उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बागेश्वर जिले में 10 वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म के मामले में दोषी विजय बहादुर की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। हालांकि, अदालत ने उसकी 12 वर्ष के कठोर कारावास की सजा को घटाकर 10 वर्ष कर दिया। अदालत ने यह फैसला इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए लिया कि वह पहले ही नौ साल और दो महीने से अधिक का समय जेल में काट चुका है।
न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने बुधवार को विजय बहादुर की अपील का निस्तारण करते हुए यह आदेश पारित किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत द्वारा तय किए गए अपराध और दोषसिद्धि में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं बनता, लेकिन कारागार में उसके द्वारा बिताई गई वास्तविक अवधि को देखते हुए सजा में दो साल की राहत दी जा रही है।
गवाहों के बयानों और मेडिकल जांच पर अदालत की मुहर
अपील पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने प्राथमिकी दर्ज होने में हुई देरी और फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) की रिपोर्ट से जुड़े तकनीकी पहलुओं को आधार बनाकर दोषसिद्धि पर सवाल उठाए थे। खंडपीठ ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया।
अदालत ने पाया कि पीड़िता और घटना के प्रत्यक्षदर्शी उसके भाई के बयान शुरू से अंत तक सुसंगत और पूरी तरह विश्वसनीय रहे हैं। दोनों गवाह जिरह के दौरान भी अपनी बात पर मजबूती से टिके रहे। पीठ ने यह भी दर्ज किया कि पीड़िता की मेडिकल जांच रिपोर्ट ने अभियोजन पक्ष की कहानी की पूरी पुष्टि की, जिससे आरोपी का दोष पूरी तरह साबित होता है।
कपकोट में 2017 में हुई थी वारदात
यह घटना वर्ष 2017 में बागेश्वर जिले के कपकोट क्षेत्र में घटी थी। पीड़िता के माता-पिता मजदूरी करते हैं। अभियोजन के अनुसार, दोषी विजय बहादुर बच्ची को बहला-फुसलाकर अपने तंबू में ले गया और वहां उसके साथ दुष्कर्म किया। घटना के समय बच्ची का भाई मौके पर मौजूद था और उसने पूरी वारदात को देखा था।
मामले की सुनवाई के बाद बागेश्वर की विशेष पॉक्सो अदालत ने फरवरी 2018 में विजय बहादुर को दोषी करार दिया था। विशेष अदालत ने उसे 12 वर्ष के सश्रम कारावास के साथ 10,000 रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
दिल्ली हाईकोर्ट के हालिया सख्त फैसले की पृष्ठभूमि
उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने 10 वर्षीय बच्ची से जुड़े एक अन्य पॉक्सो मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाया था।
दिल्ली हाईकोर्ट ने उस मामले में दोषी को उसके पूरे प्राकृतिक जीवन (ताउम्र) के लिए जेल में रखने की सजा की पुष्टि की थी। अदालत ने पीड़िता की उस मार्मिक मांग को भी जायज ठहराया था जिसमें उसने दोषी को “बूढ़ा होने तक” जेल में रखने की गुहार लगाई थी। उस मामले में पीठ ने बच्ची की दृढ़ता की सराहना करते हुए कहा था कि यह सजा सुनिश्चित करेगी कि दोषी भविष्य में उस बच्ची या किसी अन्य मासूम को नुकसान न पहुंचा सके।

