सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में सिख धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत संपत्तियों के प्रबंधन, ऑडिट और उनके संरक्षण के लिए एक व्यापक प्रणाली बनाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि याचिका में उठाई गईं मांगें पूरी तरह से विधायी (legislative) दायरे में आती हैं। अदालत ने कहा कि न्यायिक अतिक्रमण और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप के संदेह से बचने के लिए याचिकाकर्ता को अपनी चिंताओं को सीधे संसद की ‘याचिका समिति’ (Parliamentary Petitions Committee) के समक्ष उठाना चाहिए।
अदालत में याचिकाकर्ता की भावुक अपील
सुनवाई के दौरान कोर्ट में बेहद भावुक दृश्य देखने को मिला। दिल्ली के एक सिख संगठन से जुड़े याचिकाकर्ता चरणजीत सिंह ने व्यक्तिगत रूप से पेश होकर पीठ के समक्ष अपनी दलीलें रखीं। बहस के दौरान एक समय ऐसा आया जब वे जजों के सामने नतमस्तक हो गए। उन्होंने हाथ जोड़कर भावुक स्वर में कहा, “मैं आपके आगे झुकता हूँ। कृपया मेरी इस याचिका पर कम से कम एक नोटिस जारी कर दीजिए।”
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के प्रति सहानुभूति व्यक्त की, लेकिन साथ ही कानून की सीमाओं को भी रेखांकित किया।
चीफ जस्टिस ने कहा, “यह अदालत आपके लिए हमेशा खुली है, आप जब चाहें आ सकते हैं। लेकिन जिन सुधारों की आप मांग कर रहे हैं, उनके लिए मौजूदा कानून में बदलाव करने होंगे। इसके लिए आपको संसद का रुख करना होगा।”
कोर्ट ने संवेदनशीलता का हवाला देते हुए आगे कहा, “यदि हम इस स्तर पर सीधे दखल देते हैं, तो ऐसा संदेश जा सकता है कि अदालत धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर रही है।” हालांकि, पीठ ने याचिकाकर्ता के लिए एक रास्ता खुला रखा और कहा कि यदि वे संसद के जवाब से असंतुष्ट रहते हैं, तो भविष्य में दोबारा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
जनहित याचिका (PIL) में क्या थीं मुख्य मांगें?
इस याचिका के जरिए देश भर में सिख विरासत और धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन में एक बड़े प्रशासनिक और वित्तीय बदलाव की मांग की गई थी। याचिका में निम्नलिखित मुख्य निर्देश देने का आग्रह किया गया था:
- राष्ट्रीय प्राधिकरण का गठन: केंद्र सरकार को एक ‘नेशनल खालसाई सिख हेरिटेज प्रोटेक्शन अथॉरिटी’ बनाने का निर्देश दिया जाए, जो देश भर में सिख ऐतिहासिक संपत्तियों की पहचान, सुरक्षा और ऑडिट कर सके।
- राज्यों से संपत्तियों का ब्योरा: सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया जाए कि वे अपने क्षेत्र में आने वाली सिख धार्मिक संपत्तियों, उनके मालिकाना हक, पट्टे (lease), हस्तांतरण और अवैध कब्जों का पूरा ब्योरा अदालत में पेश करें।
- CAG से विशेष ऑडिट: सिख संपत्तियों की देखरेख करने वाले सभी वैधानिक निकायों, बोर्डों, कमेटियों और ट्रस्टों के वित्तीय खातों का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) से विशेष ऑडिट कराया जाए।
- CBI और ED से जांच: संपत्तियों के अवैध हस्तांतरण, उनके वास्तविक मूल्य से कम पर बेचने, हेराफेरी और इससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) से कराई जाए।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद, इन व्यापक प्रशासनिक और वित्तीय सुधारों की जिम्मेदारी अब पूरी तरह से देश की संसद पर टिकी हुई है।

