भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट्स में जजों के खिलाफ मिलने वाली शिकायतों की निष्पक्ष जांच और त्वरित निपटारे के लिए एक बेहद मजबूत, जवाबदेह और समयबद्ध आंतरिक व्यवस्था पहले से स्थापित है।
सोमवार को राजधानी में ‘जस्टिस सीन टू बी डन: ट्रांसपेरेंसी एंड पब्लिक ट्रस्ट एज पिलर्स ऑफ द लीगल सिस्टम’ विषय पर आयोजित छठे राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर को संबोधित करते हुए सीजेआई ने कहा कि प्रशासनिक सुधार एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी संस्था जड़ या बदलावहीन रहकर न तो टिक सकती है और न ही इस पर गर्व कर सकती है।
कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी और हरीश साल्वे द्वारा न्यायपालिका के प्रशासनिक सुधारों और जवाबदेही से जुड़े उठाए गए अहम सवालों के संदर्भ में सीजेआई ने यह बात कही। इस दौरान महेश जेठमलानी ने दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास से बेहिसाब नकदी मिलने के मामले का उल्लेख किया था। जस्टिस वर्मा के आवास से पिछले साल कथित तौर पर जले हुए नोटों के बंडल मिलने के बाद उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में महाभियोग की कार्यवाही चल रही थी, जिसके बाद उन्होंने इसी साल अप्रैल में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
सार्वजनिक मंच बनाम आंतरिक जवाबदेही
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि सुधार न्यायपालिका की कार्यप्रणाली का मुख्य नियम होना चाहिए, लेकिन कुछ संवेदनशील मुद्दों पर सार्वजनिक मंचों से बयानबाजी करना व्यावहारिक नहीं होता। उन्होंने बताया कि किसी भी कानूनी विवाद में चाहे अंतरिम निर्देश जारी किया जाए या फिर अंतिम फैसला सुनाया जाए, जजों को हर स्तर पर असंतुष्ट पक्षों की शिकायतों का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि यह एक बेहद गंभीर और विचारणीय पहलू है कि क्या हर शिकायत को किसी वेबसाइट या सार्वजनिक पोर्टल पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि इसके बजाय न्यायपालिका के पास ऐसी शिकायतों की निष्पक्षता, तटस्थता और पूरी जिम्मेदारी के साथ पड़ताल करने वाला एक मजबूत आंतरिक तंत्र होना चाहिए। उन्होंने आश्वस्त किया कि यह व्यवस्था पूरी तरह स्थापित है और इसमें समय-समय पर गुणवत्तापूर्ण सुधार जारी रहते हैं।
न्यायिक आलोचना और वास्तविक पारदर्शिता
अदालतों की सार्वजनिक समीक्षा पर बात करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया आदेश का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका आलोचना से परे नहीं है और न ही इसे आलोचना से बचना चाहिए। न्यायिक कामकाज पर निष्पक्ष, तथ्यपरक और रचनात्मक टिप्पणी एक जीवंत संवैधानिक लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है, जिससे संस्थागत जवाबदेही और आत्म-सुधार को बल मिलता है। उन्होंने कहा कि कोई भी अदालत खुद को जांच-परख से दूर रखकर जनविश्वास हासिल नहीं कर सकती।
पारदर्शिता के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करते हुए सीजेआई ने कहा कि इसका मतलब केवल अदालत के दरवाजे खुले रखने या खुली सुनवाई तक सीमित नहीं है। असली पारदर्शिता तब मानी जाती है जब किसी फैसले के अंतिम परिणाम के साथ-साथ उसके पीछे दिए गए कानूनी तर्कों को भी कोई भी व्यक्ति देख और समझ सके, विशेष रूप से वह पक्ष जिसके खिलाफ फैसला सुनाया गया हो। यदि कोई अदालत केवल आदेश देती है और उसके पीछे के तर्कों को स्पष्ट नहीं करती, तो वह वास्तव में पारदर्शी नहीं है।
जनविश्वास लोकप्रिय फैसलों से नहीं, निष्पक्ष प्रक्रिया से हासिल होता है
सीजेआई ने कहा कि जनता का भरोसा और जन-स्वीकृति या लोकप्रियता दो भिन्न विषय हैं। अदालतें लोगों की पसंद के नतीजे देकर या लोकप्रियता हासिल करके सम्मान नहीं कमातीं। अदालत के प्रति वास्तविक भरोसा तब कायम होता है जब मुकदमा हारने वाला पक्ष भी यह विश्वास लेकर बाहर निकले कि उसके मामले का फैसला पूरी तरह न्यायसंगत और निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत हुआ है।
ई-कोर्ट्स के जरिए अदालतों की दूरी पाटने की पहल
न्याय तक आम आदमी की पहुंच का जिक्र करते हुए सीजेआई ने स्वीकार किया कि पारंपरिक अदालती प्रक्रियाएं ऐतिहासिक रूप से काफी जटिल रही हैं, जिनका झुकाव अक्सर उन संपन्न लोगों की तरफ रहा है जो महंगे और विशेषज्ञ वकीलों की सेवाएं ले सकते थे। उन्होंने कहा कि इस जमीनी सच्चाई को ईमानदारी से स्वीकार करना ही वास्तविक बदलाव की दिशा में पहला कदम है।
उन्होंने बताया कि ई-कोर्ट्स परियोजना के माध्यम से न्यायपालिका और नागरिकों के बीच की यह दूरी अब तेजी से घट रही है। हालांकि, उन्होंने सचेत किया कि यदि समय पर न्याय न मिले, तो न्याय तक पहुंच का कोई खास महत्व नहीं रह जाता। सीजेआई ने कहा कि जनता का भरोसा ही वह एकमात्र पूंजी है जिस पर न्यायपालिका का अधिकार और उसका अस्तित्व टिका है।
संबोधन के दौरान सीजेआई ने वरिष्ठ अधिवक्ता स्वर्गीय राम जेठमलानी को श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें भारतीय न्यायशास्त्र का ऐसा दिग्गज बताया जिनका जीवन पूरी तरह कानून के विकास से जुड़ा रहा।

