मोडिफाइड साइलेंसर से होने वाले ध्वनि प्रदूषण पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त; प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्यप्रणाली पर जताई नाराजगी

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मोडिफाइड साइलेंसर और प्रेशर हॉर्न के कारण बढ़ रहे ध्वनि प्रदूषण पर कड़ा रुख अपनाया है। वर्ष 2021 से विचाराधीन एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर असंतोष व्यक्त किया। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि केवल डेटा एकत्र कर उसे वेब पोर्टल पर डाल देना पर्याप्त नहीं है, जब तक कि उस पर संबंधित विभागों द्वारा प्रभावी कार्रवाई न की जाए।

इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) और अधिवक्ता आकांक्षा दुबेगौरव मेहरोत्रा ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व चीफ स्टैंडिंग काउंसिल (C.S.C.) और ए.के. वर्मा ने किया।

मामले की पृष्ठभूमि

ध्वनि प्रदूषण के बढ़ते खतरे को देखते हुए हाईकोर्ट के एक एकल न्यायाधीश के संदर्भ पर 2021 में यह ‘सुओ मोटो’ (स्वतः संज्ञान) कार्रवाई शुरू की गई थी। मुख्य रूप से दोपहिया वाहनों में अवैध रूप से लगाए जाने वाले मोडिफाइड साइलेंसरों से होने वाले शोर को रोकने के लिए यह याचिका दायर की गई थी। 2 अप्रैल, 2026 को हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और परिवहन विभाग द्वारा दाखिल हलफनामों का अवलोकन किया।

प्रमुख तर्क और कोर्ट की टिप्पणियां

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की विफलता पर सवाल

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव श्री संजीव कुमार सिंह से डेटा के उपयोग पर सवाल पूछे। कोर्ट ने कहा:

“सवाल यह है कि इस डेटा का संज्ञान कौन लेता है और ध्वनि प्रदूषण को रोकने में भूमिका निभाने वाले अन्य हितधारकों द्वारा आगे क्या कार्रवाई की जाती है। यदि कोई अन्य विभाग या हितधारक इसका संज्ञान नहीं ले रहा है, तो इसे वेब पोर्टल पर डालने का कोई लाभ नहीं है।”

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कोर्ट ने आगे कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नियम 4(3) के तहत ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम के लिए उपाय तैयार करने के लिए बाध्य है, लेकिन बोर्ड के हलफनामे में ऐसे किसी ठोस उपायों का जिक्र नहीं मिला।

उपकरणों के निर्माण और बिक्री पर नियंत्रण

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि परिवहन विभाग के पास गैरेज में जांच करने की शक्ति तो है, लेकिन वे दुकानों पर इन अवैध उपकरणों की बिक्री को रोकने में सक्षम नहीं हैं। मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 52 का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने पूछा कि इन उपकरणों के निर्माण और बिक्री को रोकने के लिए कौन सा विभाग जिम्मेदार है और वर्तमान में इसके लिए क्या तंत्र उपलब्ध है, जिस पर राज्य सरकार की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल सका।

तकनीकी समाधान और प्रवर्तन की कमी

लखनऊ जैसे बड़े शहर में प्रवर्तन अधिकारियों और वाहनों की कमी पर गौर करते हुए कोर्ट ने तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया। एमिकस क्यूरी द्वारा दिए गए ‘नॉइज कैमरा’ (Noise Cameras) के सुझाव पर कोर्ट ने विचार करने को कहा। वहीं, पुलिस महानिदेशक श्री राजीव कृष्ण ने बताया कि ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर इन उपकरणों की ऑनलाइन उपलब्धता के कारण पुलिस के लिए कार्रवाई करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसके समाधान के लिए कोर्ट ने केंद्र सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय और परिवहन मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया है।

कोर्ट का विश्लेषण और निर्देश

हाईकोर्ट ने डेटा संकलन को “अकादमिक अभ्यास” बताते हुए बोर्ड से एक बेहतर हलफनामा मांगा है। कोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण से जुड़े हेल्पलाइन नंबरों और ऑनलाइन शिकायत पोर्टल के निष्क्रिय होने पर भी गंभीर आपत्ति जताई। राज्य में प्रवर्तन की स्थिति पर कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“उदाहरण के तौर पर, पिछले पूरे वर्ष में पूरे उत्तर प्रदेश में मोडिफाइड साइलेंसर के उपयोग के लिए केवल पच्चीस चालान किए गए।”

कोर्ट ने निर्देश दिया कि बार-बार अपराध करने वालों के ड्राइविंग लाइसेंस और वाहन पंजीकरण को निलंबित या रद्द करने के प्रावधानों पर विचार किया जाए। हालांकि, कोर्ट ने यह भी सचेत किया कि इस प्रक्रिया में वाहन मालिकों का अनावश्यक उत्पीड़न नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें इस समस्या के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए।

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निर्णय और आदेश

हाईकोर्ट ने निम्नलिखित दिशा-निर्देश जारी किए:

  1. नए पक्षकार: अपर मुख्य सचिव (नगर विकास विभाग) और केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालयों को पक्षकार बनाया गया।
  2. हेल्पलाइन: सभी विभागों को ध्वनि प्रदूषण से संबंधित हेल्पलाइन नंबरों को प्रभावी और कार्यात्मक बनाने का निर्देश दिया गया।
  3. जागरूकता: परिवहन आयुक्त को गैरेज और वर्कशॉप मालिकों के साथ बैठक कर उन्हें अवैध उपकरणों को न लगाने के लिए प्रेरित करने को कहा गया।
  4. रिपोर्ट: परिवहन सचिव, प्रदूषण बोर्ड और पुलिस विभाग को ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए तैयार किए गए तंत्र पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करना होगा।
  5. कमेटी की भूमिका: 11 फरवरी, 2022 को गठित कमेटी को ‘नॉइज कैमरा’ और अन्य तकनीकी उपायों की व्यवहार्यता की जांच करने का निर्देश दिया गया।

इस मामले की अगली सुनवाई 20 मई, 2026 को होगी, जिसमें परिवहन सचिव और प्रदूषण बोर्ड के सदस्य सचिव सहित उच्च अधिकारियों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है।

केस विवरण ब्लॉक

  • केस शीर्षक: ध्वनि प्रदूषण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (सुओ मोटो)
  • केस संख्या: जनहित याचिका (PIL) संख्या 15385/2021
  • पीठ: जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला
  • दिनांक: 2 अप्रैल, 2026

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