सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 223(1) का पहला परंतुक (proviso)—जो यह अनिवार्य करता है कि कोर्ट द्वारा आरोपी को सुनवाई का अवसर दिए बिना किसी अपराध का संज्ञान नहीं लिया जाएगा—एक मौलिक और बाध्यकारी प्रकृति का प्रावधान है। जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपी को पहले सुने बिना संज्ञान लेना एक ऐसी अवैधता है जो पूरी कार्यवाही को शुरुआत से ही अमान्य (void ab initio) कर देती है।
तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने परविंदर सिंह की अपील को स्वीकार करते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट के 19 मई 2025 के फैसले और विशेष अदालत द्वारा 2 जुलाई 2024 को पारित संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया। यह आदेश प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) के तहत दायर एक शिकायत में दिया गया था। विशेष अदालत को निर्देश दिया गया है कि वह संज्ञान लेने के चरण से शुरू करते हुए अपीलकर्ता को सुनवाई का अवसर प्रदान करे।
मामले की पृष्ठभूमि
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 24 जुलाई 2023 को अपीलकर्ता परविंदर सिंह के खिलाफ एक प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIR/DNSZO/04/2023) दर्ज की थी, जिसके बाद उन्हें 27 अप्रैल 2024 को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के दो महीने के भीतर, 24 जून 2024 को, ईडी ने विशेष अदालत के समक्ष पीएमएलए की धारा 3 और 4 के तहत अपराधों के लिए मुकदमा चलाने हेतु शिकायत दर्ज की। उसी दिन, विशेष अदालत ने शिकायत को विविध मामले (miscellaneous case) के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया और संज्ञान पर सुनवाई के लिए 28 जून 2024 की तारीख तय की।
चूंकि पीठासीन अधिकारी 28 जून को अवकाश पर थे, इसलिए मामले की सुनवाई 2 जुलाई 2024 के लिए निर्धारित की गई। इसी बीच, 1 जुलाई 2024 से पुराना दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) निरस्त हो गया और उसके स्थान पर बीएनएसएस (BNSS) प्रभावी हो गया। 2 जुलाई 2024 को, विशेष अदालत ने आरोपी (अपीलकर्ता), जो न्यायिक हिरासत से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए थे, तथा ईडी के वकील और कानूनी सलाहकार की उपस्थिति में अपराध का संज्ञान ले लिया। इस विविध मामले को स्पेशल सेशंस ट्रायल नंबर 28/2024 के रूप में फिर से दर्ज किया गया।
इसके बाद, 24 दिसंबर 2024 को अपीलकर्ता ने संज्ञान आदेश को वापस लेने (recall) के लिए आवेदन दायर किया। उनका तर्क था कि बीएनएसएस की धारा 223(1) के पहले परंतुक का पालन नहीं किया गया क्योंकि संज्ञान लेने से पहले उन्हें सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था। विशेष अदालत ने 22 मार्च 2025 को इस आवेदन को “विलंबकारी हथकंडा” बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि संज्ञान लेने के बाद वही अदालत अपने आदेश पर पुनर्विचार नहीं कर सकती। उसी दिन कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ आरोप भी तय कर दिए।
अपीलकर्ता ने इन आदेशों को उत्तराखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने संज्ञान आदेश के खिलाफ CRLR No. 218/2025 और रिकॉल आवेदन खारिज होने के खिलाफ CRLR No. 183/2025 दायर की। 19 मई 2025 को हाईकोर्ट ने संज्ञान आदेश के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका (CRLR No. 218/2025) को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट का मानना था कि बीएनएसएस की धारा 223 इस मामले में लागू नहीं होगी क्योंकि पीएमएलए की कार्यवाही बीएनएसएस के लागू होने से बहुत पहले शुरू हो चुकी थी। हाईकोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 531(2)(a) (बचाव खंड/savings clause) का सहारा लिया, जो पुराने सीआरपीसी के तहत शुरू हुई कार्यवाही को उसी के तहत जारी रखने की अनुमति देता है। हालांकि, हाईकोर्ट ने आरोप तय करने के आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया और मामले को दोबारा सुनवाई के लिए विशेष अदालत भेज दिया। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता की ओर से दलीलें
