इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की आपराधिक न्याय प्रणाली में तकनीकी सुधारों को गति देते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेटों को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आरोप पत्रों तक पहुंच उपलब्ध कराने की अनुमति दे दी है। इसके साथ ही अदालत ने कई मामलों में फॉरेंसिक विज्ञान की अधूरी जानकारी के कारण सरकारी वकीलों द्वारा अदालत का समुचित सहयोग न कर पाने पर चिंता जताई और राज्य भर के न्यायिक अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और सरकारी वकीलों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित करने के निर्देश दिए हैं।
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने राज्य में आपराधिक न्याय प्रणाली के आधुनिकीकरण से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने कहा कि पुलिस और अदालतों के डेटाबेस को आपस में जोड़ने, ई-चार्जशीट, केस डायरी और मेडिको-लीगल दस्तावेजों तक डिजिटल पहुंच सुनिश्चित करने से न्यायिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनेगी।
तिलहर पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद प्रदेशव्यापी विस्तार
अदालत को सुनवाई के दौरान अवगत कराया गया कि शाहजहांपुर जिले के तिलहर थाने में एक प्रायोगिक परियोजना के तौर पर संबंधित अदालत को पूरे केस डायरी की डिजिटल पहुंच सफलतापूर्वक उपलब्ध कराई गई थी। इस मॉडल की कामयाबी को देखते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग को निर्देश दिया कि पूरे उत्तर प्रदेश में मजिस्ट्रेटों को आरोप पत्रों की इलेक्ट्रॉनिक प्रति उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए।
पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि मेडिको-लीगल एग्जामिनेशन एंड पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्टिंग सिस्टम (MedLEaPR) पर उपलब्ध पोस्टमार्टम, चोट और यौन उत्पीड़न से संबंधित जांच रिपोर्टें अब क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स (CCTNS) के जरिए सीधे पुलिस जांच अधिकारियों को मिल रही हैं।
फॉरेंसिक विज्ञान के प्रशिक्षण के लिए एक महीने की समयसीमा
अदालत ने अवलोकन किया कि अदालती कार्यवाही के दौरान कई बार अपर सरकारी अधिवक्ताओं को फॉरेंसिक विज्ञान की पर्याप्त जानकारी न होने के कारण मामलों को ठीक से प्रस्तुत करने में कठिनाई आती है। इसे दूर करने के लिए हाईकोर्ट ने विधि विभाग और हाईकोर्ट के शासकीय अधिवक्ता को निर्देश दिया कि वे प्रयागराज स्थित मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के फॉरेंसिक मेडिसिन एंड टॉक्सिकोलॉजी विभाग के सहयोग से एक विशेष कार्यशाला का आयोजन करें। अदालत ने इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए एक महीने का समय निर्धारित किया है।
इसके अलावा प्रमुख सचिव (विधि) और उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को राज्य के कानून अधिकारियों और पुलिस बल के लिए फॉरेंसिक दक्षता संवर्धन कार्यक्रम शुरू करने का आदेश दिया गया है। वहीं राज्य के सभी जिला जजों को भी निर्देश दिया गया है कि वे बुलंदशहर जिला जज की तर्ज पर अपने-अपने जिलों में अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों के लिए फॉरेंसिक विज्ञान पर कार्यशालाएं आयोजित करें।
जमानतदारों के ऑनलाइन सत्यापन पर काम जारी
हाईकोर्ट के 19 अगस्त के पूर्व आदेश के अनुपालन में राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) और उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी अदालत में पेश हुए। एनआईसी के उप महानिदेशक शशिकांत शर्मा ने पीठ को बताया कि मुकदमों में जमानतदारों के ऑनलाइन सत्यापन की प्रणाली तैयार की जा रही है और इलाहाबाद हाईकोर्ट की तकनीकी टीम इस व्यवस्था को अंतिम रूप देने में जुटी है।
यह मामला मूल रूप से एक आपराधिक मुकदमे में दाखिल जमानत अर्जी से जुड़ा था। यद्यपि अदालत ने संबंधित जमानत याचिका का निस्तारण 30 जुलाई को ही कर दिया था, लेकिन आपराधिक न्याय प्रणाली में तकनीकी सुधारों और डिजिटल प्रक्रियाओं के जमीनी क्रियान्वयन की निगरानी के लिए पीठ ने मामले की सुनवाई जारी रखी थी।

