बिना सोचे-समझे प्रिवेंटिव डिटेंशन पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्ती, केंद्र सरकार से प्रक्रियात्मक खामियां सुधारने की अपील

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े मामलों में बिना सोचे-समझे प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत) आदेश जारी करने पर कड़ा ऐतराज जताया है। अदालत ने कहा कि न्यायिक हिरासत में पहले से बंद आरोपी पर बिना किसी ठोस आधार के डिटेंशन कानून लागू कर देना सही नहीं है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने आपराधिक न्याय प्रणाली के व्यापक हित में केंद्र सरकार से इस प्रक्रियात्मक खामी को जल्द से जल्द दुरुस्त करने का आग्रह किया है।

जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने एनडीपीएस कानून के तहत आरोपी गुरमेल सिंह की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने प्रिवेंशन ऑफ इलिसिट ट्रैफिक इन नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस (PIT-NDPS) एक्ट, 1988 की धारा 3(1) के तहत जारी निवारक हिरासत आदेश को रद्द कर दिया और आरोपी को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।

बिना ठोस सबूत के हिरासत आदेश जारी करने पर सवाल

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अदालत के सामने आई जानकारी के मुताबिक, गुरमेल सिंह के खिलाफ 2 जनवरी 2026 को प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश जारी किया गया था। उस समय वह एनडीपीएस से जुड़े एक मामले में पहले से ही जेल में बंद था।

31 जुलाई के अपने फैसले में पीठ ने रेखांकित किया कि डिटेंशन रिकॉर्ड में केवल इतना लिखा गया था कि आरोपी जमानत पाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, हिरासत अधिकारी यह साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री प्रस्तुत नहीं कर सका कि आरोपी के जमानत पर बाहर आने की कोई तात्कालिक या वास्तविक संभावना थी, या जेल में बंद व्यक्ति पर प्रिवेंटिव डिटेंशन लगाना क्यों अनिवार्य था।

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दिखावे की कार्रवाई और मशीनी प्रक्रिया पर टिप्पणी

हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने कानूनी शर्तों को पूरा करने के नाम पर महज खानापूर्ति की है। केवल यह कह देना कि मादक पदार्थों की अवैध तस्करी रोकने के लिए हिरासत जरूरी है, कानून की मंशा के विपरीत है।

पीठ के मुताबिक, हिरासत अधिकारी के पास विश्वसनीय दस्तावेजों के आधार पर यह मानने का ठोस और तर्कसंगत कारण होना चाहिए कि जेल से बाहर आते ही आरोपी दोबारा आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो सकता है।

केंद्र सरकार से व्यवस्था सुधारने का आह्वान

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पीआईटी-एनडीपीएस एक्ट का मुख्य उद्देश्य मादक पदार्थों की तस्करी में लगे आदतन अपराधियों पर अंकुश लगाना है। हालांकि, बिना उचित विचार-विमर्श के हिरासत आदेश जारी करने की प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप करने को कहा है, ताकि व्यवस्था में मौजूद इस तरह की खामियों को समय रहते दूर किया जा सके।

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