उत्तराखंड हाईकोर्ट ने तलाक रखा बरकरार, पत्नी को ₹40 लाख गुजारा भत्ता और बेटी के लिए ₹70 लाख देने का निर्देश

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दो वकीलों के बीच विवाह-विच्छेद के मामले में फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को बरकरार रखते हुए पति को पूर्व पत्नी को ₹40 लाख स्थायी गुजारा भत्ता और नाबालिग बेटी की शिक्षा व कल्याण के लिए अलग से ₹70 लाख की एकमुश्त राशि देने का निर्देश दिया है।

जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की बेंच ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के अप्रैल 2024 के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने पत्नी की इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि वह अपने पति के साथ रहना चाहती है।

17 सितंबर के आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि किसी जीवनसाथी को उसके पेशेवर सहयोगियों और परिचितों के सामने बार-बार अपमानित किए जाने का असर उसकी गरिमा और मानसिक स्थिति पर पड़ सकता है। रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों को देखते हुए कोर्ट ने पाया कि पत्नी के व्यवहार की घटनाएं लगातार सामने आई थीं। पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी ने उसके दोस्तों, सहकर्मियों और वरिष्ठों के सामने उसके साथ दुर्व्यवहार किया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच हर असहमति, कभी-कभार गुस्सा हो जाना या वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य मतभेद अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माने जा सकते। इसी तरह, एक जीवनसाथी की यह इच्छा कि दूसरा किसी दूसरी जगह जाकर रहे या अपने पेशे में कुछ बदलाव करे, केवल इसी आधार पर क्रूरता नहीं मानी जा सकती।

2014 में हुई थी शादी, 2016 से अलग रह रहे थे दोनों

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दोनों पक्ष पेशे से वकील हैं। उनकी शादी मार्च 2014 में हुई थी और वर्ष 2015 में उनकी एक बेटी हुई। बेटी फिलहाल अपनी मां के साथ रह रही है। पति-पत्नी वर्ष 2016 से अलग रह रहे थे।

पति ने नवंबर 2016 में क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। उसका आरोप था कि विदाई के समय से ही पत्नी का व्यवहार उसके प्रति क्रूर था और साथ रहने के दौरान भी यह व्यवहार जारी रहा।

फैमिली कोर्ट ने अप्रैल 2024 में पति की तलाक याचिका स्वीकार करते हुए विवाह समाप्त कर दिया था। इस फैसले से असंतुष्ट पत्नी ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में अपील की।

पत्नी ने कहा, आरोप केवल आपसी मतभेद दिखाते हैं

पत्नी की ओर से पेश अधिवक्ता अभिजय नेगी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि पति की ओर से लगाए गए आरोप केवल दोनों के बीच विचारों के मतभेद को दर्शाते हैं। इनसे क्रूरता या परित्याग साबित नहीं होता।

पत्नी की ओर से पति के इस दावे का भी विरोध किया गया कि वैवाहिक विवाद के कारण उसके करियर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। उसके वकील ने कहा कि पति वर्तमान में देश की प्रमुख लॉ फर्मों में से एक में पार्टनर है।

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पति की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट राजेंद्र डोभाल ने दलील दी कि पत्नी ने कभी भी पति के घर को वास्तव में अपना वैवाहिक घर मानने की इच्छा नहीं दिखाई। उनका कहना था कि पत्नी का लगातार व्यवहार यह दर्शाता था कि उसने विवाह को केवल एक औपचारिकता या कागजी शादी के रूप में देखा और उससे जुड़ी जिम्मेदारियों, कर्तव्यों और प्रतिबद्धताओं को स्वीकार नहीं किया।

पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी उस पर लगातार अपने माता-पिता से संबंध तोड़ने, कॉरपोरेट वकील के रूप में अपने अच्छे करियर को छोड़ने और उसकी पसंद की जगह पर जाकर रहने का दबाव डालती थी।

हर वैवाहिक विवाद मानसिक क्रूरता नहीं

हाईकोर्ट ने सामान्य वैवाहिक मतभेदों और मानसिक क्रूरता की सीमा तक पहुंचने वाले व्यवहार के बीच अंतर स्पष्ट किया।

कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच हर असहमति, कभी-कभार गुस्सा या वैवाहिक जीवन में होने वाली सामान्य खटपट को मानसिक क्रूरता नहीं कहा जा सकता। इसी तरह, एक जीवनसाथी द्वारा दूसरे से जगह बदलने या पेशे में कुछ बदलाव करने की अपेक्षा करना अपने आप में क्रूरता नहीं है।

हालांकि, मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और दोनों पक्षों के व्यवहार पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले में कोई खामी नहीं पाई।

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पत्नी और बेटी के लिए कुल ₹1.10 करोड़

हाईकोर्ट ने अपील का निपटारा करते हुए पत्नी और नाबालिग बेटी के लिए आर्थिक प्रावधान पर भी विचार किया।

कोर्ट ने कहा कि पत्नी पेशेवर रूप से योग्य है, वह सरकारी अधिवक्ता के रूप में काम कर चुकी है और अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने पत्नी के लिए ₹40 लाख की राशि स्थायी गुजारा भत्ता के रूप में उचित मानी।

वहीं, मां के साथ रह रही नाबालिग बेटी की शिक्षा और कल्याण के लिए पति को ₹70 लाख की एकमुश्त राशि देने का निर्देश दिया गया।

इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील का निपटारा कर दिया और फैमिली कोर्ट द्वारा पति के पक्ष में दिए गए तलाक के फैसले को बरकरार रखा।

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