केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (N.I. Act) की धारा 138 के तहत एक आपराधिक अभियोजन को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि शिकायत दर्ज करने वाले पावर ऑफ अटॉर्नी धारक ने स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा था कि उसे लेन-देन की सीधी व्यक्तिगत जानकारी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसा न होना दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 465 के तहत एक सुधारात्मक अनियमितता (curable irregularity) है, बशर्ते कि मूल शिकायतकर्ता बाद में ट्रायल कोर्ट के सामने गवाही दे और आरोपी को उससे जिरह (cross-examine) करने का अवसर मिले, क्योंकि ऐसी स्थिति में कोई “न्याय की विफलता” (failure of justice) नहीं होती है।
इस टिप्पणी के साथ, एकल पीठ के न्यायाधीश जस्टिस जी. गिरीश ने एक बंद हो चुकी कंपनी के प्रबंध निदेशक की दोषसिद्धि को बरकरार रखा। हालांकि, हाईकोर्ट ने छह महीने के साधारण कारावास की सजा को संशोधित कर कोर्ट की समाप्ति (imprisonment till the rising of the Court) तक कारावास की सजा में बदल दिया, जबकि मुआवजे के निर्देश को जस का तस रखा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 24 फरवरी 2014 को जारी दो चेक (राशि रुपये 19,75,000/- और रुपये 10,00,000/-) के अनादर (dishonour) से जुड़ा है। यह चेक पुनरीक्षण याचिकाकर्ता (revision petitioner) कन्नन द्वारा शिकायतकर्ता मैसर्स आदिसिव एंटरप्राइजेज (जिसका प्रतिनिधित्व इसके प्रोपराइटर प्रतापचंद्रन आर.के. कर रहे थे) को जारी किए गए थे। कन्नन ने ये चेक अब बंद हो चुकी कंपनी ‘एए काजू कंपनी’ (AA Cashew Company) के प्रबंध निदेशक के रूप में जारी किए थे।
शिकायत शुरू में मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायतकर्ता के पावर ऑफ अटॉर्नी धारक (जो शिकायतकर्ता फर्म के प्रोपराइटर की पत्नी थी) द्वारा दायर की गई थी। हालांकि, शिकायत में यह विशिष्ट दलील शामिल नहीं थी कि पावर ऑफ अटॉर्नी धारक को विवाद का कारण बनने वाले लेन-देन की प्रत्यक्ष व्यक्तिगत जानकारी थी।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) कोर्ट, कोल्लम के समक्ष सुनवाई के दौरान, मूल शिकायतकर्ता स्वयं पीडब्लू1 (PW1) के रूप में उपस्थित हुआ और उसने लेन-देन के संबंध में सबूत पेश किए। ट्रायल कोर्ट ने शिकायतकर्ता की गवाही, प्रदर्श P1 से P9 के रूप में चिह्नित दस्तावेजों और प्रदर्श X1 के रूप में चिह्नित तीसरे पक्ष के दस्तावेज पर भरोसा करते हुए याचिकाकर्ता को एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत दोषी ठहराया।
30 अगस्त, 2016 को सीजेएम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को छह महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई और सीआरपीसी की धारा 357(3) के तहत शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में 29,50,000 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया। मुआवजा न देने पर चार महीने के अतिरिक्त साधारण कारावास की सजा का प्रावधान किया गया था। इस निर्णय को चुनौती दी गई थी, लेकिन अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय-VI, कोल्लम ने 28 फरवरी, 2018 को अपील खारिज कर दी और सजा की पुष्टि की। इन समवर्ती निष्कर्षों से व्यथत होकर याचिकाकर्ता ने पुनरीक्षण (revision) के लिए हाईकोर्ट का रुख किया।
पक्षकारों की दलीलें
पुनरीक्षण याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पूरी आपराधिक कार्यवाही शुरू से ही कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं थी। यह दलील दी गई कि चूंकि पावर ऑफ अटॉर्नी धारक ने शिकायत में यह नहीं बताया था कि उसे मूल लेन-देन की प्रत्यक्ष व्यक्तिगत जानकारी थी, इसलिए मजिस्ट्रेट को अपराध का संज्ञान नहीं लेना चाहिए था और न ही आरोपी को समन जारी करना चाहिए था।
इस तर्क के समर्थन में याचिकाकर्ता के वकील ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के निम्नलिखित फैसलों पर भरोसा किया:
- मैसर्स नरेश पॉटरीज़ बनाम मैसर्स आरती इंडस्ट्रीज़ और अन्य [2025(1) SCR 40]
- नारायणन ए.सी. और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य [(2015) 12 SCC 203]
याचिकाकर्ता ने चेक राशि का भुगतान करने के लिए किसी भी दायित्व के न होने का तर्क भी उठाया और दावा किया कि वे केवल हस्ताक्षरित कोरे चेक (signed blank cheques) थे।
शिकायतकर्ता और केरल राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे लोक अभियोजक (Public Prosecutor) ने निचली अदालतों के समवर्ती निष्कर्षों का समर्थन किया और हाईकोर्ट से पुनरीक्षण याचिका खारिज करने का आग्रह किया।
कोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने सबसे पहले दायित्व की कमी और हस्ताक्षरित कोरे चेक जारी करने से संबंधित तथ्यात्मक निष्कर्षों को संबोधित किया। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने “रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के विस्तृत विश्लेषण के बाद” इन तर्कों को सही ढंग से खारिज कर दिया था। परिणामस्वरूप, कोर्ट को पुनरीक्षण कार्यवाही में उन तथ्यात्मक पहलुओं पर पुनः विचार करने की कोई गुंजाइश नहीं दिखी।
पावर ऑफ अटॉर्नी धारक से संबंधित कानून के सवाल पर जस्टिस जी. गिरीश ने वर्तमान मामले के तथ्यों को याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत पूर्व मिसालों से अलग बताया। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“Naresh Potteries और Narayanan A.C. (supra) में मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी के खिलाफ प्रक्रिया शुरू करने के आदेशों को मजिस्ट्रेट द्वारा पावर ऑफ अटॉर्नी धारक द्वारा दायर शिकायत को फाइलों पर लेने और आरोपी को समन जारी करने के तुरंत बाद चुनौती दी गई थी। वर्तमान मामले में ऐसी कोई त्वरित चुनौती नहीं दी गई थी। इसके अलावा, इस मामले में, मूल शिकायतकर्ता ने खुद मामले के ट्रायल के दौरान सबूत पेश किए थे। इस प्रकार Naresh Potteries और Narayanan A.C. (supra) में सिद्धांत संबंधित मामलों के शुरुआती चरणों में निर्धारित किए गए थे, न कि आरोपी की निष्क्रियता के बाद जिसने मूल शिकायतकर्ता के लिए ट्रायल में उन लेन-देन के बारे में सबूत पेश करने का रास्ता साफ किया, जिसके कारण अपराध हुआ।”
इसके बाद हाईकोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 465 का विश्लेषण किया, जो किसी सक्षम अदालत द्वारा पारित किसी भी निष्कर्ष, सजा या आदेश को शिकायत या कार्यवाही में किसी त्रुटि, चूक या अनियमितता के आधार पर पलटने से रोकती है, जब तक कि “वास्तव में इसके कारण न्याय की विफलता न हुई हो।”
सीआरपीसी की धारा 465(2) के तहत, अदालत को इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या आपत्ति कार्यवाही के शुरुआती चरण में उठाई जा सकती थी और उठाई जानी चाहिए थी। हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया कि याचिकाकर्ता ने ट्रायल शुरू होने से पहले मजिस्ट्रेट द्वारा शिकायत का संज्ञान लेने पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी, और न ही उस चरण में हाईकोर्ट के समक्ष उचित प्रक्रिया अपनाकर आदेश को चुनौती दी थी।
“न्याय की विफलता” के मानकों को समझने के लिए, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले कर्नाटक राज्य लोकायुक्त पुलिस बनाम सुब्बेगौड़ा [(2023) 17 SCC 699] का उल्लेख किया, जिसमें मध्य प्रदेश राज्य बनाम भूरजी और अन्य [2001 (7) SCC 679] और शामनसाहेब एम. मुल्तानी बनाम कर्नाटक राज्य [2001 (2) SCC 577] का हवाला दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि:
“न्याय की विफलता’ (failure of justice) अभिव्यक्ति कभी-कभी एक शब्दार्थ गिरगिट (etymological chameleon) की तरह प्रतीत होती है… आपराधिक न्यायालय, विशेष रूप से वरिष्ठ न्यायालय को यह पता लगाने के लिए सूक्ष्म जांच करनी चाहिए कि क्या वास्तव में न्याय की विफलता हुई थी या यह केवल एक दिखावा (camouflage) है।”
इस कानूनी मानक को लागू करते हुए, जस्टिस जी. गिरीश ने निष्कर्ष निकाला:
“…यह कहना संभव नहीं है कि शिकायतकर्ता के पावर ऑफ अटॉर्नी धारक द्वारा दायर शिकायत के आधार पर विद्वान मजिस्ट्रेट द्वारा अपराध का संज्ञान लेने के कार्य से न्याय की विफलता हुई थी। यह विशेष रूप से इस तथ्य को देखते हुए है कि ट्रायल के चरण में शिकायतकर्ता ने खुद सबूत पेश किए थे, और याचिकाकर्ता ने शिकायत में दिए गए बयानों से संबंधित सभी पहलुओं पर शिकायतकर्ता से जिरह करने के अपने अधिकार का प्रयोग किया था।”
इसलिए, कोर्ट ने माना कि पावर ऑफ अटॉर्नी धारक द्वारा दायर मूल शिकायत में प्रत्यक्ष व्यक्तिगत जानकारी के उल्लेख न होने की प्रक्रियात्मक अनियमितता पुनरीक्षण में दोषसिद्धि को पलटने का आधार नहीं बन सकती।
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका का निपटारा निम्नलिखित निर्देशों के साथ किया:
- एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत याचिकाकर्ता को दोषी ठहराने और सजा सुनाने के निचली अदालतों के समवर्ती फैसलों को कारावास की अवधि को छोड़कर बरकरार रखा गया।
- छह महीने के साधारण कारावास की सजा को संशोधित किया गया, और अपराध की प्रकृति और गंभीरता को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता को न्यायालय की समाप्ति (rising of the Court) तक कारावास की सजा सुनाई गई।
- मुआवजे के रूप में 29,50,000 रुपये के भुगतान और भुगतान न करने पर चार महीने के साधारण कारावास के संबंध में निचली अदालतों के अन्य निर्देश यथावत रखे गए।
मामले का विवरण:
- मामले का शीर्षक: कन्नन बनाम मैसर्स आदिसिव एंटरप्राइजेज और अन्य
- मामला संख्या: क्रिमिनल रिविजन पिटीशन संख्या 1038/2018 (Crl.Rev.Pet No. 1038 of 2018)
- पीठ: जस्टिस जी. गिरीश
- दिनांक: 18 मई, 2026

