केरल हाईकोर्ट ने एक सेवानिवृत्त सेना कर्नल की दिव्यांगता पेंशन (Disability Pension) को रोकने की केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने सरकार को कड़ा संदेश देते हुए स्पष्ट किया कि कोर्ट के पुनर्विचार अधिकार क्षेत्र (Review Jurisdiction) का उपयोग पहले से तय हो चुके मामलों को दोबारा शुरू करने के लिए “अपील के छद्म रूप” (appeal in disguise) के तौर पर नहीं किया जा सकता।
यह फैसला २० मई को जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्ण एस. की खंडपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“याचिकाकर्ताओं का यह प्रयास केवल पुनर्विचार क्षेत्र का उपयोग करके उस मुद्दे को फिर से उठाना है, जिसका फैसला पहले ही उनके खिलाफ आ चुका है। यह अपील के छद्म रूप के अलावा और कुछ नहीं है।”
क्या है पूरा विवाद?
यह कानूनी विवाद भारतीय सेना के एक सेवानिवृत्त कर्नल की पेंशन पात्रता से जुड़ा है, जिन्होंने साल २००० में अपनी मर्जी से (at own request) समय पूर्व सेवानिवृत्ति ली थी।
उनकी सेवानिवृत्ति के समय, रिलीज मेडिकल बोर्ड (Release Medical Board) ने कर्नल को ‘टाइप II डायबिटीज मेलिटस’ (Type II Diabetes Mellitus) से पीड़ित पाया था। बोर्ड ने उनकी दिव्यांगता का आकलन तीन साल के लिए $20\%$ किया था। सेना के लागू पेंशन नियमों के अनुसार, इस दिव्यांगता दर को राउंड ऑफ (पूर्णांकित) करके $50\%$ कर दिया गया था।
केंद्र सरकार ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (Armed Forces Tribunal) के उस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी, जिसने कर्नल को दिव्यांगता पेंशन देने का फैसला सुनाया था। जब मई २०२५ में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी केंद्र की याचिका खारिज कर दी, तब सरकार ने इस फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए यह पुनर्विचार याचिका दायर की थी।
केंद्र सरकार की दलीलें और बीमारी का सैन्य सेवा से संबंध
केंद्र सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए सीनियर पैनल काउंसिल टी. सी. कृष्णा ने तर्क दिया कि कर्नल दिव्यांगता पेंशन के हकदार नहीं हैं। उनका कहना था कि कर्नल की बीमारी (डायबिटीज) सैन्य ड्यूटी या सेवा के कारण नहीं हुई थी और न ही सर्विस के दौरान यह बढ़ी थी।
सरकारी वकील ने दलील दी कि रिलीज मेडिकल बोर्ड ने स्पष्ट रूप से निष्कर्ष निकाला था कि सेवानिवृत्त अधिकारी की बीमारी सैन्य सेवा से संबंधित (not attributable to military service) नहीं थी। उन्होंने कानून का हवाला देते हुए कहा कि यह साबित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से सेवानिवृत्त अधिकारी पर थी कि उनकी बीमारी सैन्य सेवा की वजह से हुई थी। सरकार का मानना था कि मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के बावजूद कर्नल के पक्ष में फैसला देना “रिकॉर्ड पर प्रत्यक्ष कानूनी भूल” (error apparent on the face of record) है।
वहीं, कर्नल की ओर से पेश वकील ज्योतिष चंद्रन और रतीश बी. ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि अदालत के पिछले फैसले में ऐसी कोई तकनीकी या कानूनी खामी नहीं है जिसके आधार पर दोबारा समीक्षा की जाए।
पुनर्विचार याचिका की कानूनी सीमाएं
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अदालतों के पास अपने ही पुराने फैसलों की समीक्षा करने के बेहद सीमित अधिकार होते हैं। खंडपीठ ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 की धारा 114 और आदेश XLVII (Order XLVII) का उल्लेख किया, जो यह तय करते हैं कि कोई भी पक्ष कब और किन परिस्थितियों में अपील के बजाय रिव्यू याचिका दायर कर सकता है।
अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार उन्हीं पुराने तर्कों (जैसे मेडिकल बोर्ड की राय और दिव्यांगता को $20\%$ से बढ़ाकर $50\%$ करना) को दोबारा दोहरा रही है, जिन्हें मई २०२५ के मुख्य फैसले में पहले ही गहराई से परखा और निपटाया जा चुका है।
केरल हाईकोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर यह साफ कर दिया कि कानूनी मुकदमों का एक निश्चित अंत होना जरूरी है। सरकारें केवल इसलिए बार-बार पुनर्विचार याचिकाएं दायर नहीं कर सकतीं ताकि सेवानिवृत्त सैन्य कर्मियों को मिलने वाले तयशुदा पेंशन लाभों को रोका जा सके।

