सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में संपत्ति के खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति उचित प्रतिफल (consideration) देकर संपत्ति खरीदता है और फर्जी दस्तावेज बनाने में उसकी कोई भूमिका नहीं है, तो उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत धोखाधड़ी या जालसाजी के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसने आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत याचिका को स्वीकार करने से मना कर दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता के खिलाफ मुकदमा जारी रखना “अदालती प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग (gross abuse of process) होगा।”
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद प्रतिवादी संख्या 2 (शिकायतकर्ता) द्वारा दर्ज कराई गई एक शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उसके दिवंगत पिता अय्यासामी नादर द्वारा 12 सितंबर, 1988 को निष्पादित वसीयत फर्जी थी। शिकायतकर्ता के अनुसार, उसके पिता की मृत्यु 19 सितंबर, 1988 को हुई थी और मृत्यु से एक महीने पहले वे कोमा में थे, इसलिए उनके द्वारा वसीयत निष्पादित करना असंभव था।
आरोप था कि मुख्य आरोपी (A-1), जो शिकायतकर्ता का भाई है, ने अन्य लोगों के साथ मिलकर फर्जी वसीयत बनाई और उसके आधार पर 18 दिसंबर, 1998 को संपत्ति अपीलकर्ता (A-6) और अन्य को बेच दी। पुलिस ने जांच के बाद IPC की विभिन्न धाराओं (467, 468, 471, 420 और 120-B) के तहत आरोप पत्र दाखिल किया था। अपीलकर्ता ने इस कार्यवाही को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे तथ्यों का विवाद बताकर खारिज कर दिया गया था।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता की दलीलें: वरिष्ठ वकील श्री अरविंद वर्मा ने अदालत को बताया कि पूरा मामला केवल “अटकलों और अनुमानों” पर आधारित है। उन्होंने तर्क दिया कि जब 1988 में वसीयत बनी, तब अपीलकर्ता की उम्र केवल 14-15 साल थी और 1998 में बिक्री विलेख के समय वह ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई कर रहा था। अपीलकर्ता ने उचित जांच के बाद ही संपत्ति खरीदी थी और वसीयत के निर्माण में उसकी कोई भूमिका नहीं थी।
प्रतिवादी की दलीलें: तमिलनाडु राज्य और शिकायतकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वसीयत का उपयोग जानबूझकर संपत्ति हड़पने के लिए किया गया था। उन्होंने कहा कि हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट में हस्ताक्षर मेल नहीं खाने की बात सामने आई है, जो मुकदमे का विषय है और इसे प्रारंभिक चरण में रद्द नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि बिक्री विलेखों से स्पष्ट होता है कि खरीद “कीमती प्रतिफल” (valuable consideration) के बदले की गई थी। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं है जो यह दर्शाए कि फर्जी वसीयत बनाने में अपीलकर्ता की कोई संलिप्तता थी।
पीठ ने FSL रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए, क्योंकि विशेषज्ञों ने मूल दस्तावेज के बजाय फोटोकॉपी के आधार पर मिलान किया था। IPC की धारा 420 (धोखाधड़ी) पर अदालत ने कहा:
“संपत्ति का खरीदार होने के नाते, अपीलकर्ता को वह व्यक्ति नहीं माना जा सकता जिसने शिकायतकर्ता को कोई धोखाधड़ी वाला प्रलोभन दिया या उसे कोई संपत्ति देने के लिए मजबूर किया।”
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यदि वसीयत फर्जी भी पाई जाती है, तो वास्तविक पीड़ित खरीदार होगा क्योंकि उसकी संपत्ति का मालिकाना हक खतरे में आ जाएगा। मोहम्मद इब्राहिम बनाम बिहार राज्य (2009) मामले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा:
“यदि कोई व्यक्ति यह जानते हुए संपत्ति बेचता है कि वह उसकी नहीं है, तो वह खरीदार के साथ धोखाधड़ी करता है। ऐसे में खरीदार शिकायत कर सकता है, लेकिन कोई तीसरा पक्ष जो उस सौदे का हिस्सा नहीं है, वह ऐसी शिकायत नहीं कर सकता।”
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने तय किया कि केवल संपत्ति खरीदने मात्र से अपीलकर्ता को जालसाजी या साजिश का हिस्सा नहीं माना जा सकता। अदालत ने अपीलकर्ता के खिलाफ कार्यवाही को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा जारी रहेगा।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: एस. आनंद बनाम तमिलनाडु राज्य एवं अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 2026 (SLP (Crl.) No. 12177 of 2022 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
- तारीख: 21 अप्रैल, 2026

