उड़ीसा हाईकोर्ट ने निजी जमीन पर कल्याण मंडप (मैरिज हॉल) के निर्माण को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। अदालत ने साफ कहा कि जनहित याचिका की व्यवस्था का इस्तेमाल कोई ऐसा तीसरा पक्ष अपनी निजी रंजिश निकालने के लिए नहीं कर सकता, जिसका उस संपत्ति में न तो कोई मालिकाना हक है और न ही कोई कानूनी हित।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडन और न्यायमूर्ति चित्तरंजन दास की खंडपीठ ने 10 सितंबर को इस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। पीठ ने इस मामले को जनहित याचिका प्रक्रिया के खुले दुरुपयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण बताया।
जमीन मालिक को आपत्ति नहीं तो तीसरे पक्ष को याचिका का हक नहीं
याचिकाकर्ता ने निजी भूमि पर प्रशासन द्वारा कल्याण मंडप के निर्माण को चुनौती दी थी। इस पर हाईकोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ता न तो उस जमीन का मालिक है, न ही वहां का दखलकार या पट्टेदार है।
अदालत ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि संबंधित भूमि के वास्तविक स्वामी ने इस निर्माण को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई है। इसके बावजूद एक ऐसा व्यक्ति, जिसका जमीन से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है, जनहित याचिका के अधिकार का गलत इस्तेमाल कर रहा है।
अतिरिक्त सरकारी वकील ने अदालत को जानकारी दी कि अधिकारियों ने जमीन के वास्तविक मालिक से बाकायदा अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) लेने के बाद ही निर्माण कार्य कराया है।
संपत्ति का अधिकार एक संवैधानिक गारंटी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत संपत्ति का अधिकार एक संवैधानिक सुरक्षा है। यह प्रावधान तय करता है कि कानून के अधिकार के बिना किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। जमीन के वास्तविक मालिक को अपनी संपत्ति के उपयोग और उसके संरक्षण का पूरा हक हासिल है।
खंडपीठ ने कहा कि जब किसी मौलिक अधिकार या अनुच्छेद 300-ए के तहत मिले संवैधानिक अधिकार का हनन हुआ ही नहीं, तब याचिकाकर्ता के पास अदालत आने का कोई कानूनी आधार (लोकस स्टैंडाई) नहीं बनता। अदालत ने टिप्पणी की कि जो याचिकाएं वास्तविक मालिक के संपत्ति अधिकारों में अड़ंगा लगाती हैं, उन्हें भारी जुर्माने के साथ खारिज किया जाना जरूरी है।
जुर्माने की राशि जाएगी बाल कल्याण कोष में
अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को आदेश दिया कि वह दो सप्ताह के भीतर 50 हजार रुपये का जुर्माना ओडिशा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (ओएसएलएसए) के पास जमा कराए। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यह राशि जमा होते ही इसे किशोरों (नाबालिगों) के कल्याण के लिए तय विशेष खाते में हस्तांतरित किया जाए।

