पीड़ितों को क्यों भुगताएँ?’ 49 करोड़ के घोटाले में 53 FIR एक करने की याचिका खारिज; सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई सख्ती

देश की सर्वोच्च अदालत ने बहु-राज्यीय वित्तीय धोखाधड़ी के एक मामले में सख्त रुख अपनाते हुए आरोपियों को राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 49 करोड़ रुपये के निवेश घोटाले से जुड़ी 53 प्राथमिकियों (FIR) को आपस में जोड़ने (क्लब करने) की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया आरोपियों की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए होनी चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने आरोपी उपेंद्र नाथ मिश्रा और काली प्रसाद मिश्रा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत के कड़े रुख और तीखी टिप्पणियों को देखते हुए आरोपियों के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता अमन लेखी ने याचिका वापस ले ली। आरोपियों के खिलाफ ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और आंध्र प्रदेश समेत कुल सात राज्यों में आपराधिक मामले लंबित हैं।

‘आरोपी-समर्थक’ पुराने फैसलों पर कोर्ट का प्रहार

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के उन पुराने फैसलों का हवाला दिया जिनमें त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) के नाम पर बड़ी धोखाधड़ी के मामलों में कई FIR को एक साथ जोड़ने की अनुमति दी गई थी।

हालांकि, चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने टिप्पणी की कि अतीत में मामलों को एक साथ मिलाने से अक्सर ऐसे परिणाम सामने आए जो ‘आरोपी-समर्थक’ (pro-accused) थे, जिससे अपनी जीवनभर की कमाई खोने वाले आम लोग न्याय से वंचित रह गए।

सीजेआई ने गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा:

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“इन अपराधों के पीड़ितों के अधिकारों का क्या होगा? केवल जांच की सहूलियत के लिए मैं अलग-अलग FIR को एक नहीं कर सकता। धोखाधड़ी का शिकार हुए ये लोग हमारी न्याय प्रणाली के ‘अदृश्य पीड़ित’ (invisible victims) हैं, जिनके बारे में सिस्टम ने कभी गहराई से नहीं सोचा।”

चीफ जस्टिस ने देश के आपराधिक कानूनों में हुए हालिया बदलावों का भी जिक्र किया और कहा कि अब भारतीय कानूनी प्रणाली में पीड़ितों के अधिकारों को स्पष्ट रूप से स्वीकार और सुरक्षित किया गया है।

हर पीड़ित की अपनी अलग कहानी

शीर्ष अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया कि चूंकि आरोपी एक ही हैं, इसलिए वित्तीय धोखाधड़ी के इन तमाम मामलों को एक ही कड़ी का हिस्सा माना जाए। पीठ ने जोर देकर कहा कि धोखाधड़ी के हर मामले में पीड़ित अलग हैं और ठगी गई राशि भी भिन्न है, इसलिए हर मामला अपने आप में स्वतंत्र है।

चीफ जस्टिस ने आरोपियों से पूछा, “क्या यह न्यायसंगत है कि आपके अपराध का शिकार बने लोगों को सिर्फ आपकी सुविधा के लिए अलग-अलग राज्यों से किसी एक जगह आने को मजबूर किया जाए?”

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इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि धोखाधड़ी, जालसाजी और साजिश का हर एक आरोप पूरी तरह से अलग और स्वतंत्र अपराध है। उन्होंने सवाल किया, “आखिरकार इन अपराधों के पीड़ितों को क्यों भुगतना चाहिए?”

याचिका वापस लिए जाने के बाद अब आरोपियों को देश के सभी सातों राज्यों की पुलिस और अदालतों का अलग-अलग सामना करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख साफ संदेश देता है कि देश की न्यायपालिका अब अपराधियों की सहूलियत से ऊपर पीड़ितों के दर्द और उनके अधिकारों को प्राथमिकता दे रही है।

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