इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पत्नी का सरकारी नौकरी पाना परिस्थितियों में एक महत्वपूर्ण बदलाव (change in circumstances) माना जाएगा। यह बदलाव सीआरपीसी की धारा 125 के तहत बकाया गुजारा भत्ता (maintenance) देने की अवधि को सरकारी सेवा में शामिल होने से ठीक पहले तक सीमित करने का एक ठोस और पर्याप्त आधार है। इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने एक पुनरीक्षण याचिका (criminal revision petition) को खारिज कर दिया और फैमिली कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया जिसमें पति को केवल उस तारीख तक ₹10,000 प्रति माह गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था जब तक कि पत्नी बिहार में सरकारी शिक्षिका के रूप में नियुक्त नहीं हो गई थी।
हाईकोर्ट की एकल पीठ के जस्टिस अचल सचदेव ने अपने फैसले में कहा कि गुजारा भत्ता सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का एक जरिया है। हालांकि, जैसे ही पत्नी को सरकारी नौकरी के रूप में आजीविका का एक स्थिर, विश्वसनीय और निश्चित आय वाला जरिया मिल जाता है, पति का उसे आर्थिक सहायता प्रदान करने का दायित्व समाप्त हो जाता है।
मामले की पृष्ठभूमि
पुनरीक्षणकर्ता (पत्नी) और विपक्षी संख्या 2 (पति) का विवाह 22 मई 2017 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ था। पुनरीक्षणकर्ता का आरोप था कि विदाई के अगले ही दिन से पति और उसके ससुराल वाले दहेज में ‘स्विफ्ट डिजायर’ कार की मांग को लेकर उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने लगे। उसे लगातार ताने दिए गए, गालियां दी गईं और उसके साथ मारपीट की गई।
पुनरीक्षणकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि उसके पति का किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध था और वह उसके साथ विवाह कर नया परिवार बसाना चाहता था। इन प्रताड़नाओं से तंग आकर पत्नी ने अपने ससुराल वालों के खिलाफ कोतवाली थाना, जिला बस्ती में आईपीसी की धारा 498-ए, 323, 504, 506, 316 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत केस क्राइम नंबर 356/2019 के अंतर्गत प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई।
इसके बाद, पुनरीक्षणकर्ता ने 14 जुलाई 2019 को दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ते के लिए आवेदन दायर किया। उसने बताया कि वह एक शिक्षित लेकिन बेरोजगार महिला है, जिसके पास आय का कोई साधन नहीं है और वह अपने माता-पिता पर निर्भर होकर अत्यंत दयनीय जीवन जीने को मजबूर है।
अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, बस्ती ने 14 मार्च 2024 को इस मामले (भरण-पोषण वाद संख्या 277/2019) में आंशिक रूप से आवेदन को स्वीकार किया। फैमिली कोर्ट ने पति को आवेदन की तिथि (14 जुलाई 2019) से लेकर 8 फरवरी 2024 तक ₹10,000 प्रति माह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। कोर्ट ने इस अवधि को इसलिए सीमित किया क्योंकि पत्नी ने 9 फरवरी 2024 को बिहार में एक सरकारी शिक्षिका के रूप में कार्यभार संभाल लिया था। फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई इस समय-सीमा से असहमत होकर पुनरीक्षणकर्ता ने फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 96(4) के साथ पठित सीआरपीसी की धारा 397/401 के तहत हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की थी।
पक्षों की दलीलें
पुनरीक्षणकर्ता (पत्नी) की दलीलें
पुनरीक्षणकर्ता के विद्वान अधिवक्ता श्री अश्वनी कुमार मिश्रा ने तर्क दिया कि उनकी मुवक्किल बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रही है। वहीं, पति जो एक क्लर्क के रूप में कार्यरत है और लगभग ₹50,000 मासिक वेतन पाता है, अपनी पूरी कमाई उस दूसरी महिला पर खर्च कर देता है।
पुनरीक्षणकर्ता के वकील ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले नेहा माथुर और अन्य बनाम डॉ. अरविंद किशोर (आपराधिक विविध आवेदन संख्या 243/2022) के कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी की। इस मामले में स्पष्ट किया गया था कि पत्नी कमाने के बावजूद अपने पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है, और परित्याग (desertion) का आरोप भी उसे इस अधिकार से वंचित नहीं करता।
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय चतुर्भुज बनाम सीता बाई (आपराधिक अपील संख्या 1627/2007) का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि पति से अलग रह रही पत्नी तब भी गुजारा भत्ता मांग सकती है जब वह खुद कुछ कमा रही हो, बशर्ते वह आय उसके स्वावलंबन और सम्मानजनक जीवन के लिए “पर्याप्त न हो”।
विपक्षी संख्या 2 (पति) की दलीलें
