“बच्चे की भलाई के लिए अपनी इच्छाओं का बलिदान करें माता-पिता” — ADHD पीड़ित बच्चे की कस्टडी पर कलकत्ता हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

“माता-पिता को अपने बच्चों के सर्वोत्तम हित के लिए अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं का त्याग करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।” कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक विशेष आवश्यकता (ADHD) वाले बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामले में यह भावुक और महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपसी विवादों में उलझे माता-पिता को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे बच्चे का इलाज कर रहे डॉक्टर के भरोसे और उम्मीदों को टूटने न दें।

न्यायाधीश ओम नारायण राय (Justice Om Narayan Rai) की एकल पीठ ने बच्चे की मां की उस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया, जिसमें उन्होंने निचली अदालत के २ मई के आदेश को चुनौती दी थी। निचली अदालत ने गर्मियों की छुट्टियों के दौरान पिता को दो सप्ताह के लिए बड़े बेटे की अस्थायी कस्टडी देने का आदेश दिया था।

बच्चे को अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD) है, जिसे देखते हुए हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की सहमति से १७ मई से शुरू होने वाली ११ दिनों की एक विशेष कस्टडी व्यवस्था तैयार की है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य बच्चे को किसी भी तरह के मानसिक तनाव से बचाना और उसकी दिनचर्या को सामान्य रखना है:

  • शुरुआती ५ दिन (केवल दिन की कस्टडी): पहले पांच दिनों के दौरान पिता को केवल दिन के समय बच्चे को अपने साथ रखने की अनुमति होगी।
  • दूरी और रात की नींद: मां कोलकाता में पिता के घर से महज पांच मिनट की दूरी पर रहेंगी। पिता दिन में कभी भी बच्चे को ले जा सकेंगे, लेकिन रात को गहरी और शांत नींद के लिए बच्चा मां के पास ही लौटेगा।
  • रात की कस्टडी में बदलाव: यदि बच्चा शुरुआती पांच दिनों में पिता के घर के माहौल में पूरी तरह ढल जाता है और सहज महसूस करता है, तो बाकी के दिनों के लिए उसे रात में भी पिता के पास रुकने की अनुमति दी जा सकती है।
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कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि बेंगलुरु से कोलकाता और वापस जाने का मां और बच्चे का पूरा हवाई/यात्रा खर्च पिता वहन करेंगे। इसके साथ ही, बच्चे की दवाइयों और विशेष दिनचर्या से जुड़े पिछले सभी न्यायिक निर्देशों का कड़ाई से पालन किया जाएगा।

सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों को सचेत करते हुए कहा कि यह माता-पिता की सामूहिक जिम्मेदारी है कि बच्चे की स्थिति में सुधार हो, न कि उसमें रत्ती भर भी गिरावट आए।

यह पूरा मामला दोनों बच्चों की कस्टडी को लेकर चल रही एक लंबी कानूनी जंग का हिस्सा है। पिता ने इससे पहले अलीपुर अदालत में ‘गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट, १८९०’ (Guardians and Wards Act, 1890) के तहत कस्टडी के लिए मुख्य याचिका दायर की थी। इसी मामले में उन्होंने गर्मियों की छुट्टियों के लिए अस्थायी कस्टडी का आवेदन किया था, जिस पर निचली अदालत के फैसले के बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा।

हाई कोर्ट में याचिकाकर्ता (मां) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनिरुद्ध चटर्जी (Senior Advocate Aniruddha Chatterjee) पेश हुए, जिन्होंने कोर्ट को आश्वस्त किया कि दोनों के अस्थायी आवासों में केवल पांच मिनट की दूरी होने के कारण यह व्यवस्था पूरी तरह व्यावहारिक है। वहीं, पति का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता प्रबाल कुमार मुखर्जी (Senior Advocate Probal Kumar Mukherjee) ने रखा। अंततः कोर्ट की मध्यस्थता और बच्चों के प्रति संवेदनशील रुख के बाद दोनों पक्ष इस कस्टडी प्लान पर सहमत हुए।

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