बच्चों की प्रताड़ना से तंग बुजुर्गों को बेदखली के अधिकार के लिए ‘कंगाल’ होना जरूरी नहीं: गुवाहाटी हाई कोर्ट

बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों और सम्मान को लेकर गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बुजुर्ग माता-पिता को अपने प्रताड़ित करने वाले या उपेक्षा करने वाले बच्चों को अपने खुद के घर से निकालने के लिए “कंगाल या बेसहारा” होने की आवश्यकता नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने एक 86 वर्षीय बुजुर्ग पिता के हक में फैसला सुनाते हुए उनके दो बेटों को घर खाली करने का आदेश दिया। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि केवल वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर होना ही वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक सम्मानजनक, सुरक्षित और शांतिपूर्ण जीवन की गारंटी नहीं है।

हाई कोर्ट की खंडपीठ ने यह फैसला 19 मई को सुनाया। कोर्ट ने दो भाइयों द्वारा दायर उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने एकल-न्यायाधीश पीठ के 18 नवंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी थी। एकल-न्यायाधीश पीठ ने धूबरी टाउन (Dhubri Town) में स्थित पिता के स्व-अर्जित मकान से दोनों बेटों को बेदखल करने के मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल (Maintenance Tribunal) के फैसले को सही ठहराया था।

‘पेंशन मिलना गरिमा की गारंटी नहीं’: कोर्ट ने बेटों की दलीलें खारिज कीं

इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ में बेटों की यह दलील थी कि उनके पिता एक सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारी हैं। उन्हें नियमित पेंशन मिलती है और उनके पास जीवनयापन के पर्याप्त साधन हैं। इसलिए, बेटों का तर्क था कि पिता माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 (Maintenance & Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007) के तहत मिलने वाले संरक्षण और बेदखली के प्रावधानों का सहारा नहीं ले सकते।

अदालत ने बेटों के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया।

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पीठ ने अपने आदेश में कहा, “हम इस दलील को स्वीकार करने में पूरी तरह असमर्थ हैं कि पेंशन पाने वाले वरिष्ठ नागरिक को 2007 के अधिनियम की धारा 23 के तहत संरक्षण का अधिकार नहीं है। कानून यह मांग नहीं करता कि कोई बुजुर्ग प्राधिकारियों के पास जाने से पहले पूरी तरह कंगाल या बेसहारा हो जाए… केवल आर्थिक संपन्नता ही शांतिपूर्ण जीवन, भावनात्मक सुरक्षा या गरिमापूर्ण निवास सुनिश्चित नहीं करती।”

अदालत ने जोर देकर कहा कि इस कानून का उद्देश्य सिर्फ बुजुर्गों का आर्थिक गुजारा सुनिश्चित करना नहीं है, बल्कि उन्हें अपने ही घर में सुरक्षा, सम्मान और मानसिक शांति के साथ जीने का अधिकार देना है।

जब बिखर गया आपसी विश्वास: ‘तेज्य पुत्र’ घोषित करने की नौबत आई

यह मामला एक 86 वर्षीय पिता का है, जिन्होंने अपने जीवनभर की कमाई से बनाए घर में अपने दोनों बेटों और उनके परिवारों को रहने की इजाजत दी थी। अदालत ने टिप्पणी की कि भारत में ऐसे पारिवारिक इंतजाम अक्सर किसी औपचारिक दस्तावेज के बिना, केवल आपसी विश्वास, स्नेह और पारिवारिक व्यवस्था के आधार पर होते हैं।

लेकिन समय के साथ यह रिश्ता पूरी तरह बिखर गया। पिता का आरोप था कि उनके बेटों और बहुओं ने उनके साथ न केवल दुर्व्यवहार किया, बल्कि गंभीर बीमारी और लाचारी के दिनों में भी उनकी कोई सुध नहीं ली।

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मानसिक शांति के लिए तंग आकर बुजुर्ग पिता ने अपने बेटों से सारे रिश्ते तोड़ते हुए उन्हें सार्वजनिक रूप से ‘तेज्य पुत्र’ (उत्तराधिकार से बेदखल) घोषित कर दिया। उन्होंने ट्रिब्यूनल से गुहार लगाई कि वे अपने बेटों से एक पाई की भी वित्तीय मदद नहीं चाहते, वे बस इतना चाहते हैं कि बेटे उनका घर खाली कर दें ताकि वे शांति से रह सकें।

कोर्ट ने इस घरेलू दरार को पाटने के लिए 20 फरवरी को पिता और बेटों को आमने-सामने बिठाकर मध्यस्थता (Mediation) की भी कोशिश की थी। लेकिन जजों ने पाया कि एक ही मंजिल पर रहने के बावजूद दोनों पक्षों के बीच बातचीत पूरी तरह बंद थी और उनके बीच गहरी कड़वाहट थी।

बहू के ‘साझा गृहस्थी’ के अधिकार का दावा भी खारिज

मकान पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए बेटों ने एक और कानूनी दांव चला। उन्होंने दलील दी कि उनकी पत्नियों (बुजुर्ग की बहुओं) को घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत इस मकान में रहने का अधिकार है, क्योंकि यह उनकी “साझा गृहस्थी” (Shared Household) है।

हाई कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि मूल दस्तावेजों या पूर्व की सुनवाइयों में घरेलू हिंसा का कोई जिक्र या आरोप नहीं था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना किसी आधार या पिछली शिकायतों के, अपील के चरण में पहली बार ऐसा दावा नहीं किया जा सकता।

साथ ही, अदालत ने कहा कि चूंकि बेटों ने खुद माना था कि वे पिता की अनुमति से वहां रह रहे थे और संपत्ति पर उनका कोई स्वतंत्र मालिकाना हक नहीं है, इसलिए वे इस “परमीसिव ऑक्यूपेशन” (सहमति से रहने) का फायदा उठाकर अपने पिता को उनके ही घर में बंधक जैसी स्थिति में नहीं रख सकते।

टूटते संयुक्त परिवार और सामाजिक बदलाव पर कोर्ट की चिंता

फैसला सुनाते हुए खंडपीठ ने देश के बदलते सामाजिक ताने-बाने और संयुक्त परिवार प्रणाली के बिखरने पर भी गहरी चिंता व्यक्त की।

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अदालत ने कहा कि बदलते दौर में बड़ी संख्या में बुजुर्ग भावनात्मक उपेक्षा, असुरक्षा और शारीरिक-वित्तीय सहायता की कमी का सामना कर रहे हैं। यदि बुजुर्गों को अपने ही बच्चों के कारण डर और तनाव के माहौल में रहने को मजबूर होना पड़े, तो केवल लिखित हस्तांतरण विलेख (Formal Deed of Transfer) न होने के आधार पर प्रशासन और कानून मूकदर्शक बनकर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकते।

कोर्ट ने दोहराया, “2007 के अधिनियम का मूल उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों के जीवन, गरिमा, निवास और संपत्ति की रक्षा करना है।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जो कोई भी वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति का वारिस बनने वाला है, उसका यह नैतिक और कानूनी कर्तव्य है कि वह उनकी देखभाल करे।

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने दोनों बेटों को स्वेच्छा से घर खाली करने और अपने पिता को उनका सुकून वापस लौटाने के लिए 90 दिनों का समय दिया है।

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