दूसरी ओर, पति के विद्वान अधिवक्ता श्री शीतला प्रसाद पांडे ने दलील दी कि यह विवाह बिना किसी दहेज के संपन्न हुआ था। उन्होंने दावा किया कि 14 दिसंबर 2018 को पुनरीक्षणकर्ता प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के बहाने अपने पिता के साथ मायके चली गई और फिर कभी वापस नहीं लौटी, भले ही पति ने उसे वापस लाने के लिए कई बार मध्यस्थता (mediation) का सहारा लिया।
पति के वकील ने पुनरीक्षणकर्ता की जिरह (cross-examination) का हवाला देते हुए बताया कि उसने स्वयं स्वीकार किया था कि शादी के बाद उसकी पढ़ाई और कोचिंग का सारा खर्च पति ने ही उठाया था, जो पत्नी के प्रति उसके गंभीर और सहयोगी रवैये को दर्शाता है। यह भी तर्क दिया गया कि चूंकि पत्नी 9 फरवरी 2024 से बिहार में सरकारी शिक्षिका के रूप में कार्यरत है और खुद का भरण-पोषण करने में पूरी तरह सक्षम है, इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा गुजारा भत्ते की अवधि को 8 फरवरी 2024 तक सीमित करना पूरी तरह तर्कसंगत और न्यायसंगत है। इसमें किसी भी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और न्यायिक सिद्धांत
कानूनी ढांचे का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि सीआरपीसी की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता [BNSS] की धारा 144) और हिंदू दत्तक ग्रहण तथा भरण-पोषण अधिनियम (HAMA) की धारा 18 का मूल उद्देश्य यही है कि पीड़ित पक्षकार “अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ” हो।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी का सरकारी नौकरी प्राप्त करना सीआरपीसी की धारा 127 (अब BNSS की धारा 146) के तहत “परिस्थितियों में बदलाव” की श्रेणी में आता है। यह बदलाव गुजारा भत्ते की राशि और अवधि को संशोधित या सीमित करने का एक पर्याप्त आधार है।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले रजनीश बनाम नेहा (2021) 2 SCC 324 का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि वैसे तो गुजारा भत्ता सामान्यतः आवेदन की तारीख से दिया जाना चाहिए, लेकिन कोर्ट को दोनों पक्षों के जीवन स्तर, वास्तविक आय और क्षमता के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है:
“यदि दावा करने वाला पक्षकार/पति-पत्नी मामले के लंबित रहने के दौरान पर्याप्त आय या वेतन अर्जित करना शुरू कर देता है, तो कोर्ट के पास बकाया राशि की सीमा को उस विशिष्ट तिथि तक सीमित करने का विवेकाधिकार होता है।”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले कैप्टन रमेश चंद्र कौशल बनाम श्रीमती वीणा कौशल (1978) 4 SCC 70 का भी उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट किया गया है:
“…गुजारा भत्ता सामाजिक न्याय का एक उपाय है। जैसे ही पत्नी अपनी आजीविका के लिए एक स्थिर और विश्वसनीय स्रोत हासिल कर लेती है, यह सामाजिक आवश्यकता समाप्त हो जाती है। चूंकि सरकारी नौकरी धारा 127 CrPC (146 BNSS) के तहत एक निश्चित और सत्यापित आय प्रदान करती है, इसलिए पति का उसे आर्थिक सहायता प्रदान करने का दायित्व भी समाप्त हो जाता है…”
हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि नौकरीपेशा पत्नी केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही अतिरिक्त भरण-पोषण की मांग कर सकती है:
“…वह केवल तभी गुजारा भत्ता का दावा कर सकती है जब सरकारी नौकरी से मिलने वाला वेतन पति की आय की तुलना में बहुत कम हो या उसके पिछले जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए नाकाफी हो। ऐसी स्थिति में पत्नी पूरक गुजारा भत्ता (supplementary maintenance) के लिए तर्क दे सकती है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
इन सिद्धांतों को मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट का यह निष्कर्ष पूरी तरह सही था कि आवेदन दाखिल करने की तिथि (14 जुलाई 2019) से लेकर 8 फरवरी 2024 तक पुनरीक्षणकर्ता के पास आय का कोई पर्याप्त स्रोत नहीं था।
चूंकि पुनरीक्षणकर्ता को सरकारी नौकरी मिल गई और उसने 9 फरवरी 2024 को शिक्षिका के रूप में कार्यभार संभाल लिया, इसलिए वह केवल नौकरी शुरू करने से पहले की अवधि के लिए ही ₹10,000 प्रति माह गुजारा भत्ता पाने की हकदार है।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 14 मार्च 2024 के आदेश को पूरी तरह “तर्कसंगत और न्यायसंगत” मानते हुए पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
- मामले का शीर्षक : श्रीमती अनुराधा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
- मामला संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 2818/2024
- पीठ: जस्टिस अचल सचदेव
- दिनांक : 15 मई, 2026

