₹415 करोड़ का मनी लॉन्ड्रिंग मामला: अल फलाह यूनिवर्सिटी के चेयरमैन की जमानत पर हाईकोर्ट ने ED से मांगा जवाब

दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार को अल फलाह यूनिवर्सिटी ग्रुप के चेयरमैन जवाद अहमद सिद्दीकी की नियमित जमानत याचिका पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) को नोटिस जारी कर उनका पक्ष पूछा है। सिद्दीकी पर छात्रों की फीस के करोड़ों रुपये निजी इस्तेमाल के लिए डायवर्ट करने और मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर आरोप हैं।

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने इस मामले की सुनवाई करते हुए केंद्रीय जांच एजेंसी को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने मुख्य जमानत याचिका पर सुनवाई के लिए जुलाई की तारीख तय की है, हालांकि सिद्दीकी की अंतरिम जमानत की अर्जी पर इसी महीने के अंत में विचार किया जाएगा।

फर्जीवाड़े और 415 करोड़ की हेराफेरी का आरोप

जवाद अहमद सिद्दीकी को 18 नवंबर 2025 को ‘प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट’ (PMLA) के तहत गिरफ्तार किया गया था। ED की जांच दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा दर्ज दो एफआईआर पर आधारित है। आरोप है कि फरीदाबाद स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी ने छात्रों और अभिभावकों को गुमराह करने के लिए फर्जी तरीके से NAAC मान्यता और UGC की मंजूरी का प्रचार किया।

जांच एजेंसी का दावा है कि 2018 से 2025 के बीच यूनिवर्सिटी ने करीब 415.10 करोड़ रुपये की राशि जुटाई। नियमों के विपरीत, छात्रों से वसूली गई इस भारी-भरकम फीस को शैक्षणिक कार्यों के बजाय सिद्दीकी ने व्यक्तिगत लाभ के लिए डायवर्ट कर दिया।

‘व्हाइट कॉलर टेरर’ से जुड़े तार

यह मामला केवल वित्तीय धोखाधड़ी तक सीमित नहीं है। जांच के दौरान संस्थान का नाम ‘व्हाइट कॉलर टेरर’ (सफेदपोश आतंकवाद) की जांच में भी सामने आया था। इस मामले में संस्थान से जुड़े दो डॉक्टरों की गिरफ्तारी हुई थी। चौंकाने वाली बात यह है कि 10 नवंबर को लाल किले के बाहर हुए आत्मघाती हमले में शामिल हमलावर उमर-उन-नबी भी इसी यूनिवर्सिटी के अस्पताल से जुड़ा था। उस धमाके में 15 लोगों की जान गई थी।

निचली अदालत से झटका और कानूनी संघर्ष

सिद्दीकी ने हाई कोर्ट का दरवाजा तब खटखटाया जब 2 मई को ट्रायल कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी।

इससे पहले, 7 फरवरी को मानवीय आधार पर सिद्दीकी की पत्नी के कैंसर के इलाज के लिए उन्हें दो हफ्ते की अंतरिम जमानत दी गई थी। हालांकि, ED ने इस राहत को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद ट्रायल कोर्ट को मामले पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया गया था। अब जुलाई में होने वाली अगली सुनवाई यह तय करेगी कि करोड़ों की धोखाधड़ी के आरोपी चेयरमैन को राहत मिलेगी या उन्हें जेल में ही रहना होगा।

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