शिक्षित और सक्षम पति अपनी पत्नी के भरण-पोषण से नहीं बच सकता: उड़ीसा हाईकोर्ट

उड़ीसा हाईकोर्ट ने एक पति द्वारा भरण-पोषण (Maintenance) के आदेश को चुनौती देने वाली पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पति शारीरिक रूप से सक्षम और शिक्षित है, तो यह माना जाएगा कि वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त धन अर्जित करने में समर्थ है। जस्टिस मृगांक शेखर साहू ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वित्तीय तंगी का बहाना बनाकर कोई भी सक्षम व्यक्ति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता।

यह मामला तब हाईकोर्ट पहुँचा जब एक पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उसे अपनी पत्नी को हर महीने 6,000 रुपये भरण-पोषण के रूप में देने का निर्देश दिया गया था। याचिकाकर्ता पति, जिसके पास एमबीए (MBA) और इंजीनियरिंग में मास्टर्स की डिग्री है, ने दलील दी कि वर्तमान में उसके पास आय का कोई स्रोत नहीं है। उसने यह भी तर्क दिया कि उसकी पत्नी कटक में सहायक राजस्व निरीक्षक (Assistant Revenue Inspector) के रूप में कार्यरत है और लगभग 31,000 रुपये मासिक वेतन पा रही है, इसलिए वह उससे भरण-पोषण पाने की हकदार नहीं है।

फैमिली कोर्ट ने अपने सितंबर 2024 के फैसले में दर्ज किया था कि पति पहले विप्रो (Wipro) और हरमन कंपनी जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों में काम कर चुका है और एक वैरायटी स्टोर भी चलाता था। कोर्ट ने जोर दिया कि यह पति का कर्तव्य है कि वह पत्नी का कल्याण सुनिश्चित करे और उसे अपने जीवन स्तर के अनुरूप रखे।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील रीता सिंह ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट का फैसला त्रुटिपूर्ण है क्योंकि कोर्ट ने साक्ष्यों का सही परिप्रेक्ष्य में आकलन नहीं किया। पति का कहना था कि उसकी बेरोजगारी उसे भरण-पोषण की राशि देने से मुक्त करती है, जो कि जनवरी 2020 से प्रभावी होनी थी।

वहीं, हाईकोर्ट ने गौर किया कि पति ने फैमिली कोर्ट के समक्ष अपनी बेरोजगारी या आय की कमी को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत (Positive Evidence) पेश नहीं किया।

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जस्टिस मृगांक शेखर साहू ने परिवार के भरण-पोषण के संबंध में पति के दायित्व से जुड़े स्थापित कानूनी सिद्धांतों पर प्रकाश डाला। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

“यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता पति, जो कि शारीरिक रूप से सक्षम है, उसे अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त धन कमाने में समर्थ माना जाना चाहिए; उसे यह कहने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह पर्याप्त कमाने की स्थिति में नहीं है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि पति ने फैमिली कोर्ट के समक्ष यह दिखाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया कि वह किन कारणों से कमाने में असमर्थ है। जस्टिस साहू ने दोहराया:

“यह पति का दायित्व है कि वह अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चों का भरण-पोषण करे। जब तक वह सक्षम, शिक्षित और कमाने में समर्थ है, वह वित्तीय तंगी का हवाला देकर अपनी पत्नी को भरण-पोषण देने से मना नहीं कर सकता।”

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कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शमीमा फारूकी मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि बिना सोचे-समझे भरण-पोषण की राशि को मनमाने ढंग से कम करना कानूनन सही नहीं है।

पति की दलीलों में कोई कानूनी आधार न पाते हुए, उड़ीसा हाईकोर्ट ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और पुष्टि की कि पति की शैक्षणिक योग्यता (MBA और इंजीनियरिंग) और उसका अच्छा स्वास्थ्य उसे अपनी पत्नी के प्रति वित्तीय जिम्मेदारी निभाने के लिए उत्तरदायी बनाता है, चाहे वह वर्तमान में ‘शून्य आय’ का दावा ही क्यों न कर रहा हो।

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