मद्रास हाईकोर्ट ने यूजीसी के अचानक लागू किए गए नियमों पर लगाई रोक, कानून के छात्र को परीक्षा देने की अनुमति

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु डॉ. अंबेडकर लॉ यूनिवर्सिटी के उस फैसले में हस्तक्षेप किया है, जिसमें यूजीसी (UGC) के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए एक छात्र को उसकी अंतिम परीक्षाओं से वंचित कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने छात्र के करियर को ध्यान में रखते हुए उसे सप्लीमेंट्री परीक्षाओं में बैठने की अनुमति देने का आदेश दिया है।

याचिकाकर्ता छात्र ने वर्ष 2017 से 2022 के दौरान सेंट्रल लॉ कॉलेज से पांच वर्षीय बीए एलएलबी (BA LLB) कोर्स किया था। अपने नियमित कोर्स की अवधि समाप्त होने तक, उसने चार विषयों को छोड़कर बाकी सभी पेपर पास कर लिए थे।

जब छात्र ने 2017 में प्रवेश लिया था, तब यूनिवर्सिटी या कॉलेज ने परीक्षाओं को पास करने के लिए प्रयासों की संख्या या किसी सख्त समय सीमा से जुड़ी कोई शर्त नहीं रखी थी। यहां तक कि 13 अप्रैल 2026 को जारी परीक्षा कार्यक्रम में भी ऐसी किसी पाबंदी का जिक्र नहीं था।

अचानक 22 अप्रैल 2026 को यूनिवर्सिटी ने निर्देश जारी किया कि 2018-2019 शैक्षणिक वर्ष से पहले प्रवेश लेने वाले छात्र अब परीक्षा नहीं दे पाएंगे। यूनिवर्सिटी ने इसके पीछे यूजीसी के उन दिशा-निर्देशों का हवाला दिया, जो कोर्स पूरा होने के बाद केवल दो साल तक ही सप्लीमेंट्री परीक्षा देने की अनुमति देते हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील एस.आर. सुंदर ने तर्क दिया कि नियमों को इस तरह अचानक लागू करना छात्र के लिए ‘अपूरणीय क्षति’ (irreparable injury) के समान है। उन्होंने कहा कि छात्र के केवल चार पेपर बाकी हैं और उसका पूरा भविष्य दांव पर लगा है।

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याचिका में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें कही गईं:

  • कोर्स शुरू होने के समय ऐसी कोई पाबंदी मौजूदा नियमों का हिस्सा नहीं थी।
  • जब छात्र ने परीक्षा शुल्क भरने की कोशिश की, तो ऑनलाइन पोर्टल ने उसके रजिस्ट्रेशन नंबर को ‘अवैध’ बताकर खारिज कर दिया।
  • यूनिवर्सिटी को 27 अप्रैल और 4 मई को ईमेल के जरिए अपनी समस्या बताई गई, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया।
  • इसी तरह के अन्य मामलों में हाईकोर्ट ने 29 अप्रैल को छात्रों को राहत दी थी, इसलिए याचिकाकर्ता ने भी समान न्याय की मांग की।
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न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि पूर्व के न्यायिक उदाहरणों को देखते हुए छात्र को परीक्षा में बैठने का अवसर मिलना चाहिए। अदालत ने इस बात को गंभीरता से लिया कि इस शैक्षणिक वर्ष में अचानक ऐसी ‘कठोर शर्त’ थोप दी गई।

अपने 12 मई के आदेश में हाईकोर्ट ने कहा: “इस न्यायालय का सुविचारित मत है कि याचिकाकर्ता को भी परीक्षा लिखने का लाभ दिया जाना चाहिए। अतः, प्रतिवादियों को ऑनलाइन पोर्टल खोलने का निर्देश दिया जाता है ताकि याचिकाकर्ता आवश्यक परीक्षा शुल्क का भुगतान कर सके और उसे सप्लीमेंट्री परीक्षाओं में बैठने की अनुमति दी जाए।”

छात्र की परीक्षाएं 13 मई 2026 से 5 जून 2026 के बीच होनी हैं। हाईकोर्ट के इस आदेश से यह सुनिश्चित हो गया है कि छात्र 13 मई, 21 मई, 2 जून और 5 जून को अपने लंबित विषयों की परीक्षा दे सकेगा।

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शैक्षणिक अधिकारों के संरक्षण की दिशा में मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में एक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती ने 40 प्रतिशत दिव्यांगता वाले एक छात्र को फीस माफी का लाभ देने का निर्देश दिया।

यूनिवर्सिटी ने यह कहते हुए फीस माफी से इनकार किया था कि छात्र ने ‘दिव्यांग कोटा’ के तहत प्रवेश नहीं लिया है। हाईकोर्ट ने यूनिवर्सिटी के इस संकीर्ण नजरिए को खारिज करते हुए कहा:

“दिव्यांग व्यक्तियों को आरक्षण और कल्याणकारी उपायों, दोनों की आवश्यकता होती है ताकि उन्हें अन्य उम्मीदवारों के साथ अपनी शिक्षा पूरी करने के समान अवसर प्रदान किए जा सकें।”

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