गौहाटी हाईकोर्ट ने विदेशी न्यायाधिकरण (फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल) द्वारा अवैध प्रवासी घोषित किए गए एक व्यक्ति की याचिका पर फैसला सुनाते हुए उसे जमानत दे दी है। अदालत ने माना कि 1964-65 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में हुए सांप्रदायिक दंगों और अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के दौरान उसका भारत आना प्रथम दृष्टया वैध प्रतीत होता है।
हालांकि, राहत प्रदान करने के बावजूद जस्टिस कल्याण राय सुराणा और जस्टिस सुस्मिता फुकन खौंड की डिवीजन पीठ ने याचिकाकर्ता को अवैध प्रवासी घोषित करने वाले ट्रिब्यूनल के मुख्य आदेश को रद्द करने या मामले को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेजने से इनकार कर दिया। यह फैसला 4 अगस्त को जारी किया गया।
1964 के शरणार्थी संकट का संदर्भ
हाईकोर्ट द्वारा जमानत मंजूर करने का मुख्य आधार जिरह के दौरान याचिकाकर्ता का वह बयान बना, जिसमें उसने कहा था कि जब वह अपने पिता के साथ तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से असम आया था, तब उसकी उम्र लगभग 8 या 9 वर्ष थी।
अदालत ने गौर किया कि यह समय सीमा 1964-65 में पूर्वी पाकिस्तान में हुए उन सांप्रदायिक दंगों से मेल खाती है, जिनके कारण पीड़ित हिंदू अल्पसंख्यकों को बड़े पैमाने पर शरणार्थी के रूप में भारत पलायन करना पड़ा था। इन परिस्थितियों के आधार पर पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता का सीमा पार कर भारत में प्रवेश करना अवैध नहीं लगता।
इसके अलावा, हाईकोर्ट द्वारा ट्रिब्यूनल के रिकॉर्ड का निरीक्षण करने पर ‘रिफ्यूजी आइडेंटिटी कार्ड रजिस्टर’ में एक प्रविष्टि पाई गई। इसमें याचिकाकर्ता और उसके कथित पिता का नाम दर्ज था, जो 1964 में पूर्वी पाकिस्तान से भारतीय क्षेत्र में आए थे। हालांकि, इन शरणार्थी दस्तावेजों को ट्रिब्यूनल की कार्यवाही के दौरान साक्ष्य के रूप में औपचारिक रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया था।
1971 से पहले की वंशावली साबित करने में विफलता
भारत आने के ऐतिहासिक संदर्भ को स्वीकार करने के बाद भी हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के 19 दिसंबर 2016 के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें याचिकाकर्ता को 25 मार्च 1971 के बाद की धारा का अवैध प्रवासी माना गया था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता 25 मार्च 1971 की कट-ऑफ तारीख से पहले भारत में रहने वाले अपने कथित पिता के साथ अपना कानूनी संबंध या वंशावली साबित करने का वैधानिक दायित्व निभाने में विफल रहा। पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ने ट्रिब्यूनल के समक्ष मूल सुनवाई के दौरान न तो अपने प्रवेश की सटीक तारीख बताई थी और न ही शरणार्थी स्थिति का दावा पेश किया था।
दस्तावेजों की कमियां और सरकारी पक्ष
ट्रिब्यूनल के सामने भारतीय नागरिकता साबित करने के प्रयास में याचिकाकर्ता ने चार प्रमुख दस्तावेज पेश किए थे: अपने कथित पिता के नाम पर 26 नवंबर 1966 का पंजीकृत भूमि बिक्री विलेख, 1997 की मतदाता सूची जिसमें उसका नाम था, तथा स्थानीय गांवबूढ़ा (गांव का मुखिया) और सिमेनमुख गांव पंचायत द्वारा जारी संबंध प्रमाण पत्र।
ट्रिब्यूनल ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 90 के तहत 30 वर्ष से अधिक पुराना होने के कारण 1966 के बिक्री विलेख को प्रामाणिक मानकर स्वीकार तो कर लिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि केवल पिता के नाम जमीन होना ही पुत्र से संबंध साबित नहीं करता। याचिकाकर्ता ने खुद को इस संपत्ति से जोड़ने वाला कोई राजस्व या वंशावली रिकॉर्ड पेश नहीं किया था।
इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा गांवबूढ़ा और पंचायत प्रमाण पत्रों को खारिज किए जाने का समर्थन किया। इन निजी दस्तावेजों के लेखकों को गवाही के लिए अदालत में नहीं बुलाया गया था, जिससे ये साक्ष्य के रूप में अमान्य हो गए। 1997 की मतदाता सूची को भी नागरिकता साबित करने के लिए अपर्याप्त माना गया क्योंकि यह 1971 के बाद की थी।
राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए अतिरिक्त वरिष्ठ सरकारी अधिवक्ता पी शर्मा ने तर्क दिया था कि याचिकाकर्ता कानूनी रूप से वैध साक्ष्यों के माध्यम से अपनी वंशावली साबित नहीं कर सका है और उसने नागरिकता सिद्ध करने का अपना कानूनी भार नहीं निभाया है। हाईकोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार करते हुए अवैध प्रवासी की श्रेणी को बरकरार रखा, जबकि परिस्थितियों को देखते हुए जमानत की राहत प्रदान की।

