कंज्यूमर कमीशन का बिल्डर को आदेश, खरीदार को सौंपें दो पार्किंग स्पेस और दें 40 हजार रुपये हर्जाना

पश्चिम बंगाल के एक जिला कंज्यूमर कमीशन ने एक रियल एस्टेट डेवलपर को निर्देश दिया है कि वह खरीदार को वादे के अनुसार दो पार्किंग स्पेस का कब्जा तुरंत सौंपे। इसके साथ ही, अनुबंध के अनुसार सुविधाएं न देने पर बिल्डर पर 40,000 रुपये का जुर्माना और कानूनी खर्च भी लगाया गया है। कमीशन ने माना कि पूरे पैसे लेने के बाद तय सुविधाएं न देना सेवा में गंभीर कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार (अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस) है।

एकतरफा सुनवाई के बाद आया फैसला

यह फैसला आयोग के अध्यक्ष संदीप कुमार मन्ना और सदस्य रियाजुद्दीन खान की पीठ ने सुनाया। डेवलपर द्वारा तय समय सीमा के भीतर अपना लिखित जवाब दाखिल न करने के कारण मामले की एकतरफा सुनवाई की गई। शिकायतकर्ता के हलफनामे और सौदे से जुड़े दस्तावेजों की समीक्षा के बाद कंज्यूमर फोरम ने पाया कि डेवलपर ने फ्लैट का पंजीकरण तो करा दिया, लेकिन पार्किंग का स्थान देने में लापरवाही बरती।

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पीठ ने टिप्पणी की कि बिल्डर अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में पूरी तरह विफल रहा है और उसकी इस लापरवाही का खामियाजा ग्राहक को पैसे या समय के नुकसान के रूप में नहीं भुगतना चाहिए।

22.30 लाख रुपये में हुआ था सौदा

मामले के विवरण के अनुसार, पीड़ित खरीदार ने 22,30,000 रुपये की कुल कीमत पर एक आवासीय फ्लैट खरीदा था। सेल डीड के निष्पादन और पंजीकरण से पहले, डेवलपर ने एक लिखित समझौता किया था जिसमें भूतल पर दो पार्किंग स्पेस देने का वादा शामिल था। इनमें दोपहिया वाहन के लिए 18 वर्ग फुट और चार पहिया वाहन के लिए 70 वर्ग फुट की जगह तय की गई थी।

हालांकि, फ्लैट का भौतिक कब्जा मिलने के बाद भी बिल्डर ने पार्किंग की जगह खाली नहीं की। खरीदार द्वारा लगातार संपर्क करने और विधिक नोटिस भेजने के बावजूद डेवलपर ने न तो जगह दी और न ही कोई जवाब दिया। इसके बाद परेशान होकर खरीदार को न्याय के लिए कंज्यूमर कमीशन का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

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मानसिक उत्पीड़न और मुआवजे का निर्देश

कमीशन ने डेवलपर को निर्देश दिया है कि वह स्वीकृत बिल्डिंग प्लान और सेल डीड की अनुसूची-II में उल्लिखित माप व विनिर्देशों के अनुसार भूतल पर दोनों पार्किंग स्पेस का कब्जा तुरंत सौंपे।

इसके अलावा, पीठ ने मानसिक उत्पीड़न, अवांछित परेशानी और अनुचित व्यापार व्यवहार के एवज में 30,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। साथ ही, शिकायतकर्ता को मुकदमेबाजी के खर्च के तौर पर 10,000 रुपये का भुगतान करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

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