कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत तलाक की याचिका दायर करने के लिए विवाह का इसी अधिनियम के तहत पंजीकृत होना अनिवार्य शर्त नहीं है। न्यायमूर्ति के. मनमथ राव ने एक पत्नी द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत पति द्वारा शुरू की गई तलाक की कार्यवाही को चुनौती दी थी।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता (पत्नी) और प्रतिवादी (पति) का विवाह 30 अप्रैल 2006 को कनकपुरा तालुक के कब्बालू में सामुदायिक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। वैवाहिक मतभेदों के कारण दोनों 18 फरवरी 2009 से अलग रह रहे हैं।
दोनों पक्ष “मेडा” अनुसूचित जनजाति से संबंधित हैं। प्रारंभ में, पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका (M.C. No. 46/2015) दायर की थी। हालांकि, इस याचिका को अधिकार क्षेत्र के अभाव में खारिज कर दिया गया था क्योंकि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसार, यह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर तब तक लागू नहीं होता जब तक केंद्र सरकार इस संबंध में अधिसूचना जारी न करे।
इसके बाद, पति ने स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 की धारा 27(b) के तहत परित्याग और क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए एक नई याचिका (M.C. No. 18/2024) दायर की। पत्नी ने एक अंतरिम आवेदन (I.A. No. I) दायर कर इस याचिका को खारिज करने की मांग की। उसका तर्क था कि चूंकि विवाह न तो स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत संपन्न हुआ था और न ही पंजीकृत था, इसलिए फैमिली कोर्ट के पास इस मामले को सुनने का अधिकार नहीं है। कनकपुरा के सीनियर सिविल जज और जेएमएफसी ने 26 जून 2025 को पत्नी के इस आवेदन को खारिज कर दिया, जिसके विरुद्ध यह रिट याचिका हाईकोर्ट में दायर की गई थी।
पक्षों के तर्क
पत्नी के वकील ने दलील दी कि चूंकि विवाह पारंपरिक रीति-रिवाजों से हुआ था और स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत पंजीकृत नहीं था, इसलिए यह मामला अधिनियम के दायरे से बाहर है। यह तर्क दिया गया कि फैमिली कोर्ट की यह व्याख्या कि “पंजीकरण केवल निर्देशात्मक है, अनिवार्य नहीं”, त्रुटिपूर्ण है और यह अधिनियम की धारा 15 के प्रावधानों को कमजोर करती है।
वहीं, पति के वकील ने तर्क दिया कि पत्नी का आवेदन कार्यवाही को लंबा खींचने और उसे परेशान करने का एक प्रयास था। उन्होंने स्पष्ट किया कि चूंकि जनजातीय स्थिति के कारण उनके पास हिंदू कानून के तहत कोई उपाय नहीं बचा था, इसलिए उनके पास स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत ही तलाक मांगने का विकल्प शेष था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 15 और 27 के कानूनी प्रावधानों का सूक्ष्म परीक्षण किया। धारा 15 अन्य रूपों में संपन्न विवाहों के पंजीकरण की शर्तों को निर्धारित करती है।
हाईकोर्ट ने अवलोकन किया:
“अधिनियम की धारा 15 केवल विवाह के पंजीकरण के लिए आवश्यक शर्तों को निर्धारित करती है और यह घोषित नहीं करती है कि विवाह का पंजीकरण अनिवार्य है या विवाह पंजीकृत न होने पर धारा 27 के तहत तलाक की याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि हालांकि पंजीकरण से धारा 18 के तहत कुछ लाभ मिलते हैं, लेकिन यह तलाक की डिक्री मांगने के लिए अनिवार्य शर्त नहीं है। न्यायमूर्ति राव ने कहा:
“स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के प्रावधानों के तहत, विवाह का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है। यदि विवाह पंजीकृत है, तो अधिनियम की धारा 18 कुछ लाभ प्रदान करती है। इसके अलावा, विवाह के अनिवार्य पंजीकरण की कोई आवश्यकता नहीं है।”
तलाक से संबंधित धारा 27 के बारे में स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा:
“स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 27 तलाक की याचिका के लिए अधिनियम के तहत विवाह के पंजीकरण की आवश्यकता पर विचार नहीं करती है।”
कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के ‘अमिताभ भट्टाचार्य बनाम श्रीमती अपर्णा भट्टाचार्य (2009)’ मामले का भी उल्लेख किया और स्पष्ट किया कि वह मामला पंजीकरण रद्द करने से संबंधित था, न कि पंजीकरण के बिना तलाक की याचिका की स्वीकार्यता से।
निर्णय
हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि स्पेशल मैरिज एक्ट में ऐसा कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है जो विवाह पंजीकरण के अभाव में तलाक की याचिका को अस्वीकार्य बनाता हो।
तदनुसार, हाईकोर्ट ने कनकपुरा कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें पत्नी के आवेदन को खारिज कर दिया गया था, और वर्तमान रिट याचिका को खारिज कर दिया।
केस संख्या: रिट याचिका संख्या 33261/2025 (GM-FC)
पीठ: न्यायमूर्ति के. मनमथ राव
दिनांक: 17 अप्रैल, 2026

