गरम मसाला बना ‘ड्रग्स’: एयरपोर्ट की मशीन की गलती से कारोबारी को हुई 57 दिन की जेल, अब हाईकोर्ट ने सरकार पर ठोका ₹10 लाख का जुर्माना

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नागरिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आजादी को सर्वोपरि रखते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह उस कारोबारी को ₹10 लाख का मुआवजा दे, जिसे भोपाल एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच मशीन की एक तकनीकी गड़बड़ी के कारण 57 दिन जेल की सलाखों के पीछे गुजारने पड़े थे। दरअसल, एयरपोर्ट पर लगी मशीन ने उनके बैग में रखे गरम मसाले और आमचूर को खतरनाक ड्रग्स समझ लिया था।

जस्टिस दीपक खोत की एकल पीठ ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा कि हालांकि शुरुआती गिरफ्तारी “संदेह के वाजिब आधार” पर की गई थी, लेकिन याचिकाकर्ता को इतने लंबे समय तक जेल में इसलिए रहना पड़ा क्योंकि राज्य की फोरेंसिक जांच व्यवस्था बेहद लचर और बुनियादी सुविधाओं से महरूम थी।

पूरा मामला: जब किचन के मसालों को मशीन ने बताया ‘हेरोइन’

यह हैरान कर देने वाला मामला भोपाल एयरपोर्ट से शुरू हुआ था, जब एक स्थानीय व्यवसायी दिल्ली होते हुए मलेशिया जाने के लिए फ्लाइट पकड़ने पहुंचे थे।

एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच के दौरान उनके सामान को ‘एक्सप्लोसिव ट्रेस डिटेक्टर’ (ETD) मशीन से गुजारा गया। इस कनाडाई मूल की मशीन ने सामान में रखे आमचूर (सूखा आम पाउडर) और गरम मसाले के पैकेटों को स्कैन करते ही खतरनाक ड्रग्स ‘हेरोइन’ और ‘एमडीईए’ (MDEA) होने का अलर्ट दे दिया।

मशीन के इस पॉजिटिव सिग्नल के तुरंत बाद सुरक्षा एजेंसियों ने हरकत में आते हुए कारोबारी को सख्त एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

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बाद में हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि कनाडा में बनी यह ईटीडी (ETD) मशीन भारतीय मसालों की तीव्र और विशिष्ट सुगंध (Aromatic spices) को समझने के लिए कभी कैलिब्रेट (सेट) ही नहीं की गई थी, जिसकी वजह से यह भारी चूक हुई। व्यवसायी ने अपनी गरिमा को पहुंचे नुकसान, मानसिक प्रताड़ना और शारीरिक कष्ट के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई और मुआवजे की मांग की थी।

जांच प्रणाली की सुस्ती: 57 दिन का वो दर्दनाक सफर

मशीन की तकनीकी गड़बड़ी तो केवल एक शुरुआत थी, कोर्ट ने पाया कि असली लापरवाही इसके बाद राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा की गई।

गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने मसालों को जब्त कर जांच के लिए क्षेत्रीय फोरेंसिक साइंस लैब (RFSL) भेजा। लेकिन स्थानीय लैब ने मामले की गंभीरता को दरकिनार करते हुए नमूनों को दस दिनों तक अपने पास दबाए रखा और अंत में यह कहकर वापस कर दिया कि उनके पास ‘एमडीईए’ की जांच के लिए जरूरी उपकरण ही नहीं हैं।

इसके बाद नमूनों को हैदराबाद स्थित सेंट्रल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (CFSL) भेजा गया। जब तक हैदराबाद लैब से अंतिम रिपोर्ट आई—जिसमें स्पष्ट किया गया कि पैकेटों में कोई नशीला पदार्थ नहीं बल्कि साधारण घरेलू मसाले थे—तब तक बेकसूर कारोबारी जेल में 57 दिन काट चुका था। इस रिपोर्ट के बाद विशेष एनडीपीएस कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई।

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अदालत में किसने क्या दी दलील?

यह कानूनी लड़ाई साल 2011 से अदालत में खिंच रही थी, जिसमें शामिल विभिन्न विभाग अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते नजर आए:

  • एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI): उनके वकील ने दलील दी कि ईटीडी (ETD) मशीनों में ड्रग्स का पता लगाना केवल एक “वैकल्पिक फीचर” (Optional Feature) है। एएआई का काम केवल मशीनों की खरीद और रखरखाव करना है, जबकि इसका संचालन और आगे की कार्रवाई सीआईएसएफ (CISF) और एयरलाइन ऑपरेटरों के जिम्मे होती है।
  • राज्य सरकार: सरकारी वकील ने तर्क दिया कि अधिकारियों की कोई दुर्भावना नहीं थी। नमूनों को केंद्रीय लैब भेजने में जो समय लगा, वह सिर्फ एक “प्रक्रियात्मक देरी” थी, जिसके लिए स्थानीय अधिकारियों को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: योग्य डॉक्टर हैं, पर अस्पताल में दवाई नहीं!

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की सभी दलीलों को खारिज करते हुए बेहद कड़े शब्दों में नाराजगी जताई। जस्टिस दीपक खोत ने क्षेत्रीय फोरेंसिक प्रयोगशालाओं की बदहाली पर सवाल उठाते हुए कहा:

“यह राज्य सरकार को सोचना चाहिए कि उन्होंने क्षेत्रीय फोरेंसिक लैबों में इतने उच्च योग्यता वाले विशेषज्ञों की तैनाती क्यों कर रखी है, जब वे बुनियादी उपकरणों की कमी के कारण किसी संदिग्ध पदार्थ पर अपनी कोई राय ही नहीं दे सकते।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सेवकों (सरकारी कर्मियों) द्वारा किसी नागरिक के संविधान प्रदत्त जीवन और जीने की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) के हनन के लिए राज्य सरकार ही “परोक्ष रूप से उत्तरदायी” (Vicariously Liable) है।

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अदालत ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित सिद्धांतों के आधार पर गैर-कानूनी हिरासत का यह एक बिल्कुल स्पष्ट मामला है। इसलिए याचिकाकर्ता को ₹10 लाख का मुआवजा दिया जाना न्यायसंगत है।”

हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि वह याचिकाकर्ता को तीन महीने के भीतर ₹10 लाख की मुआवजा राशि का भुगतान करे। हालांकि, सरकार के पास यह अधिकार सुरक्षित रहेगा कि वह इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार दोषी अधिकारियों या विभागों से इस राशि की वसूली (Indemnify) कर सकती है।

अदालत ने यह भी साफ किया कि चूंकि यह मामला 2011 से लंबित है, इसलिए अब 2026 में तकनीकी आधारों पर इसे खारिज कर पीड़ित को नए सिरे से दीवानी मुकदमा लड़ने के लिए मजबूर करना न्यायसंगत नहीं होगा। हालांकि, पीड़ित कारोबारी चाहें तो दोषियों के खिलाफ अतिरिक्त हर्जाने के लिए अलग से दीवानी मुकदमा दर्ज करने के लिए स्वतंत्र हैं।

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