सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान एक सामाजिक संगठन को मतदाता जागरूकता अभियान चलाने की अनुमति देने से इनकार करने वाला राज्य चुनाव आयोग का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों पर अपना एकाधिकार नहीं जता सकता। ऐसे अभियानों को प्रतिबंधित करने के बजाय प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने राजस्थान राज्य चुनाव आयोग को संगठन के आवेदन पर 48 घंटे के भीतर दोबारा निर्णय लेने का निर्देश दिया।
यह आदेश मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) के सह-संस्थापक और सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय तथा निखिल डे की याचिका पर आया। उन्होंने स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान मतदाता जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति नहीं दिए जाने को चुनौती दी थी।
राज्य चुनाव आयोग ने चुनाव वाले क्षेत्रों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत लागू निषेधाज्ञा का हवाला देते हुए अभियान की अनुमति देने से इनकार किया था।
मतदाता जागरूकता पर चुनाव आयोग का विशेष अधिकार नहीं
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने राज्य चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि केवल इस आधार पर किसी संगठन को मतदाता जागरूकता अभियान चलाने से नहीं रोका जा सकता कि आयोग स्वयं ऐसे कार्यक्रम आयोजित कर रहा है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मतदाताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने का काम केवल चुनाव आयोग तक सीमित नहीं है। अन्य संगठन भी इसमें भाग ले सकते हैं और आयोग को उनके प्रयासों का स्वागत करना चाहिए।
जस्टिस बागची ने कहा कि ऐसे संगठन चुनाव आयोग के सहयोगी बन सकते हैं।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई संगठन मतदाता जागरूकता की आड़ में चुनावी भ्रष्ट आचरण करता है तो आयोग उसके खिलाफ नियामक कार्रवाई कर सकता है। हालांकि, इस आधार पर सभी स्वतंत्र जागरूकता अभियानों को रोकना उचित नहीं है।
2004 से चल रहा है मतदाता जागरूकता अभियान
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने बताया कि संगठन वर्ष 2004 से मतदाता जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर रहा है।
उन्होंने कहा कि अभियान का उद्देश्य लोगों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों, चुनावी विकल्पों और नोटा (NOTA) के बारे में जानकारी देना है।
इसके अलावा मतदाताओं को वोट के बदले पैसे या अन्य प्रलोभन स्वीकार नहीं करने के लिए जागरूक किया जाता है, ताकि चुनावी अनियमितताओं को रोका जा सके।
भूषण ने स्पष्ट किया कि अभियान पूरी तरह गैर-राजनीतिक है। इसमें किसी उम्मीदवार का समर्थन या विरोध नहीं किया जाता। संगठन के छोटे समूह गांवों में जाकर लोगों के साथ संवाद के माध्यम से मतदाता जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
राज्य चुनाव आयोग की आपत्ति कोर्ट ने स्वीकार नहीं की
राजस्थान राज्य चुनाव आयोग ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि संगठन के आवेदन की जांच की गई थी। आयोग को आशंका थी कि प्रस्तावित अभियान किसी अन्य व्यक्ति के कहने पर चलाया जा सकता है।
आयोग ने यह भी दलील दी कि वह पहले से अपने स्तर पर मतदाता जागरूकता कार्यक्रम चला रहा है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। जस्टिस बागची ने कहा कि आयोग द्वारा स्वयं जागरूकता अभियान चलाए जाने से दूसरे संगठनों को ऐसा करने से नहीं रोका जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग मतदाता जागरूकता के नाम पर होने वाले भ्रष्ट आचरण को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन वह ऐसे कार्यक्रमों पर एकाधिकार स्थापित नहीं कर सकता।
48 घंटे में दोबारा निर्णय लेने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग का पूर्व आदेश रद्द करते हुए निर्देश दिया कि संगठन के आवेदन के साथ संलग्न सूची के अनुसार प्रस्तावित मतदाता जागरूकता कार्यक्रमों की अनुमति पर नए सिरे से विचार किया जाए।
आयोग को 48 घंटे के भीतर फैसला लेना होगा।
यह आदेश राजस्थान में चार चरणों में हो रहे पंचायती राज चुनावों के बीच आया है। अंतिम चरण में जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के लिए मतदान 14 नवंबर को निर्धारित है, जबकि सरपंच और पंच पदों के लिए 16 नवंबर को मतदान होगा।
इन चुनावों में 41 जिला परिषदों, 457 पंचायत समितियों और 14,403 ग्राम पंचायतों को शामिल किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 4.03 करोड़ से अधिक मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के पात्र हैं।
