मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शिक्षक के खिलाफ धोखाधड़ी की FIR रद्द की, कहा- आरोप अधिकतम सेवा संबंधी कदाचार का मामला

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक सरकारी स्कूल शिक्षक के खिलाफ दर्ज धोखाधड़ी की FIR को रद्द कर दिया है। शिक्षक पर आरोप था कि उसकी जगह कोई दूसरा व्यक्ति स्कूल में पढ़ा रहा था। हाईकोर्ट ने कहा कि FIR में लगाए गए आरोपों से धोखाधड़ी के अपराध के आवश्यक तत्व सामने नहीं आते और अधिकतम यह सेवा संबंधी कदाचार का मामला हो सकता है।

जस्टिस हिमांशु जोशी ने शिक्षक रूप सिंह चादर की याचिका स्वीकार करते हुए इस बात पर भी गौर किया कि आपराधिक मामले का मुख्य आधार बना आरोप विभागीय जांच में साबित नहीं हुआ था।

11 सितंबर को दिए आदेश में कोर्ट ने कहा कि चादर के खिलाफ किसी को प्रेरित करने, धोखाधड़ीपूर्ण तरीके से कोई बात प्रस्तुत करने या संपत्ति के हस्तांतरण से जुड़ा कोई आरोप नहीं है। ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का कोई उपयोगी उद्देश्य नहीं होगा और यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

अखबार की खबर के बाद हुई थी जांच

मामले की शुरुआत 18 नवंबर 2024 को प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट से हुई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि चादर की जगह कोई अन्य व्यक्ति स्कूल में पढ़ा रहा है।

इसके बाद विकासखंड शिक्षा अधिकारी, मालथौन और विकासखंड समन्वयक ने निरीक्षण किया। इस दौरान छात्रों और स्थानीय निवासियों के बयान दर्ज किए गए। अधिकारियों ने कथित तौर पर पाया कि विक्रम सिंह लोधी, चादर की जगह शिक्षण कार्य कर रहा था।

चादर को 18 नवंबर 2024 को निलंबित कर दिया गया। विकासखंड शिक्षा अधिकारी की सिफारिश पर अगले दिन यानी 19 नवंबर 2024 को उसके खिलाफ धोखाधड़ी के अपराध में FIR दर्ज की गई।

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इसके बाद चादर को विभागीय आरोपपत्र भी जारी किया गया और अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई।

विभागीय जांच में मुख्य आरोप साबित नहीं हुआ

विभागीय जांच में इस आरोप की विशेष रूप से जांच की गई कि क्या विक्रम सिंह लोधी वास्तव में चादर की जगह शिक्षक का काम कर रहा था।

जांच रिपोर्ट में यह आरोप साबित नहीं हुआ और चादर को इस आरोप से दोषमुक्त कर दिया गया। हालांकि, बाद में 4 जून 2025 के आदेश से उसकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इसका प्रमुख आधार उसके खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होना था।

FIR रद्द करने की मांग करते हुए चादर ने हाईकोर्ट में दलील दी कि जिस आरोप पर आपराधिक मामला टिका है, वही विभागीय जांच में साबित नहीं हो सका। ऐसे में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

धोखाधड़ी के जरूरी तत्वों की हाईकोर्ट ने की जांच

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हाईकोर्ट ने FIR का परीक्षण करते हुए विचार किया कि चादर के ड्यूटी से अनुपस्थित रहने और उसकी जगह किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कथित रूप से शिक्षण कार्य करने के आरोप क्या भारतीय न्याय संहिता के तहत धोखाधड़ी का अपराध बनाते हैं।

कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी के अपराध के लिए छल, बेईमानी से किसी को प्रेरित करना और उसके परिणामस्वरूप संपत्ति का हस्तांतरण या गलत तरीके से लाभ प्राप्त होने जैसे आवश्यक तत्व होने चाहिए।

हाईकोर्ट ने पाया कि चादर के खिलाफ किसी तरह के प्रलोभन, धोखाधड़ीपूर्ण प्रस्तुतीकरण या संपत्ति के हस्तांतरण का कोई आरोप नहीं था। कोर्ट के अनुसार, लगाए गए आरोप अधिकतम सेवा संबंधी कदाचार का मामला हो सकते हैं, जिस पर विभागीय कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन उपलब्ध सामग्री से धोखाधड़ी का अपराध सामने नहीं आता।

हाईकोर्ट ने विभागीय जांच के नतीजे को भी महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले के मूल में मौजूद मुख्य आरोप की जांच की गई और वह साबित नहीं हो सका, जिससे मामले का तथ्यात्मक आधार काफी कमजोर हो गया।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि समान स्थिति वाले एक सह-आरोपी को अलग मामले में पहले ही राहत मिल चुकी थी। चादर की स्थिति उससे भी मजबूत पाई गई क्योंकि उसके खिलाफ मुख्य आरोप विभागीय जांच में साबित नहीं हुआ था।

राज्य ने FIR रद्द करने का किया विरोध

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राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि FIR में संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, जिसकी जांच जरूरी है। राज्य की ओर से यह भी दलील दी गई कि इस स्तर पर हाईकोर्ट को साक्ष्यों का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए।

सरकार ने कहा कि विभागीय और आपराधिक कार्यवाही अलग-अलग क्षेत्रों में संचालित होती हैं और विभागीय जांच में दोषमुक्त होना अपने आप में आपराधिक मामला रद्द करने का आधार नहीं बनता।

हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को हस्तक्षेप के लिए पर्याप्त पाया। कोर्ट ने कहा कि आरोप धोखाधड़ी के आवश्यक तत्वों को पूरा नहीं करते। विभागीय जांच के निष्कर्षों को भी ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने चादर के खिलाफ FIR रद्द कर दी और कहा कि आपराधिक कार्यवाही जारी रखने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

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