कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिक से जुड़े मामले में केंद्र सरकार के रुख पर सख्त नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद किसी नागरिक को मतदाता पहचान पत्र जारी किया है, तो सरकार और न्यायपालिका दोनों उसे स्वीकार करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं। अदालत ने कहा कि अगर केंद्र सरकार आधिकारिक मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया पर ही सवाल उठाती है, तो उसे यह बात आधिकारिक तौर पर रिकॉर्ड पर दर्ज करानी होगी।
एसआईआर प्रक्रिया पर केंद्र की आपत्तियों पर कोर्ट सख्त
यह मामला पश्चिम बंगाल के नादिया जिले के निवासी 32 वर्षीय रफीकुल बिस्वास की याचिका से जुड़ा है। बिस्वास बेंगलुरु में स्कूल बस ड्राइवर का काम करते हैं। उन्हें सितंबर 2025 में बेंगलुरु पुलिस ने अवैध बांग्लादेशी प्रवासी होने के संदेह में हिरासत में लिया था।
सुनवाई के दौरान बिस्वास के वकील क्लिफ्टन डी’रोजारियो ने अपने मुवक्किल की नागरिकता साबित करने के लिए 24 जून को चुनाव आयोग द्वारा जारी नया वोटर आईडी कार्ड, 2026 की पश्चिम बंगाल विधानसभा मतदाता सूची और आधिकारिक वोटर सूचना पर्ची कोर्ट के समक्ष रखी।
जन्म तिथि के अंतर पर छिड़ी बहस
विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (एफआरआरओ) की ओर से पेश केंद्र सरकार के वकील आदित्य सिंह ने नए वोटर कार्ड की वैधता पर सवाल उठाए। उन्होंने दलील दी कि एक ही पहचान पत्र संख्या पर दो अलग-अलग जन्म वर्ष दर्ज हैं। पुराने कार्ड में बिस्वास का जन्म वर्ष 1986 था, जबकि नए कार्ड में इसे 1994 दर्शाया गया है। केंद्र के वकील ने मांग की कि चुनाव आयोग यह स्पष्ट करे कि यह संशोधन किस आधार और किन दस्तावेजों के तहत किया गया।
इस पर आपत्ति जताते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि अधिकारियों ने बिस्वास और उनके माता-पिता के रिकॉर्ड की पहले ही व्यापक जांच की है। उन्होंने बताया कि गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत गड़बड़ियों के कारण 34 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं। ऐसे में इस गहन जांच को पास करने के बाद बिस्वास को अनिश्चितकालीन जांच के दायरे में नहीं रखा जा सकता।
जस्टिस सूरज गोविंदराज ने केंद्र की दलीलों पर कड़ा रुख अपनाते हुए मौखिक टिप्पणी की कि किसी बात की भी एक सीमा होती है। उन्होंने कहा कि यदि चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया के बाद यह कार्ड जारी किया है, तो सभी पक्ष इससे बंधे हैं। कोर्ट ने कहा कि बार-बार प्रक्रिया पर सवाल उठाने के बजाय केंद्र यह लिखित रूप में दे कि पूरी पुनरीक्षण प्रक्रिया ही त्रुटिपूर्ण थी।
स्वास्थ्य संकट और हिरासत की पृष्ठभूमि
बिस्वास को सितंबर 2025 में हिरासत में लिया गया था, लेकिन हिरासत के दौरान ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा और अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इसके बाद 19 दिसंबर को दूसरी बार दिल का दौरा पड़ने के बाद अधिकारियों ने उन्हें चिकित्सीय आधार पर रिहा कर दिया। बिस्वास ने एफआरआरओ के हिरासत आदेश को रद्द करने और स्थाई राहत के लिए हाईकोर्ट का रुख किया है।
चुनाव आयोग को एक हफ्ते का समय
हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग के वकील को एक सप्ताह के भीतर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि क्या विवादित वोटर कार्ड आयोग द्वारा ही जारी किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दस्तावेज प्रामाणिक हैं, तो यह सभी के लिए मान्य होंगे।
मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई को तय की गई है। इसके साथ ही कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार के वकील को भी प्रासंगिक रिकॉर्ड प्रस्तुत करने का समय दिया है।