अपीलकर्ता के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि संज्ञान के समय अपीलकर्ता को सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया गया था। उन्होंने कहा कि पुराने सीआरपीसी की धारा 200 से 205 (जिसे अब बीएनएसएस की धारा 223 से 228 के रूप में शामिल किया गया है) पीएमएलए की शिकायतों पर भी लागू होती हैं क्योंकि इन दोनों कानूनों में कोई विरोधाभास नहीं है। इस तर्क के समर्थन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों जैसे कुशल कुमार अग्रवाल बनाम प्रवर्तन निदेशालय (2025 SCC OnLine SC 1221), यश टुटेजा बनाम भारत संघ ((2024) 8 SCC 465) और तरसेम लाल बनाम ईडी ((2024) 7 SCC 61) का हवाला दिया।
इसके अतिरिक्त, उन्होंने तर्क दिया कि शिकायत को केवल दर्ज करने और नंबर आवंटित करने का प्रशासनिक कार्य बीएनएसएस की धारा 2(1)(k) के तहत “जांच” (inquiry) की श्रेणी में नहीं आता। इसलिए, बीएनएसएस को लागू होने से रोकने के लिए धारा 531(2)(a) के बचाव खंड का सहारा नहीं लिया जा सकता।
प्रतिवादी (ED) की ओर से दलीलें
ईडी की तरफ से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने तर्क दिया कि पीएमएलए एक विशेष और स्वतंत्र कानून है, इसलिए इस पर बीएनएसएस के प्रावधान लागू नहीं होते। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि पीएमएलए में सुपुर्दगी (committal) की प्रक्रिया नहीं होती, इसलिए विशेष अदालत सामान्य प्रक्रिया का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है। एएसजी ने कोर्ट से कुशल कुमार अग्रवाल मामले के फैसले पर पुनर्विचार करने का भी अनुरोध किया।
वैकल्पिक रूप से, उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि शिकायत बीएनएसएस लागू होने से पहले दायर की गई थी और कोर्ट ने 1 जुलाई 2024 से पहले इस पर आदेश पारित किए थे, इसलिए “जांच” पहले ही शुरू हो चुकी थी। हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य ((2014) 3 SCC 92) मामले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि बीएनएसएस की धारा 531(2)(a) के तहत इस मामले में पुराना सीआरपीसी ही लागू होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि आरोपी यह साबित करने में विफल रहा है कि संज्ञान से पहले सुनवाई न मिलने से उसे क्या नुकसान या पूर्वाग्रह (prejudice) हुआ।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने पीएमएलए और बीएनएसएस के बीच संबंध और प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण किया।
पीएमएलए पर बीएनएसएस की प्रयोज्यता
अदालत ने पीएमएलए की धाराओं (43, 44, 46, 65, 71) और बीएनएसएस की धाराओं (4, 5) का उल्लेख किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीएमएलए की धारा 44(1)(d) और 46 के तहत सामान्य दंड प्रक्रिया संहिता (अब बीएनएसएस) के प्रावधान विशेष अदालत की कार्यवाही पर भी लागू होते हैं, बशर्ते वे पीएमएलए के प्रावधानों के विपरीत न हों।
विशेष रूप से, कोर्ट ने एएसजी की उस मांग को खारिज कर दिया जिसमें कुशल कुमार अग्रवाल मामले के फैसले को बड़ी पीठ को भेजने का अनुरोध किया गया था। कोर्ट ने कहा:
“पीएमएलए की कार्यवाही से बीएनएसएस की धारा 223 से 228 (पुराने सीआरपीसी की धारा 200 से 205) की प्रयोज्यता को हटाना अत्यंत विनाशकारी परिणामों की ओर ले जाएगा। यदि इस दलील को स्वीकार कर लिया जाए, तो सबूतों की पूर्ण कमी होने पर भी विशेष अदालत के पास शिकायत खारिज करने, प्रक्रिया को स्थगित करने, समन जारी करने या आरोपी की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट देने का कोई अधिकार नहीं बचेगा।”
अदालत ने तरसेम लाल, यश टुटेजा और कुशल कुमार अग्रवाल के फैसलों में तय किए गए सिद्धांतों की पुष्टि करते हुए कहा कि शिकायत मामलों से जुड़ी ये धाराएं पीएमएलए पर पूरी तरह लागू होती हैं।
धारा 223(1) के परंतुक की मौलिक प्रकृति
