हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अदालतें किसी भी विवाहेतर (adulterous) रिश्ते को “न्यायिक मान्यता या संरक्षण” नहीं दे सकती हैं। कोर्ट ने एक विवाहित महिला के साथ लिव-इन में रहने वाले एक व्यक्ति की उस बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उसने महिला की कस्टडी मांगी थी।
मुख्य न्यायाधीश जी. एस. संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अदालत वैवाहिक मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग नहीं करेगी।
पीठ ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “याचिकाकर्ता और महिला के बीच स्पष्ट रूप से चल रहे व्यभिचारी रिश्ते (adulterous relationship) को किसी भी तरह की न्यायिक स्वीकृति नहीं दी जा सकती।”
‘खास दोस्त’ की याचिका और लिव-इन एग्रीमेंट का सच
मामले की शुरुआत तब हुई जब याचिकाकर्ता ने खुद को महिला का “करीबी दोस्त” बताते हुए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। याचिका में दावा किया गया था कि महिला शादीशुदा है और उसका एक बच्चा भी है। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसे महिला से कई ऐसे संदेश मिले हैं जिनमें उसने अपने पति और सास से अपनी जान को खतरा बताया है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से महिला को उसके चंगुल से “मुक्त” कराने की गुहार लगाई थी।
हालांकि, जब सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों के संबंधों की प्रकृति पर सवाल उठाए, तो याचिकाकर्ता ने स्वीकार किया कि वे दोनों शारीरिक संबंध और लिव-इन रिलेशनशिप में थे। अपने इस दावे को साबित करने के लिए उसने कोर्ट के सामने 17 दिसंबर, 2025 का एक आपसी लिव-इन समझौता पत्र (live-in agreement) भी पेश किया।
हाईकोर्ट ने इस याचिका को “पोषणीय (maintainable) नहीं” माना। कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि महिला फिलहाल अपने पति और बच्चे के साथ रह रही है, जो याचिकाकर्ता के दावों के विपरीत है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला इस मामले में क्यों नहीं हुआ लागू?
याचिकाकर्ता के वकील ने महिला की कस्टडी हासिल करने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के एक प्रसिद्ध फैसले ‘देवू जी. नायर बनाम केरल राज्य व अन्य’ का हवाला दिया था।
लेकिन हिमाचल हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का वह मामला एक शादीशुदा महिला का नहीं था जो अपने पति के साथ रह रही हो। वह मामला एक अविवाहित महिला से जुड़ा था जो अपने माता-पिता के साथ रह रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने वे दिशानिर्देश विशेष रूप से समलैंगिक (LGBTQ) समुदाय के सदस्यों और करीबी साथियों को अवैध हिरासत से बचाने और उनकी गरिमा की रक्षा के लिए जारी किए थे।
इस प्रकार, हाईकोर्ट ने माना कि सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला इस मामले में याचिकाकर्ता के किसी काम का नहीं है।
विवाहेतर संबंधों और पारिवारिक विवादों पर अन्य हाईकोर्ट के हालिया फैसले
हिमाचल हाईकोर्ट का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश की अन्य उच्च अदालतों ने भी वैवाहिक अधिकारों और विवाहेतर संबंधों को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी सीमाएं तय की हैं।
कर्नाटक हाईकोर्ट: पति का अफेयर होने पर पत्नी का अलग रहना ‘परित्याग’ नहीं
बीते 28 अप्रैल को कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज और न्यायमूर्ति डॉ. चिलाकुर सुमालता की खंडपीठ ने एक बड़ा फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई पत्नी अपने पति के विवाहेतर संबंधों के कारण उसका घर छोड़ती है, तो इसे कानूनन “परित्याग” (desertion) नहीं बल्कि “न्यायसंगत अलगाव” (justified withdrawal) माना जाएगा।
अदालत ने कहा, “किसी भी जीवनसाथी को कानूनन या नैतिक रूप से ऐसे साथी के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो किसी तीसरे व्यक्ति के साथ संबंध बनाए हुए हो।” कोर्ट ने आगे जोड़ा कि कानून किसी को भी ऐसे रिश्ते में रहने के लिए बाध्य नहीं करता जो “अकारण, असुरक्षित या अपमानजनक” हो।
उत्तराखंड हाईकोर्ट: बच्चे की निजता का अधिकार माता-पिता के आरोपों से बड़ा
एक अन्य हालिया फैसले में, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उस पति की याचिका को खारिज कर दिया जो अपनी पत्नी के कथित अफेयर को साबित करने के लिए अपने नाबालिग बच्चे का डीएनए (DNA) टेस्ट कराना चाहता था।
न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की पीठ ने पारिवारिक अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि वैवाहिक विवाद को सुलझाने के लिए किसी मासूम बच्चे को पितृत्व परीक्षण (paternity test) से गुजारना बच्चे की निजता और गरिमा में एक “अनावश्यक हस्तक्षेप” होगा।

