दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में तीन बचाए गए टॉय पोमेरेनियन कुत्तों—मिष्टी, कोको और कॉटन—को उनके गोद लेने वाले माता-पिता के पास वापस भेजने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून की नजर में जानवरों को “बेजान वस्तुओं” के समान नहीं माना जा सकता। जस्टिस गिरीश कठपालिया ने निचली अदालत के उस आदेश में बदलाव किया, जिसमें कुत्तों को उनके मूल मालिक को सौंपने की बात कही गई थी। हाईकोर्ट ने उन बेजुबान जानवरों के “मानसिक आघात” (emotional trauma) पर जोर दिया, जो उन्हें अपने देखभाल करने वालों से अलग होने पर झेलना पड़ता।
यह मामला साल 2025 का है, जब पशु क्रूरता और “दयनीय स्थिति” में रखने के आरोपों के बाद मूल मालिक के घर पर छापा मारा गया था। इस दौरान मिष्टी, कोको और कॉटन नाम की तीन फीमेल टॉय पोमेरेनियन को वहां से रेस्क्यू किया गया। बचाव के बाद, इन कुत्तों को एक एनजीओ को सौंप दिया गया, जिसने कानूनी प्रक्रिया के तहत उन्हें गोद लेने वाले परिवारों तक पहुंचाया।
विवाद तब शुरू हुआ जब मूल मालिक ने कुत्तों की कस्टडी वापस पाने के लिए निचली अदालत का दरवाजा खटखटाया। अगस्त 2025 और इस साल जनवरी में, ट्रायल कोर्ट ने ‘सुपरदारी’ के आधार पर कुत्तों को मूल मालिक को सौंपने के आदेश जारी किए। आमतौर पर ‘सुपरदारी’ की प्रक्रिया जब्त की गई बेजान वस्तुओं जैसे वाहन या इलेक्ट्रॉनिक सामान के लिए अपनाई जाती है। गोद लेने वाले माता-पिता ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान जस्टिस गिरीश कठपालिया ने कहा कि यह मामला केवल संपत्ति के विवाद का नहीं है। उन्होंने कहा कि क्रूरता के आरोपों पर ट्रायल कोर्ट फैसला करेगा, लेकिन फिलहाल इन बेजुबान जानवरों की भलाई सबसे ऊपर है।
अदालत ने उनकी पहचान और इंसानी लगाव को रेखांकित करते हुए कहा, “याचिकाकर्ताओं के वकील ने बताया कि ये तीनों फीमेल टॉय पोमेरेनियन अपने नाम पुकारे जाने पर प्रतिक्रिया देती हैं, जिससे उनकी विशिष्ट पहचान स्पष्ट होती है।”
जज ने अपनी टिप्पणी में कहा:
“इस अदालत के सामने मुख्य मुद्दा वह मानसिक आघात है, जिससे ये बेजुबान जानवर अपने गोद लेने वाले माता-पिता (याचिकाकर्ताओं) से अलग होने के बाद गुजरेंगे।”
कोर्ट ने आगे कहा कि किसी पालतू जानवर और उसे गोद लेने वाले व्यक्ति के बीच बनने वाले भावनात्मक रिश्ते को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कार्यवाही के दौरान, मूल मालिक कुत्तों को वापस करने के लिए इस शर्त पर सहमत हुआ कि यदि वह ट्रायल कोर्ट से बरी हो जाता है, तो कुत्तों की कस्टडी उसे वापस मिलनी चाहिए (बशर्ते उनकी भलाई सुनिश्चित हो)।
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को संशोधित करते हुए निर्देश दिया कि कुत्तों को शुक्रवार तक उनके गोद लेने वाले माता-पिता को सौंप दिया जाए। इसके साथ ही, कोर्ट ने गोद लेने वाले माता-पिता को प्रत्येक कुत्ते के लिए 50,000 रुपये का बॉन्ड भरने को कहा है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ट्रायल के दौरान जरूरत पड़ने पर कुत्तों को अदालत में पेश किया जाएगा।

