पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत नाम जोड़े जाने और हटाए जाने से जुड़ी 37 लाख से ज्यादा अपीलें अभी भी लंबित हैं। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक स्थिति हलफनामे में यह जानकारी दी है। आयोग के अनुसार, शीर्ष अदालत के निर्देश पर गठित विशेष अपीलीय न्यायाधिकरण अब तक कुल दाखिल 38.20 लाख से अधिक मामलों में से तीन प्रतिशत से भी कम अपीलों का निपटारा कर पाए हैं।
चुनावी निकाय ने अदालत को बताया कि पुनरीक्षण आदेशों के खिलाफ कुल 38,20,683 अपीलें दायर की गई थीं। इनमें से अब तक केवल 1,02,231 मामलों का ही निस्तारण हो सका है, जबकि 37,18,452 मामले अब भी पेंडिंग हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में यह अलग-अलग ब्यौरा नहीं दिया है कि इनमें से कितनी अपीलें नाम काटे जाने के खिलाफ हैं और कितनी अन्य मतदाताओं के नाम शामिल किए जाने के विरोध में दायर की गई हैं।
समयबद्ध निपटारे और न्यायाधिकरणों की क्षमता पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष विचाराधीन है। शीर्ष अदालत पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस की एसआईआर समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिस पर 17 जुलाई को नोटिस जारी किया गया था। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान हटाए गए मतदाताओं द्वारा दर्ज किए गए दावों और आपत्तियों का विधानसभा क्षेत्रवार ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए।
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 25 अगस्त को चुनाव आयोग को अपीलों के निपटारे और पेंडेंसी का पूरा आंकड़ा पेश करने का निर्देश दिया था। चुनावी विवादों के समयबद्ध समाधान पर जोर देते हुए पीठ ने आयोग से पूछा था कि लंबित अपीलों के तेजी से निपटारे के लिए क्या योजना बनाई जा रही है और क्या इस काम के लिए अतिरिक्त न्यायाधिकरणों के गठन की आवश्यकता है। इससे पहले, 24 अप्रैल को अदालत ने अपीलीय न्यायाधिकरणों को यह निर्देश भी दिया था कि जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और यदि वे तत्काल सुनवाई के ठोस कारण पेश करते हैं, तो उनके मामलों की प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की जाए।
मतदाता सूची संशोधन और आवेदनों में बड़ा अंतर
प्रसेनजीत बोस की याचिका में पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान आए आवेदनों और अंतिम सूची में जोड़े गए नामों के बीच भारी अंतर का मुद्दा उठाया गया है। याचिका के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में एसआईआर की प्रारंभिक गणना (एन्यूमिरेशन) के दौरान 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए थे।
इसके बाद दावे और आपत्तियों के चरण में नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म 6 और 6A के तहत 9.64 लाख आवेदन मिले, जबकि नाम हटाने के लिए फॉर्म 7 के तहत 99 हजार से ज्यादा आपत्तियां आईं। इसके बावजूद 28 फरवरी को जब अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित हुई, तो उसमें केवल 1.82 लाख नए नाम ही जोड़े गए।
चुनाव आयोग द्वारा अदालत में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 17 दिसंबर 2025 को मसौदा मतदाता सूची के प्रकाशन से लेकर 7 अगस्त 2026 के बीच फॉर्म 6 के तहत कुल 34.13 लाख आवेदन प्राप्त हुए। चुनावी नियमों के तहत फॉर्म 6 का उपयोग पहली बार मतदाता बनने वाले नए आवेदकों के साथ-साथ उन लोगों द्वारा भी किया जाता है जिनके नाम मसौदा पुनरीक्षण के दौरान हटा दिए गए थे।
तीन राज्यों के न्यायिक अधिकारी और 19 न्यायाधिकरण तैनात
पुनरीक्षण प्रक्रिया के विशाल दायरे को देखते हुए प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर व्यापक व्यवस्था की गई थी। लगभग 60 लाख प्रारंभिक दावों और आपत्तियों की जांच और निपटारे के लिए पश्चिम बंगाल के अलावा पड़ोसी राज्यों झारखंड और ओडिशा से करीब 700 न्यायिक अधिकारियों को तैनात किया गया था।
इन न्यायिक अधिकारियों के निर्णयों के खिलाफ आने वाली अपीलों के निस्तारण के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने 19 विशेष न्यायाधिकरणों का गठन किया। इन सभी न्यायाधिकरणों की कमान हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और पूर्व जजों को सौंपी गई है।

