उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत ऋण (पर्सनल लोन) की किश्तें चुकाने का हवाला देकर कोई पति अपनी पत्नी को भरण-पोषण देने की कानूनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता। कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के एक कर्मचारी को निर्देश दिया है कि वह अपनी अलग रह रही पत्नी को हर महीने 10,000 रुपये के बजाय 15,000 रुपये का भरण-पोषण दे।
व्यक्तिगत देनदारियों पर वैधानिक दायित्व को प्राथमिकता
जस्टिस आलोक महरा की एकल पीठ ने महिला की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के नवंबर 2021 के आदेश को रद्द कर दिया। 4 अगस्त को जारी अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत विवाहित पत्नी को अपने पति के आय, सामाजिक स्तर और जीवन शैली के अनुरूप सम्मानपूर्वक जीने के लिए उचित भरण-पोषण पाने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि पति द्वारा लिए गए पर्सनल लोन उसकी व्यक्तिगत वित्तीय प्रतिबद्धताएं हैं, जो पत्नी के प्रति उसके कानूनी दायित्वों से ऊपर नहीं हो सकतीं।
पारिवारिक स्थिति और आय का आकलन
मामले की सुनवाई के दौरान महिला के अधिवक्ता राज कुमार सिंह ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई 10,000 रुपये की राशि पति के वेतन और वित्तीय स्थिति की तुलना में बेहद कम थी। पति एसबीआई में अधिकारी के पद पर कार्यरत है और उसका मासिक वेतन लगभग 83,154 रुपये है। याचिकाकर्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि पति के पिता को हर महीने लगभग 30,000 रुपये पेंशन मिलती है और उसके दो अन्य भाई भी सरकारी सेवा में हैं, इसलिए अपनी मां के भरण-पोषण का पूरा वित्तीय बोझ अकेले पति पर होने का दावा सही नहीं है।
दूसरी तरफ, पति के अधिवक्ता भुवन भट्ट ने तर्क दिया कि वैधानिक कटौतियों के साथ-साथ वाहन और फेस्टिवल लोन की ईएमआई चुकाने के बाद उनके मुवक्किल का इन-हैंड वेतन केवल 53,000 रुपये रह जाता है। उन्होंने दावा किया कि ये लोन शादी के दौरान परिवार के कल्याण के लिए लिए गए थे।
पत्नी की शैक्षणिक योग्यता और वर्तमान स्थिति
पति पक्ष ने यह तर्क भी दिया कि महिला एमएससी और बीएड डिग्री धारक है और शादी से पहले एक निजी संस्थान में शिक्षिका के रूप में कार्य करती थी। पति ने बैंक खातों के विवरण का हवाला देते हुए दावा किया कि वह खुद कमाने और अपना गुजारा करने में सक्षम है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि महिला वर्तमान में बेरोजगार है और उसके पास आय का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है। बैंक खाते में जमा राशि के संबंध में महिला ने स्पष्ट किया कि वे पैसे उसके माता-पिता द्वारा दी गई वित्तीय सहायता थे, न कि उसकी अपनी कमाई। महिला ने यह भी कहा कि वह अपने पति के साथ दोबारा रहने को तैयार है, लेकिन पति ने उसे वापस ले जाने से इनकार कर दिया है।
फैमिली कोर्ट के समक्ष पति द्वारा यह स्वीकार किए जाने पर कि वह अपने व्यक्तिगत खर्चों के लिए हर महीने लगभग 15,000 रुपये खर्च करता है, हाईकोर्ट ने माना कि पत्नी के लिए पूर्व में तय की गई भरण-पोषण राशि में बढ़ोतरी करना न्यायसंगत है।

