‘विचारों पर कोई कॉपीराइट नहीं होता’: प्रशांत किशोर को बड़ी राहत, पटना हाईकोर्ट ने खारिज की 6 साल पुरानी FIR

पटना हाईकोर्ट ने जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर (पीके) को एक बड़े कानूनी मामले में राहत दी है। अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज छह साल पुरानी प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को रद्द कर दिया है, जिसमें उन पर बौद्धिक संपदा (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी) की चोरी का आरोप लगाया गया था। न्यायमूर्ति संदीप कुमार ने स्पष्ट किया कि विचारों और विषयों (आइडिया और थीम) पर कॉपीराइट का दावा करके आपराधिक कानून का सहारा नहीं लिया जा सकता, विशेषकर तब जब मामला पहले से ही दीवानी अदालत (सिविल कोर्ट) में लंबित हो।

क्या है पूरा विवाद?

इस कानूनी विवाद की शुरुआत पटना के पाटलिपुत्र थाने में दर्ज कराई गई एक शिकायत से हुई थी। यह शिकायत शाश्वत गौतम नामक व्यक्ति ने दर्ज कराई थी, जो पहले प्रशांत किशोर की संस्था इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) में उनके सहयोगी के रूप में काम कर चुके थे। कांग्रेस के पूर्व नेता और वर्तमान में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) से जुड़े शाश्वत गौतम ने आरोप लगाया था कि प्रशांत किशोर ने उनके रचनात्मक विचारों को चुराया है।

आरोपों के मुताबिक, प्रशांत किशोर ने साल 2020 में “बात बिहार की” नाम से एक राजनीतिक अभियान शुरू किया था। गौतम का दावा था कि यह विचार उनका था जिसे किशोर ने अवैध रूप से अपना लिया। इस विवाद और FIR दर्ज होने के बाद “बात बिहार की” अभियान को बीच में ही रोक देना पड़ा था।

इसके बाद, प्रशांत किशोर ने एक नया अभियान “जन सुराज” शुरू किया। इस अभियान के तहत उन्होंने पूरे बिहार में एक लंबी ‘पदयात्रा’ की, जिसने आगे चलकर एक औपचारिक राजनीतिक दल का रूप ले लिया।

समानांतर सिविल मुकदमा (दीवानी कार्यवाही)

मामले की सुनवाई के दौरान पटना हाईकोर्ट ने इस विवाद के कानूनी सफर पर भी गौर किया। 50 से अधिक पन्नों के अपने विस्तृत आदेश में कोर्ट ने रेखांकित किया कि शिकायतकर्ता शाश्वत गौतम इस मामले में पहले ही दीवानी अदालत का दरवाजा खटखटा चुके हैं।

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गौतम ने इस विवाद को लेकर एक ‘टाइटल सूट’ (स्वत्वाधिकार मुकदमा) दायर किया था, जो अभी भी संबंधित सिविल कोर्ट में लंबित है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां

पटना हाईकोर्ट ने बौद्धिक संपदा अधिकारों की सीमा और इस तरह के विवादों में आपराधिक कानून के इस्तेमाल पर विस्तार से विश्लेषण किया।

न्यायमूर्ति संदीप कुमार ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि कानून अमूर्त विचारों को संरक्षण नहीं देता। उन्होंने कहा:

“किसी विचार (आइडिया), विषय-वस्तु (सब्जेक्ट मैटर) और थीम पर कोई कॉपीराइट नहीं हो सकता।”

अदालत ने दीवानी या बौद्धिक संपदा से जुड़े विवादों को सुलझाने के लिए पुलिस और आपराधिक न्याय प्रणाली के इस्तेमाल की कड़ी आलोचना की। न्यायमूर्ति कुमार ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:

“शिकायतकर्ता आपराधिक कानून की कठोरता को लागू कराने के लिए ‘बौद्धिक संपदा’ शब्द का उपयोग किसी जादू-टोने या मंत्र की तरह नहीं कर सकता।”

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में प्रशांत किशोर के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। अदालत ने अपने फैसले में लिखा:

“शिकायतकर्ता को इस दीवानी मामले को आपराधिक रंग देने की अनुमति नहीं दी जा सकती… अदालत का मानना है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ इस आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग के अलावा और कुछ नहीं है। इसलिए इस याचिका को स्वीकार किया जाता है।”

इन टिप्पणियों के साथ पटना हाईकोर्ट ने प्रशांत किशोर की याचिका को मंजूर करते हुए उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को पूरी तरह रद्द कर दिया।

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