केवल आपराधिक मामला लंबित होने पर पासपोर्ट से इनकार नहीं किया जा सकता, विदेश यात्रा की अनुमति पर फैसला आपराधिक अदालत करेगी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया कहा है कि केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति का पासपोर्ट जारी करने, नवीनीकृत करने या दोबारा जारी करने से इनकार नहीं किया जा सकता कि उसके खिलाफ आपराधिक मामला लंबित है। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट रखना और विदेश यात्रा की अनुमति मिलना दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। विदेश जाने की अनुमति पर फैसला संबंधित आपराधिक अदालत कर सकती है।

हाईकोर्ट ने मोहम्मद आफताब की याचिका पर रीजनल पासपोर्ट ऑफिसर, लखनऊ को अंतरिम निर्देश दिया कि वह सुप्रीम कोर्ट के महेश कुमार अग्रवाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता के पासपोर्ट आवेदन पर विचार करे।

दो आपराधिक मामलों के कारण रोका गया था पासपोर्ट

याचिकाकर्ता का कहना था कि उसके खिलाफ दो आपराधिक मामले लंबित होने के कारण रीजनल पासपोर्ट ऑफिसर, लखनऊ उसका पासपोर्ट रोक रहा है।

पहला मामला वर्ष 2024 का है, जो प्रयागराज के करेली थाने में आईपीसी की धाराओं 147, 148, 149, 323, 341, 504, 506 और 307 के तहत दर्ज किया गया था। याचिकाकर्ता ने इसे बिना किसी चोट वाला मामला बताते हुए खुद को झूठा फंसाए जाने का दावा किया था। इस मामले में उसे जमानत मिल चुकी है।

दूसरा मामला भी वर्ष 2024 में करेली थाने में आईपीसी की धाराओं 147, 387, 447, 323 और 427 के तहत दर्ज हुआ था। याचिकाकर्ता ने उस मामले की कार्यवाही को बीएनएसएस की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने 18 दिसंबर 2025 के आदेश में प्रथम दृष्टया विवाद को दीवानी प्रकृति का मानते हुए आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।

पासपोर्ट मिलना और विदेश जाना अलग-अलग बातें

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बेंच ने कहा कि केवल पासपोर्ट मिल जाने से किसी व्यक्ति को स्वतः विदेश जाने का अधिकार नहीं मिल जाता। दूसरे देश में जाने के लिए वीजा और आव्रजन संबंधी अन्य औपचारिकताओं का पालन करना भी जरूरी होता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहा कोई व्यक्ति विदेश जाना चाहता है, तो पुलिस या अभियोजन एजेंसी संबंधित अदालत के सामने जाकर उसके पासपोर्ट को जमा कराने या विदेश यात्रा पर रोक लगाने की मांग कर सकती है।

ऐसे मामलों में आपराधिक अदालत परिस्थितियों के अनुसार विदेश यात्रा की अनुमति दे सकती है, शर्तें लगा सकती है या अनुमति से इनकार भी कर सकती है।

बेंच ने कहा:

“पासपोर्ट जारी करने का चरण वह चरण नहीं है, जब याचिकाकर्ता विदेश यात्रा करने का प्रयास कर रहा हो। पासपोर्ट मूल रूप से एक नागरिक दस्तावेज है, जिसका नागरिक कानून के तहत हकदार है और प्रथम दृष्टया केवल इस आधार पर पासपोर्ट से इनकार करना पासपोर्ट अधिकारियों का काम नहीं है कि कोई आपराधिक मामला लंबित है।”

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति अपने पासपोर्ट आवेदन में लंबित आपराधिक मामले की जानकारी छिपाता है तो स्थिति अलग हो सकती है। वर्तमान मामले में ऐसा कोई आरोप नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट के महेश कुमार अग्रवाल फैसले पर भरोसा

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले महेश कुमार अग्रवाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का उल्लेख किया। बेंच ने कहा कि आपराधिक मामला लंबित होने मात्र के आधार पर पासपोर्ट के नवीनीकरण या दोबारा जारी करने से इनकार करना प्रथम दृष्टया सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय कानून के विपरीत दिखाई देता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में कहा था:

“वैध पासपोर्ट रखने और विदेश यात्रा करने के कार्य के बीच अंतर बनाए रखना महत्वपूर्ण है।”

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जमानत पर चल रहे या मुकदमे का सामना कर रहे व्यक्ति को वास्तव में देश छोड़ने की अनुमति दी जाए या नहीं, यह तय करना आपराधिक अदालत का काम है। अदालत यात्रा की अनुमति दे सकती है, शर्तें लगा सकती है, आश्वासन मांग सकती है या पूरी तरह अनुमति देने से इनकार कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि केवल इस आशंका के आधार पर पासपोर्ट नवीनीकरण से इनकार करना कि व्यक्ति उसका दुरुपयोग कर सकता है, पासपोर्ट प्राधिकरण द्वारा आपराधिक अदालत के जोखिम आकलन पर दोबारा फैसला करने जैसा होगा।

फैसले में पासपोर्ट अधिनियम की धारा 6(2)(f) को हर लंबित आपराधिक मामले में पूर्ण प्रतिबंध की तरह लागू करने के दृष्टिकोण को भी अस्वीकार किया गया था।

केंद्र ने पुराने इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसले का दिया हवाला

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता अनुपमा पराशर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के पुराने डिवीजन बेंच फैसले पवन कुमार राजभर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य पर भरोसा किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि सामान्य स्थिति में यदि वह उस पुराने फैसले से असहमत होता, तो मामला बड़ी बेंच को भेजने का प्रश्न उठ सकता था। लेकिन पवन कुमार राजभर के बाद सुप्रीम कोर्ट का महेश कुमार अग्रवाल फैसला आ चुका है। इसलिए बड़ी बेंच को संदर्भित करने की आवश्यकता नहीं है।

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रीजनल पासपोर्ट ऑफिसर को आवेदन पर विचार करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने याचिका को विचार के लिए स्वीकार करते हुए प्रतिवादियों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया। मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर 2026 को तय की गई।

स्टे आवेदन पर कोर्ट ने रीजनल पासपोर्ट ऑफिसर, लखनऊ को अंतरिम निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के पासपोर्ट आवेदन पर सुप्रीम कोर्ट के महेश कुमार अग्रवाल फैसले को ध्यान में रखते हुए विचार करे।

वैकल्पिक रूप से, पासपोर्ट अधिकारी को अगली तारीख तक जवाबी हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा गया कि इस अंतरिम निर्देश को अंतिम क्यों न कर दिया जाए।

कोर्ट ने रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) को आदेश दिया कि वह 24 घंटे के भीतर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ के माध्यम से यह आदेश रीजनल पासपोर्ट ऑफिसर को भेजें।

केस विवरण

केस टाइटल: मोहम्मद आफताब बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य

केस नंबर: रिट-सी नंबर 36603 ऑफ 2026

बेंच: जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला

तारीख: 14 सितंबर 2026

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