पर्यावरण याचिकाओं पर CJI की टिप्पणी का विरोध: 72 कानूनी विशेषज्ञों ने खुला पत्र लिखकर बयान वापस लेने की मांग की

देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत द्वारा पर्यावरण कार्यकर्ताओं को लेकर की गई एक हालिया टिप्पणी पर कानूनी गलियारों में विवाद खड़ा हो गया है। वकीलों, कानून के छात्रों, शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों सहित 72 कानूनी विशेषज्ञों के एक समूह ने मुख्य न्यायाधीश को एक खुला पत्र भेजकर इस टिप्पणी को वापस लेने की मांग की है। मंगलवार को जारी किए गए इस पत्र में चेतावनी दी गई है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी पर्यावरण की रक्षा में जुटे देश के नागरिकों पर अवांछित सवाल उठाती है और भारत के पर्यावरणीय न्यायशास्त्र में एक चिंताजनक बदलाव का संकेत देती है।

यह पूरा मामला 11 मई को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच (जिसमें CJI और एक अन्य न्यायाधीश शामिल थे) द्वारा की गई मौखिक टिप्पणी से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान पीठ ने तल्ख लहजे में कहा था: “हमें इस देश का एक भी ऐसा प्रोजेक्ट दिखाएं जहां इन कथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कहा हो कि वे इस प्रोजेक्ट का स्वागत करते हैं।”

न्यायिक दृष्टिकोण में ‘बड़ा और हानिकारक बदलाव’

‘नेशनल एलायंस फॉर जस्टिस, अकाउंटेबिलिटी एंड राइट्स’ (NAJAR) से जुड़े इन विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी किसी एक मामले तक सीमित नहीं है। पत्र में तर्क दिया गया है कि यह टिप्पणी अदालत के उस पारंपरिक दृष्टिकोण में बड़े बदलाव को दर्शाती है, जिसके तहत पर्यावरण संरक्षण को न्याय व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा माना जाता था।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने इस बदलाव को तीन मुख्य बिंदुओं में रेखांकित किया है:

  • संवैधानिक शासन से बाधा तक का सफर: पत्र के अनुसार, पर्यावरण से जुड़ी जनहित याचिकाओं को जो पहले संवैधानिक शासन का हिस्सा माना जाता था, अब उन्हें विकास कार्य में एक ‘संदेहास्पद रुकावट’ के रूप में देखा जाने लगा है।
  • नागरिकों की भूमिका को कमतर आंकना: पर्यावरण नियमों को लागू करवाने में नागरिकों की भूमिका को स्वीकार करने के बजाय, उन्हें महज “तथाकथित पर्यावरण कार्यकर्ता” कहकर खारिज किया जा रहा है।
  • जांच पर प्रशासनिक मंजूरी को प्राथमिकता: विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि प्रशासनिक फाइलों में विसंगतियों, कमियों और जनता की चिंताओं के बावजूद, विकास परियोजनाओं को मिली मंजूरी को आंख मूंदकर स्वीकार करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
READ ALSO  “You Are So Educated, You Should Earn for Yourself": Supreme Court to MBA Qualified Demanding ₹12 Crore Alimony for 18-Month Marriage

पर्यावरणीय न्याय के ढांचे की रक्षा की मांग

खुले पत्र में कहा गया है कि शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी से उन समुदायों और नागरिकों की साख पर ठेस पहुंचती है जो देश के स्थापित कानूनों, वैधानिक संस्थाओं और खुद सुप्रीम कोर्ट द्वारा दशकों में विकसित किए गए पर्यावरण संबंधी फैसलों के भरोसे अपनी आवाज उठाते हैं।

इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए, NAJAR और अन्य हस्ताक्षरकर्ताओं ने CJI सूर्यकांत से भारत के संवैधानिक मूल्यों और पर्यावरणीय कानूनी सिद्धांतों को फिर से मजबूत करने का आग्रह किया है।

पत्र में मुख्य न्यायाधीश से विशेष रूप से यह मांग की गई है:

  1. PIL की वैधता बहाल हो: यह स्पष्ट किया जाए कि पर्यावरण से जुड़ी जनहित याचिकाएं (PIL) और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में की जाने वाली अपीलें कानून को लागू करवाने का एक वैध माध्यम हैं, न कि “विकास को रोकने की कोई सुनियोजित कोशिश”।
  2. NGT के अधिकारों का सम्मान: NGT के फैसलों को उचित महत्व दिया जाए, हालांकि वे NGT एक्ट की धारा 22 के तहत कानून से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों पर अपील के दायरे में बने रहेंगे।
READ ALSO  केरल हाईकोर्ट ने चुनाव पूर्व सर्वे में सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के आरोपों वाली जनहित याचिका पर सुनवाई स्वीकार की

पत्र के माध्यम से कानूनी समुदाय ने उम्मीद जताई है कि कोर्ट अपनी टिप्पणी को वापस लेकर देश के विकास और पर्यावरण की रक्षा के बीच उस जरूरी संतुलन को बनाए रखेगा जो नागरिकों का कानूनी अधिकार है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles