GM चावल की ‘अवैध’ रिलीज पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: बड़े अधिकारियों के खिलाफ अवमानना याचिका पर सुनवाई की तैयारी

देश में जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) और जीन-एडिटेड चावल की किस्मों को व्यावसायिक रूप से जारी करने का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर केंद्र सरकार के शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकार ने अदालती आदेशों और आश्वासनों का “जानबूझकर” उल्लंघन करते हुए इन फसलों को बाजार में उतारा है।

क्या है पूरा विवाद?

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ के सामने वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस मामले को रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि सरकार ने उन समय-सीमाओं के दौरान जीएम चावल की किस्में जारी कीं, जब मामला अदालत के विचाराधीन था या जब स्पष्ट निर्देश थे कि बिना किसी राष्ट्रीय नीति के ऐसी कोई भी रिलीज नहीं होगी।

इस अवमानना याचिका में पर्यावरण मंत्रालय के सचिव तन्मय कुमार, कृषि मंत्रालय के सचिव देवेश चतुर्वेदी और जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GEAC) के अध्यक्ष अमनदीप गर्ग को पक्षकार बनाया गया है। याचिकाकर्ता अरुणा रोड्रिग्स का कहना है कि सरकार के इस कदम ने न्यायिक प्रक्रिया का मजाक बना दिया है।

इन चावलों की रिलीज पर उठा सवाल

याचिका में विशेष रूप से हर्बिसाइड टॉलरेंट (HT) बासमती चावल, जिसे ‘RobiNOweed’ ब्रांड नाम से जाना जाता है, और ‘कमला’ (DRR Rice 100) जैसी किस्मों का जिक्र किया गया है।

  • मई 2024: इस दौरान ICAR ने ‘RobiNOweed’ को व्यावसायिक रूप से जारी किया, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा था।
  • मई 2025: कृषि मंत्री द्वारा ‘कमला’ और ‘पूसा DST राइस 1’ जैसी जीन-एडिटेड किस्मों को जारी किया गया।
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याचिका के अनुसार, यह कदम सुप्रीम कोर्ट के 23 जुलाई, 2024 के उस फैसले का उल्लंघन है, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि सरकार को पहले विशेषज्ञों और राज्यों के साथ विचार-विमर्श कर एक ‘व्यापक राष्ट्रीय नीति’ बनानी होगी।

80,000 चावल की किस्मों पर मंडराता खतरा

यह मुद्दा केवल कानूनी नहीं बल्कि पर्यावरण और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा है। याचिका में चेतावनी दी गई है कि इन किस्मों के आने से भारत के ‘राइस जर्मप्लाज्म’ (80,000 से अधिक अनूठी किस्में) में ऐसा प्रदूषण (Contamination) फैल सकता है जिसे कभी ठीक नहीं किया जा सकेगा।

भारत चावल की विविधता का केंद्र माना जाता है। विशेषज्ञों की समिति (TEC) ने पहले ही सिफारिश की थी कि भारत जैसे विविधता वाले देश में HT फसलों पर पूर्ण प्रतिबंध होना चाहिए।

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आर्थिक नुकसान की आशंका

भारत दुनिया में नॉन-जीएमओ (Non-GMO) बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है। यह व्यापार सालाना 12 बिलियन डॉलर (लगभग 1 लाख करोड़ रुपये) से अधिक का है। याचिका में डर जताया गया है कि यदि भारतीय चावल में जीएम अंश पाया गया, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की विश्वसनीयता और यह विशाल व्यापार पूरी तरह ठप हो सकता है।

पुरानी चेतावनियों को किया गया नजरअंदाज

2013 की तकनीकी समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि HT फसलें भारतीय कृषि के लिए असुरक्षित और पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं। साथ ही, इन फसलों के साथ इस्तेमाल होने वाले खरपतवार नाशक ‘राउंडअप’ (Roundup) को कैंसरकारी माना गया है। इन गंभीर चेतावनियों के बावजूद, सरकार द्वारा इन बीजों की बिक्री शुरू करना अदालत की अवमानना के दायरे में आता है।

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चीफ जस्टिस ने इस मामले को देखने का आश्वासन दिया है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या शीर्ष अदालत सरकार के इन बड़े अधिकारियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाती है।

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