सीएम विजय के विश्वास मत पर बढ़ा विवाद: सुप्रीम कोर्ट पहुंची याचिका, सीबीआई जांच और राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और ‘तमिलागा वेत्री कड़गम’ (TVK) के प्रमुख विजय द्वारा हाल ही में जीते गए विश्वास मत (ट्रस्ट वोट) का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर पहुंच गया है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर इस बहुमत परीक्षण के दौरान हुए कथित भ्रष्टाचार और विधायकों की खरीद-फरोख्त (हॉर्स-ट्रेडिंग) की सीबीआई (CBI) जांच कराने की मांग की गई है। इसके साथ ही याचिकाकर्ता ने राज्य विधानसभा को भंग करने और जांच पूरी होने तक तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन लागू करने की गुहार लगाई है।

यह कानूनी चुनौती मुख्यमंत्री विजय द्वारा 13 मई को विधानसभा में जीते गए उस विश्वास मत के खिलाफ है, जिसके दम पर उन्होंने राज्य की सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत की थी।

रातों-रात 12 विधायकों के समर्थन पर उठे सवाल

मदुरै के निवासी के. के. रमेश द्वारा दायर की गई इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि तमिलनाडु विधानसभा में हुआ फ्लोर टेस्ट लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। हालांकि मुख्यमंत्री विजय ने 144 बनाम 22 मतों के अंतर से विश्वास मत आसानी से जीत लिया था, लेकिन याचिकाकर्ता ने इस आंकड़े को हासिल करने के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

याचिका के अनुसार, चुनावों में टीवीके (TVK) ने केवल 108 सीटें जीती थीं, लेकिन पार्टी ने रातों-रात अन्य राजनीतिक दलों के 12 विधायकों के हस्ताक्षर और समर्थन हासिल कर लिए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह अचानक मिला समर्थन किसी वैचारिक समझौते का नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे चली बड़ी सियासी सौदेबाजी का नतीजा था।

“तमिलनाडु विधानसभा में अन्य दलों के कुछ विधायकों के साथ खरीद-फरोख्त की गई और टीवीके द्वारा उन्हें मोटी रकम सौंपी गई। इसके पीछे बड़े पैमाने पर समझौते किए गए और पैसे बांटे गए,” याचिका में दावा किया गया है।

विधानसभा को भंग करने और राष्ट्रपति शासन की मांग

याचिकाकर्ता का तर्क है कि भ्रष्टाचार के इन गंभीर आरोपों के कारण वर्तमान सरकार की लोकतांत्रिक वैधता संदिग्ध हो जाती है। ऐसे में याचिका में सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप करने की मांग की गई है, ताकि विधानसभा को तुरंत भंग किया जा सके और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी जा सके।

साथ ही, याचिकाकर्ता का कहना है कि जांच के दौरान प्रशासनिक स्तर पर किसी भी तरह के प्रभाव या हस्तक्षेप को रोकने के लिए, जब तक सीबीआई अपनी रिपोर्ट सौंप नहीं देती, तब तक तमिलनाडु में शासन की कमान राष्ट्रपति शासन के अधीन कर दी जानी चाहिए।

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सुप्रीम कोर्ट आने वाले दिनों में इस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करने पर विचार कर सकता है।

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