देश के चर्चित मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी अपराधी को सिर्फ अपराध की प्रकृति के आधार पर हमेशा के लिए जेल की सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता। शुक्रवार को जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने इस मामले के एक दोषी, रोहित चतुर्वेदी की समय पूर्व रिहाई (रेमिशन) का मार्ग प्रशस्त कर दिया।
शीर्ष अदालत ने गृह मंत्रालय (MHA) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें उत्तराखंड सरकार की रिहाई की सिफारिश को ठुकरा दिया गया था। अदालत ने मंत्रालय के फैसले को “तर्कहीन” और “मनमाना” करार देते हुए कहा कि न्याय का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, न कि प्रतिशोध।
“अपराध अलग है और सुधार अलग”
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सुधारात्मक न्याय की वकालत करते हुए कहा, “अपराध एक अलग बात है और अपराधी में सुधार दूसरी। राज्य का ध्यान सुधार पर होना चाहिए, न कि केवल दंड देने पर।” पीठ ने इस बात पर चिंता जताई कि रोहित चतुर्वेदी पहले ही 22 साल जेल में काट चुका है और गृह मंत्रालय ने बिना किसी ठोस कारण के उसकी रिहाई की अर्जी खारिज कर दी थी।
अदालत ने कहा कि गृह मंत्रालय का 9 जुलाई 2025 का आदेश “मौन” (Non-speaking) था, यानी उसमें रिहाई न देने का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया था। जजों ने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े फैसले में ठोस कारण होना अनिवार्य है, अन्यथा वह मनमाना माना जाएगा।
प्लेटो के दर्शन का जिक्र: भावना नहीं, तर्क हो आधार
अपने फैसले को संवैधानिक मूल्यों से जोड़ते हुए पीठ ने यूनानी दार्शनिक प्लेटो का जिक्र किया। अदालत ने कहा कि एक उदार संवैधानिक व्यवस्था में सजा और रिहाई का आधार ‘जनता का आक्रोश’ नहीं बल्कि ‘तर्क’ होना चाहिए। कोर्ट के शब्दों में, “रिहाई से इनकार करना सजा को बढ़ाने का तरीका नहीं है। यह अपराधी के वर्तमान आचरण और समाज में उसके दोबारा घुलने-मिलने की क्षमता का आकलन है।”
क्या था मामला?
साल 2003 में लखनऊ की पेपर मिल कॉलोनी में कवयित्री मधुमिता शुक्ला की उनके घर में ही गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। वह उस समय गर्भवती थीं। इस सनसनीखेज मामले में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन कद्दावर मंत्री अमरमणि त्रिपाठी का नाम सामने आया था।
जांच के बाद, अक्टूबर 2007 में उत्तराखंड की एक ट्रायल कोर्ट ने अमरमणि त्रिपाठी, उनकी पत्नी मधुमणि, भतीजे रोहित चतुर्वेदी और सहयोगी संतोष कुमार राय को हत्या और साजिश का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। रोहित चतुर्वेदी, जिसने साजिश में भूमिका निभाई थी, वर्तमान में जमानत पर बाहर है और कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसे अब आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं है।
फैसले का महत्व
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जेल में बंद उन कैदियों के लिए एक नजीर बन सकता है जो लंबी सजा काट चुके हैं और जिनमें सुधार के लक्षण दिख रहे हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कार्यपालिका (Executive) के पास रिहाई के मामलों में व्यापक अधिकार तो हैं, लेकिन वे अधिकार मनमाने नहीं हो सकते और उन्हें भेदभाव रहित होना चाहिए।