बीएनएसएस की धारा 223(1) के पहले परंतुक, जो संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुने जाने का अधिकार देता है, पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“हालांकि बीएनएसएस का अध्याय XVI मजिस्ट्रेट के समक्ष की जाने वाली शिकायतों से संबंधित प्रक्रियात्मक कानून निर्धारित करता है, हमारा यह मानना है कि उक्त परंतुक मूल रूप से मौलिक (substantive) प्रकृति का है। यह केवल कार्यवाही संचालित करने के तरीके को नियंत्रित नहीं करता, बल्कि आरोपी को संज्ञान लेने से पहले सुने जाने का अधिकार देता है, जो कि भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी के निष्पक्ष परीक्षण (fair trial) के अधिकार का हिस्सा है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि परंतुक में “shall” (अनिवार्य रूप से) शब्द का प्रयोग बाध्यकारी है और:
“परिणामस्वरूप, उक्त परंतुक का पालन किए बिना अदालत द्वारा लिया गया संज्ञान शुरुआत से ही अमान्य (void ab initio) माना जाएगा।”
“जांच” (Inquiry) और धारा 531(2)(a) की व्याख्या
ईडी के इस तर्क पर कि पुराने कानून के तहत “जांच” पहले ही शुरू हो चुकी थी, कोर्ट ने जांच की शुरुआत को स्पष्ट करते हुए कहा:
“एक प्रशासनिक या लिपिकीय कार्य को बीएनएसएस की धारा 2(1)(k) के तहत ‘जांच’ नहीं कहा जा सकता। संज्ञान लेना और कुछ नहीं बल्कि न्यायिक दिमाग का इस्तेमाल करना है। जब तक न्यायिक दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया जाता, तब तक जांच शुरू नहीं हो सकती।”
न्यायालय ने पूर्व के फैसलों पर चर्चा करते हुए स्पष्ट किया कि रघुबंस दुबे बनाम बिहार राज्य (AIR 1967 SC 1167) में यह कहा गया था कि अतिरिक्त आरोपियों को समन करना संज्ञान लेने के बाद शुरू होने वाली प्रक्रिया का हिस्सा है। हरदीप सिंह (supra) और राज किशोर प्रसाद बनाम बिहार राज्य ((1996) 4 SCC 495) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि केवल आरोप पत्र दाखिल करना या धारा 207 से 209 के तहत दस्तावेजों की प्रतियों की तामीली सुनिश्चित करने का कार्य “जांच” नहीं है, क्योंकि इसमें कोई न्यायिक निर्णय या सोच शामिल नहीं होती।
इस मामले में, 24 जून 2024 को विशेष अदालत द्वारा शिकायत को दर्ज करने और तारीख देने का आदेश केवल एक लिपिकीय कार्य था। चूंकि न्यायिक दिमाग का उपयोग (यानी संज्ञान) 2 जुलाई 2024 को बीएनएसएस के लागू होने के बाद किया गया था, इसलिए नए कानून के प्रावधान लागू होंगे और धारा 531(2)(a) का लाभ ईडी को नहीं मिलेगा।
पूर्वाग्रह (Prejudice) सिद्ध करने की आवश्यकता पर
एएसजी के इस तर्क को खारिज करते हुए कि आरोपी को सुनवाई न मिलने से हुआ नुकसान साबित करना होगा, कोर्ट ने कहा:
“…एक ऐसे कानून के जनादेश को दरकिनार नहीं किया जा सकता जो आरोपी के निष्पक्ष परीक्षण के अधिकार को सुनिश्चित करता है, जिसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता दांव पर लगी है। इसलिए, आरोपी द्वारा संज्ञान के चरण पर सुनवाई न होने से हुए पूर्वाग्रह को साबित करने की एएसजी की दलील स्वीकार नहीं की जा सकती। यह कोई सामान्य प्रक्रियात्मक अनियमितता नहीं है जिसे धारा 506 या 511 के तहत नजरअंदाज किया जा सके, बल्कि यह एक ऐसी अवैधता है जो पूरी कार्यवाही को दूषित करती है।”
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि बीएनएसएस की धारा 223(1) के पहले परंतुक का पालन न करना संज्ञान के आदेश को पूरी तरह से अमान्य बनाता है। कोर्ट ने कहा कि यद्यपि अपीलकर्ता के खिलाफ आरोप काफी गंभीर हैं, लेकिन निष्पक्ष परीक्षण के अनिवार्य कानूनी और संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने हाईकोर्ट के 19 मई 2025 के निर्णय और विशेष अदालत के 2 जुलाई 2024 के संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया। विशेष अदालत को निर्देश दिया गया कि वह संज्ञान लेने के चरण से शुरू करते हुए आरोपी को सुनवाई का उचित अवसर दे और इस प्रक्रिया को आदेश मिलने के आठ सप्ताह के भीतर पूरा करे। इसी के साथ अपील स्वीकार कर ली गई।
मामले का विवरण
- मामले का शीर्षक: परविंदर सिंह बनाम प्रवर्तन निदेशालय
अपील संख्या : क्रिमिनल अपील संख्या ______ वर्ष 2026 (एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 12055 वर्ष 2025 से उत्पन्न) - पीठ: जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह
- दिनांक: 19 मई 2026

