हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना, क्रूरता और स्त्रीधन हड़पने के एक मामले में आरोपी पति और ससुराल वालों के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है। इस मामले में कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका को वैवाहिक कानूनों के दुरुपयोग को रोकने और वास्तविक पीड़ितों के हितों की रक्षा करने के बीच एक ‘बारीक संतुलन’ (Fine Balance) बनाना होगा।
न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि जब एफआईआर में आरोपियों की विशिष्ट और अलग-अलग भूमिकाओं का स्पष्ट उल्लेख हो, तो आरोपों को सामान्य या अस्पष्ट बताकर खारिज नहीं किया जा सकता।
“अदालत को एक बारीक संतुलन बनाना होगा। उसे यह देखना होगा कि आईपीसी की धारा 498ए (क्रूरता) के तहत लगाए गए आरोप पति के रिश्तेदारों को केवल घसीटने के लिए सामान्य, अस्पष्ट या सर्वव्यापी तो नहीं हैं। लेकिन इसके साथ ही, अदालत को धारा 498ए के तहत दर्ज किसी वास्तविक मामले को शुरुआत में ही खत्म नहीं कर देना चाहिए।” — जस्टिस राकेश कैंथला, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस चरण में अदालत आरोपों की सत्यता की जांच करने के लिए किसी ‘मिनी-ट्रायल’ (लघु सुनवाई) का सहारा नहीं ले सकती।
शादी से पहले और बाद की मांगें: क्या है पूरा विवाद?
अदालत के दस्तावेजों के अनुसार, पीड़िता की शादी मार्च 2024 में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी। लेकिन पत्नी का आरोप है कि प्रताड़ना का दौर शादी से पहले ही शुरू हो गया था, जब लड़के वालों ने अपनी पसंद की जगह पर शादी करने का दबाव बनाया और दहेज की मांगें रखीं।
लड़की के परिवार का कहना है कि उन्होंने सामर्थ्य के अनुसार कपड़े और 20 तोला सोने-चांदी के आभूषण दिए थे। इसके बावजूद ससुराल वाले संतुष्ट नहीं हुए। आरोप है कि शादी के बाद पीड़िता पर मायके से एक बड़ी गाड़ी और अपने पिता से 50 लाख रुपये की फिक्स डिपॉजिट (FD) कराने का दबाव बनाया गया। जब महिला ने अपने परिवार की आर्थिक तंगी का हवाला दिया, तो उसे शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा।
शिकायत में घरेलू अपमान के कुछ बेहद गंभीर और संवेदनशील उदाहरण भी दिए गए हैं:
- चप्पल दिखाकर अपमान: पीड़िता का आरोप है कि उसकी ननद ने उसके चेहरे के सामने चप्पल लहराकर उसका अपमान किया और कहा कि इस घर में उसकी हैसियत ‘जूते के बराबर’ है।
- राजनीतिक रसूख का दबाव: ननद के ट्रांसफर के लिए पीड़िता पर अपने मायके के राजनीतिक संपर्कों का इस्तेमाल करने का दबाव बनाया गया।
- साजिश का आरोप और सुलह की शर्त: जब पति से जुड़े एक मामले में पुलिस ने छापेमारी की, तो ननद ने इसका दोष पत्नी के परिवार पर मढ़ दिया। वहीं, सास ने मामले को रफा-दफा करने के लिए राजनीतिक प्रभाव और पैसों का इस्तेमाल करने का दबाव डाला।
घर के बंद दरवाजे और गायब हुआ ‘स्त्रीधन’
वैवाहिक विवाद तब और गहरा गया जब अगस्त 2024 में पत्नी ने अपना ससुराल छोड़ दिया। पति का दावा था कि वह बिना किसी ठोस कारण के घर छोड़कर गई है। वहीं, पत्नी का आरोप है कि पति ने उसे वापस ले जाने के लिए 60 से 70 लाख रुपये की अतिरिक्त मांग रखी थी, जिसे पूरा न करने पर उसने साथ रखने से मना कर दिया।
इसके बाद, पति ने दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights) के लिए अदालत में याचिका दायर कर दी।
विवाद में एक नया मोड़ नवंबर 2024 में आया, जब पीड़िता अपने माता-पिटा, रिश्तेदारों और स्थानीय पंचायत सदस्यों के साथ ससुराल वापस लौटी। लेकिन आरोप है कि उसकी सास ने उसे घर में घुसने नहीं दिया और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। इसके बाद जब पीड़िता ने अलमारी में रखे अपने कपड़ों और गहनों की जांच करनी चाही, तो वे गायब मिले। इस घटना से तंग आकर महिला ने दिसंबर 2024 में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर क्रूरता, आपराधिक धमकी और अमानत में खयानत (स्त्रीधन की हेराफेरी) का मामला दर्ज हुआ।
कोर्ट रूम का ड्रामा: दोनों पक्षों की दलीलें
हाई कोर्ट में पति के वकील वाई. पी. सूद ने तर्क दिया कि महिला द्वारा लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह झूठे, मनगढ़ंत और बेबुनियाद हैं। उन्होंने दलील दी कि पति द्वारा दाम्पत्य अधिकारों की बहाली के लिए दायर की गई याचिका के ‘जवाब’ (Counterblast) के रूप में यह एफआईआर दर्ज कराई गई है, ताकि ससुराल पक्ष को परेशान किया जा सके।
दूसरी ओर, राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) जितेंद्र शर्मा ने एफआईआर को रद्द करने का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट के सामने तर्क रखा कि पीड़िता ने केवल हवा-हवाई बातें नहीं की हैं, बल्कि प्रताड़ना के विशिष्ट उदाहरण पेश किए हैं। इसमें पैसों और गाड़ी की मांग, चप्पल दिखाकर किया गया अपमान, राजनीतिक रसूख का दबाव और सास-ननद द्वारा उसके स्त्रीधन (गहनों व कपड़ों) को गायब करना शामिल है।
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह माना कि आरोपों की प्रकृति ऐसी है जिसकी निचली अदालत में पूरी और निष्पक्ष सुनवाई होनी जरूरी है। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए मामले के ट्रायल का रास्ता साफ कर दिया है।

