राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि पैरोल की शर्तें किसी भी कैदी की आर्थिक हैसियत के अनुरूप होनी चाहिए, ताकि गरीबी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा न बने। अदालत ने गरीबी और आमदनी का जरिया न होने के कारण जमानती पेश करने में असमर्थ 53 वर्षीय एक कैदी को केवल एक लाख रुपये के पर्सनल बॉन्ड पर 30 दिनों के लिए पैरोल पर रिहा करने का आदेश दिया है।
जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस विनीत कुमार माथुर की खंडपीठ ने यह आदेश जोधपुर के मंडोर स्थित ओपन एयर कैंप में आपराधिक सजा काट रहे मुनिया की याचिका पर 15 सितंबर को सुनाया। अदालत ने कहा कि कैदी संबंधित जेल से रिहाई की वास्तविक तारीख से 30 दिन की पैरोल का हकदार होगा। इसके लिए उसे सिर्फ एक लाख रुपये का निजी मुचलका और जरूरी पहचान दस्तावेज पेश करने होंगे; पूर्व में तय की गई दो जमानतियों की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया है।
आर्थिक स्थिति के अनुरूप हों शर्तें, न बनें दमनकारी
मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने टिप्पणी की कि पैरोल मंजूर करते समय तय की जाने वाली निजी मुचलके की राशि ऐसी होनी चाहिए, जो कैदी की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि और स्थिति के मेल खाती हो। अदालत ने रेखांकित किया कि ये शर्तें कभी भी अत्यधिक, निषेधात्मक या दमनकारी नहीं होनी चाहिए।
पीठ ने स्पष्ट किया कि उसके समक्ष यह प्रश्न नहीं था कि मुनिया को नए सिरे से पैरोल दी जाए या नहीं, क्योंकि सक्षम प्राधिकारी पहले ही 23 अप्रैल को उसकी पैरोल स्वीकृत कर चुके थे। अदालत के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या आर्थिक तंगी और आय का कोई साधन न होने के चलते दो जमानती न दे पाने की वजह से किसी कैदी को स्वीकृत पैरोल के लाभ से वंचित रखा जा सकता है।
जमानती जुटाने में असमर्थ होने पर लगाई थी गुहार
सक्षम प्राधिकारियों ने 23 अप्रैल को मुनिया को पैरोल देते समय एक लाख रुपये के पर्सनल बॉन्ड के साथ 50-50 हजार रुपये के दो जमानती पेश करने की शर्त रखी थी। मुनिया ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बताया कि घोर निर्धनता और कोई आमदनी न होने की वजह से वह ये जमानती जुटाने में असमर्थ है, जिसके चलते पैरोल मंजूर होने के बावजूद वह जेल से बाहर नहीं आ सका।
याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि उसे केवल पर्सनल बॉन्ड के आधार पर रिहा किया जाए। पर्सनल बॉन्ड के तहत व्यक्ति रिहाई की शर्तों के पालन का लिखित वचन देता है और शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में ही वह अदालत को तय राशि चुकाने के लिए उत्तरदायी होता है।
दिशा-निर्देशों के तहत समितियों को छूट देने का अधिकार
याचिका का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने अपने ही 6 जनवरी के उस ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें पैरोल से जुड़े सक्षम अधिकारियों के लिए व्यापक दिशा-निर्देश तय किए गए थे। अदालत के अनुसार, इन निर्देशों का मकसद कानून का पालन सुनिश्चित करना, फैसलों में एकरूपता लाना, अनावश्यक मुकदमों और देरी को टालना तथा पैरोल मंजूर होने के बाद बंदियों को होने वाली दिक्कतों को दूर करना है।
इन नियमों के मुताबिक, पहली बार सामयिक पैरोल मंजूर करते समय सामान्य तौर पर जमानती बॉन्ड मांगा जा सकता है। हालांकि, यदि जांच के बाद पैरोल समिति संतुष्ट हो जाती है कि बंदी निर्धन है और जमानती पेश करने में असमर्थ है, तो समिति के पास पहली बार में ही जमानती की शर्त से छूट देने का पूरा विवेकाधिकार है।
इसके अलावा, जिन मामलों में पहले से जमानती की शर्त लगाई जा चुकी है, वहां भी कैदी के आवेदन पर विचार कर असमर्थता की स्थिति में यह शर्त हटाई जा सकती है। नियमों में यह भी तय किया गया है कि यदि किसी कैदी को पूर्व में बिना जमानती के पैरोल मिल चुकी है, तो भविष्य की सामयिक पैरोल के दौरान भी सामान्यतः यह छूट जारी रहनी चाहिए, जब तक कि उसकी आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव न आया हो।
विधिक सेवा प्राधिकरण को सूचना और कानूनी मदद
हाईकोर्ट के निर्देशों के तहत, जब भी किसी बंदी को जमानती से छूट का लाभ दिया जाता है, तो इसकी सूचना राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव को दी जानी अनिवार्य है। इसके बाद राज्य सरकार और विधिक सेवा प्राधिकरण को मिलकर यह सुनिश्चित करना होता है कि उस कैदी के आगे के पैरोल आवेदनों के लिए विधिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।
अदालत ने यह भी तय किया था कि यही नियम आवश्यक संशोधनों के साथ राजस्थान बंदी पैरोल पर रिहाई नियम, 2021 के तहत मानवीय आधार पर मांगी जाने वाली पैरोल के मामलों में भी लागू होंगे। इन्हीं स्थापित सिद्धांतों को मुनिया के मामले में लागू करते हुए हाईकोर्ट ने उसकी रिट याचिका का निस्तारण कर दिया।

