पति की नौकरी जाने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने घटाया अंतरिम गुजारा भत्ता, कहा— कमाने की क्षमता वास्तविक आय नहीं

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी महिला की पेशेवर योग्यता और कमाने की क्षमता को उसकी वास्तविक आय नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही, अदालत ने एयर इंडिया से नौकरी छूटने के कारण पति की आर्थिक स्थिति में आए बदलाव को देखते हुए महिला का अंतरिम गुजारा भत्ता 1 लाख रुपये से घटाकर 15,000 रुपये प्रति माह कर दिया है।

जस्टिस मधु जैन की पीठ ने दोनों पक्षों की ओर से दाखिल याचिकाओं का निपटारा करते हुए 30 जुलाई को यह आदेश जारी किया। हाईकोर्ट ने साफ किया कि जब तक पति एयर इंडिया में कार्यरत थे और उन्हें पर्याप्त वेतन मिल रहा था, तब तक के लिए 1 लाख रुपये प्रति माह का गुजारा भत्ता देना उचित था। हालांकि, अप्रैल 2022 में उनकी सेवाएं समाप्त होने के बाद की अवधि के लिए भत्ते की राशि में कटौती करना आवश्यक हो गया है।

कमाने की योग्यता और वास्तविक आय में अंतर

अदालत ने पत्नी की शैक्षणिक योग्यता पर चर्चा करते हुए कहा कि बी.टेक (टेलीकम्युनिकेशन) जैसी पेशेवर डिग्री होने का यह अर्थ स्वतः नहीं निकाला जा सकता कि व्यक्ति आय अर्जित कर ही रहा है। पीठ ने उल्लेख किया कि किसी बेरोजगार जीवनसाथी को रोजगार तलाशने का प्रयास करने का निर्देश देना अदालत के अधिकार क्षेत्र में है, लेकिन इस तरह के निर्देश के कारण महिला को अंतरिम गुजारा भत्ता पाने से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि किसी पक्ष से काम की तलाश करने की उम्मीद की जा सकती है, लेकिन कमाने की क्षमता और वास्तविक कमाई में अंतर होता है। इसी आधार पर अदालत ने उस अवधि के लिए 1 लाख रुपये प्रति माह का भत्ता बरकरार रखा, जब पति को एयर इंडिया से पूरा वेतन मिल रहा था।

READ ALSO  उदयनिधि स्टालिन के चुनावी हलफनामे में विसंगतियों के आरोप, मद्रास हाईकोर्ट ने आयकर विभाग से मांगी रिपोर्ट

नौकरी में बदलाव और भत्ते का समायोजन

पति के वित्तीय हालात में आए बदलावों को देखते हुए हाईकोर्ट ने भविष्य के गुजारा भत्ते में कटौती को जरूरी माना। वेतन रिकॉर्ड के अनुसार, पति को सितंबर 2019 में फ्लाइंग ड्यूटी से हटा दिया गया था। इसके बाद उन्हें जुलाई 2020 में वेतन नहीं मिला, नवंबर 2020 के बाद से वेतन पूरी तरह बंद हो गया और अंततः अप्रैल 2022 में एयर इंडिया ने उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं।

READ ALSO  इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश कहा डीएम और एसडीएम निजी भूमि या संपत्ति विवाद में दखल नहीं दे सकते- जानिए विस्तार से

जस्टिस जैन ने कहा कि नौकरी या आय में बाद में आए बदलाव के कारण प्रारंभिक आदेश शुरू से अवैध नहीं हो जाता, लेकिन ऐसे बदलाव भविष्य की देनदारियों में संशोधन की मांग करते हैं। इसके तहत अदालत ने नौकरी समाप्त होने के बाद की अवधि के लिए संशोधित अंतरिम गुजारा भत्ता 15,000 रुपये प्रति माह निर्धारित किया।

इसके अतिरिक्त, अदालत ने ध्यान दिलाया कि दंपति का नाबालिग बेटा अपने पिता के साथ रहता है और उसका पूरा खर्च पिता ही उठा रहे हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे की देखभाल पर होने वाले खर्च को पत्नी के व्यक्तिगत गुजारा भत्ते के आकलन में शामिल नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी प्रक्रिया

दंपति का विवाह मई 2010 में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था और जनवरी 2019 में दोनों अलग हो गए थे। इसके बाद पत्नी ने घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम (Protection of Women from Domestic Violence Act) के तहत मामला दर्ज कराया था और अपने व बच्चे के लिए 3.38 लाख रुपये प्रति माह के अंतरिम गुजारा भत्ते की मांग की थी।

READ ALSO  ठाणे कोर्ट ने कर्ज न चुकाने पर शख्स को 3 महीने की जेल की सजा सुनाई, 24 लाख रुपये का जुर्माना लगाया

मई 2019 में विचारण अदालत ने शुरुआत में 35,000 रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया था। इसके बाद मामले पर पुनर्विचार हुआ और सितंबर 2020 में वेतन रिकॉर्ड के आधार पर पति की मासिक आय 4 से 5 लाख रुपये मानते हुए पत्नी के लिए 1 लाख रुपये प्रति माह का भत्ता तय किया गया। अक्टूबर 2021 में अपीलीय अदालत ने इस फैसले को सही ठहराया और साथ ही पत्नी को एक साल के भीतर रोजगार खोजने का प्रयास करने का निर्देश दिया। इसके बाद दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट का रुख किया था।

हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान स्वयं पैरवी कर रही पत्नी ने तर्क दिया कि पति ने आय छिपाई है और फॉर्म-16 के अनुसार 1 लाख रुपये का भत्ता अपर्याप्त है। वहीं, पति का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता अजीत कुमार और शिवम सिंह ने कहा कि आय का शुरुआती आकलन त्रुटिपूर्ण था और पति ही बेटे के सभी खर्च उठा रहे हैं, जबकि पत्नी पति के स्वामित्व वाले फ्लैट में रह रही है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles