‘स्वतंत्रता केवल होनी नहीं चाहिए, दिखनी भी चाहिए’: चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के नए कानून पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि लोकतंत्र की पवित्रता एक पूर्णतः स्वायत्त चुनाव आयोग पर निर्भर करती है। कोर्ट ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के “मूल ढांचे” (Basic Structure) का हिस्सा हैं और इसे तब तक सुनिश्चित नहीं किया जा सकता जब तक चुनाव आयोग स्वतंत्र न हो और उसकी स्वतंत्रता स्पष्ट रूप से दिखाई न दे।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने यह टिप्पणियां ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली छह याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई के दौरान कीं।

2 जनवरी, 2024 को लागू हुए 2023 के इस नए कानून ने देश के शीर्ष चुनाव अधिकारियों की चयन प्रक्रिया को बदल दिया है। नए प्रावधानों के अनुसार, राष्ट्रपति द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति एक चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है।

इस समिति में शामिल हैं:

  1. प्रधानमंत्री
  2. एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री
  3. लोकसभा में विपक्ष के नेता
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याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि इस कानून ने चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाकर एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया है, जिससे समिति का झुकाव कार्यपालिका (Executive) की ओर अधिक हो गया है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने आयोग की तटस्थता को लेकर जनमानस की धारणा पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग का केवल स्वतंत्र होना ही काफी नहीं है; उसे स्वतंत्र दिखना भी चाहिए।”

चयन समिति की संरचना पर सवाल उठाते हुए बेंच ने पूछा कि एक तटस्थ व्यक्ति के बजाय कैबिनेट मंत्री को ही क्यों चुना गया? कोर्ट ने टिप्पणी की, “विश्वास का स्तर उस सीमा तक होना चाहिए जैसे कि समिति में कोई तीसरा निष्पक्ष व्यक्ति हो। इसमें कैबिनेट के ही मंत्री क्यों होने चाहिए?”

कानून का बचाव करते हुए अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने तर्क दिया कि संसद के पास इस विषय पर कानून बनाने का पूर्ण अधिकार है। उन्होंने कहा कि ‘अनूप बरनवाल’ फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाई गई व्यवस्था एक “अस्थायी” उपाय था, जो केवल संसद द्वारा कानून बनाने तक के लिए था।

अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट को “विधायिका के कार्यक्षेत्र में प्रवेश” करने के प्रति आगाह किया। उन्होंने कहा, “पुडिंग का स्वाद उसे खाने के बाद ही पता चलता है। जब तक चुनाव आयुक्त अपने कामकाज में स्वतंत्रता की कमी नहीं दिखाते, तब तक इस कानून को अवैध नहीं माना जा सकता।” उन्होंने तर्क दिया कि कोर्ट को केवल “परिकल्पित पूर्वाग्रह” के आधार पर किसी कानून को रद्द नहीं करना चाहिए।

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याचिकाकर्ता एनजीओ ‘लोक प्रहरी’ की ओर से पूर्व आईएएस अधिकारी एस.एन. शुक्ला ने इस अधिनियम को “संविधान के साथ धोखाधड़ी” करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने बिल पारित करते समय संसद से महत्वपूर्ण जानकारी छिपाकर न्यायिक सुरक्षा उपायों को दरकिनार किया है।

शुक्ला ने तर्क दिया कि वर्तमान प्रक्रिया पूरी तरह से “एकतरफा” है, जिसमें विपक्ष के नेता की असहमति को सरकार के दो प्रतिनिधियों द्वारा आसानी से खारिज किया जा सकता है। उन्होंने मौजूदा नियुक्तियों की योग्यता पर भी सवाल उठाए। हालांकि, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने नियुक्त अधिकारियों का बचाव करते हुए कहा कि वे अनुभवी आईएएस अधिकारी हैं जिन्होंने जिला कलेक्टर और चुनाव अधिकारी के रूप में लंबे समय तक काम किया है।

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मामले की गंभीरता को देखते हुए बेंच ने इस पर चर्चा की कि क्या इसमें संविधान के अनुच्छेद 14 और 324 की व्याख्या से जुड़ा कोई “कानून का सारवान प्रश्न” (Substantial question of law) शामिल है। कोर्ट ने इसे पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजने की संभावना पर भी विचार किया।

जहां अटॉर्नी जनरल ने इस विचार का समर्थन किया, वहीं याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि मौजूदा बेंच ही इस पर फैसला लेने में सक्षम है। मामले की सुनवाई अभी अधूरी है और आगे भी जारी रहेगी।

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