालांकि, सिविल मामला लंबित रहने के दौरान ही उन्होंने 22 अक्टूबर 2025 को अपनी मां और बहन के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। इसमें आरोप लगाया गया कि उनकी सहमति के बिना संपत्ति के खाता (Khata) दस्तावेजों में हेरफेर किया गया, फर्जी दस्तखत किए गए और अनधिकृत लेन-देन को अंजाम दिया गया।

READ ALSO  यूरिनेशन का मामला: हाई कोर्ट ने डीजीसीए को अपीलीय पैनल बनाने का निर्देश दिया जहां अपराधी उड़ान प्रतिबंध की अपील कर सकता है

उत्पीड़न और सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में पेश हुईं अधिवक्ता तेजस्विनी जी ने बताया कि अकेले रहने वाली बुजुर्ग मां को आपराधिक शिकायत दर्ज होने के बाद लगातार मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। बचाव पक्ष ने अदालत को कुछ तस्वीरें भी सौंपीं, जिनमें बुजुर्ग महिला के घर के आसपास संदिग्ध लोग मंडराते दिखाई दे रहे थे। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि बार-बार पुलिस के आने-जाने से महिला के भीतर सुरक्षा के बजाय भय का माहौल बन गया था।

READ ALSO  कोर्ट ने 2014 के बलपरा गांव हमले के मामले में NDFB के उग्रवादी को उम्रकैद की सजा सुनाई है

इसके साथ ही, बुजुर्ग मां द्वारा अपनी सुरक्षा की गुहार लगाते हुए बेंगलुरु के पुलिस आयुक्त, राज्य मानवाधिकार आयोग और वरिष्ठ नागरिक हेल्पलाइन को भेजे गए ज्ञापनों का भी अदालत में हवाला दिया गया।

दूसरी ओर, शिकायतकर्ता श्रुति के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि पुलिस जांच अभी शुरुआती चरण में है, इसलिए मामला रद्द करना जल्दबाजी होगी।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि जब मामला मुख्य रूप से उत्तराधिकार और संपत्ति बंटवारे से जुड़ा है, तो यह पूरी तरह से सिविल कानून के दायरे में आता है। अदालत ने कहा कि जब विवाद पहले से ही सिविल कोर्ट में विचाराधीन है, तब पुलिस को शामिल कर आपराधिक प्रक्रिया शुरू करना एक निजी पारिवारिक मामले में अनावश्यक हस्तक्षेप है।

जस्टिस नागप्रसन्ना ने उल्लेख किया कि बुजुर्ग मां द्वारा विभिन्न प्राधिकारियों को दी गई शिकायतों से यह स्पष्ट होता है कि वे अपने जीवन और सम्मान पर बने खतरे से भयभीत थीं। यह स्थिति केवल पारिवारिक मतभेद के कारण नहीं, बल्कि पुलिस कर्मियों और अज्ञात व्यक्तियों की संलिप्तता से उत्पन्न हुई थी।

अदालत ने कहा कि यदि छोटी बेटी को अपने पिता की संपत्ति में कानूनी अधिकार चाहिए, तो उसका सही मंच सिविल कोर्ट ही है, जहां वह पहले ही जा चुकी हैं।

READ ALSO  गैर-इकबालिया बयान एक मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज नहीं किया जा सकता है जब तक कि संबंधित व्यक्ति को जांच अधिकारी द्वारा पेश या प्रायोजित नहीं किया गया हो: उड़ीसा हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि मामले के तथ्य प्राथमिक रूप से बुजुर्ग मां को अपनी ही बेटी के खिलाफ झूठी मुकदमेबाजी (मलिशियस प्रॉसिक्यूशन) का केस दर्ज करने का आधार प्रदान करते हैं, हालांकि इसका अंतिम निर्णय मां के विवेक पर निर्भर करेगा। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि लंबित सिविल मुकदमे के बीच दर्ज कराई गई यह आपराधिक कार्रवाई कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इसे जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles