दूसरी बेटी होने के कारण एक माह की बच्ची की हत्या का आरोप, बॉम्बे हाईकोर्ट ने दादा को जमानत देने से किया इनकार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपनी एक माह की पोती की हत्या के आरोपी दादा को जमानत देने से इनकार कर दिया है। आरोप है कि परिवार में दूसरी बेटी होने के कारण 2023 में बच्ची की हत्या कर दी गई थी। कोर्ट ने मामले से जुड़ी परिस्थितियों, घटना के बाद परिवार के व्यवहार, जल्दबाजी में बच्ची का अंतिम संस्कार किए जाने और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण पानी में डूबने से दम घुटना पाए जाने को जमानत पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना।

जस्टिस एम एम नेरलिकर ने 9 सितंबर को जमानत अर्जी खारिज करते हुए इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि आजादी के करीब 80 साल बाद भी देश में लड़के को प्राथमिकता देने की मानसिकता मौजूद है। कोर्ट ने कहा कि यह मामला एक ऐसी बच्ची की हत्या का उदाहरण है, जिसे कथित तौर पर इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह परिवार की दूसरी बेटी थी।

मामले में एफआईआर एक आशा कार्यकर्ता की सूचना पर दर्ज हुई थी। आरोप है कि बच्ची के दादा और परिवार के अन्य सदस्यों ने आपसी मिलीभगत से एक माह की बच्ची की हत्या की।

आशा कार्यकर्ता को हुआ था संदेह

मामला पुलिस तक तब पहुंचा जब बच्ची की मौत को लेकर एक आशा कार्यकर्ता को संदेह हुआ। उसने परिवार को बताया था कि यह पुलिस से जुड़ा मामला है और इसकी सूचना दी जानी चाहिए। आरोप है कि परिवार के सदस्यों ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और पुलिस को जानकारी देने से इनकार कर दिया।

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इसके बाद आशा कार्यकर्ता ने खुद पुलिस को बच्ची की मौत की सूचना दी।

हाईकोर्ट ने परिवार के इस व्यवहार पर भी गौर किया। कोर्ट ने इसे बेहद आपत्तिजनक बताते हुए कहा कि यह परिस्थिति दादा सहित आरोपियों की ओर संदेह की दिशा दिखाती है।

घर के भीतर हुई घटना पर कोर्ट ने क्या कहा

हाईकोर्ट ने विभिन्न गवाहों के बयानों का अध्ययन करने के बाद पाया कि घटना के समय आरोपी दादा घर में मौजूद था। कोर्ट के अनुसार, एक माह की बच्ची की मौत किन परिस्थितियों में हुई, इसकी जानकारी घर में मौजूद परिवार के सदस्यों और आरोपी के विशेष ज्ञान में थी।

कोर्ट ने उस घटनाक्रम पर भी गौर किया जिसमें परिवार के सदस्यों ने शोर मचाकर दावा किया था कि किसी ने बच्ची को मार दिया है। परिवार की ओर से यह भी कहा गया था कि एक दरवाजा खुला था और संभव है कि आधी रात को कोई जानवर या कुत्ता बच्ची को उठाकर ले गया हो।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने बच्ची का अंतिम संस्कार जल्दबाजी में किए जाने को भी महत्वपूर्ण परिस्थिति माना। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बच्ची की मौत का कारण पानी में डूबने से दम घुटना बताया गया था।

दादा ने मां को मिली जमानत के आधार पर मांगी राहत

आरोपी की ओर से पेश एडवोकेट यू ई काजी ने दलील दी कि एक माह की बच्ची की हत्या से उनके मुवक्किल को जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं है। उनका कहना था कि घटना घर के भीतर हुई, लेकिन केवल इसी आधार पर आरोपी को अपराध से नहीं जोड़ा जा सकता।

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बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि दादा को घटना की जानकारी तब हुई जब परिवार के दूसरे सदस्यों ने शोर मचाया। बच्ची की मां को पहले ही जमानत मिल चुकी है, इसलिए आरोपी दादा ने भी इसी आधार पर राहत की मांग की।

दूसरी ओर, असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर यू आर फासाते ने जमानत का विरोध किया। अभियोजन ने कहा कि आरोप बेहद गंभीर हैं क्योंकि एक माह की बच्ची की कथित तौर पर केवल लड़की होने के कारण हत्या की गई।

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अभियोजन का यह भी कहना था कि बच्ची को सबसे पहले दादा ने देखा था और घटना उसके घर की चारदीवारी के भीतर हुई थी। ऐसे में बच्ची की मौत कैसे हुई, इससे जुड़ी परिस्थितियां उसके विशेष ज्ञान में थीं।

लड़के को प्राथमिकता देने की मानसिकता पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

मामले के आरोपों पर चिंता जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आजादी के करीब 80 साल बाद भी देश में लोगों के बीच लड़के को प्राथमिकता देने की सोच बनी हुई है। कोर्ट ने मामले को एक ऐसा उदाहरण बताया जिसमें कथित तौर पर बच्ची को इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह परिवार की दूसरी बेटी थी और परिवार दूसरी बेटी नहीं चाहता था।

गवाहों के बयान, घटना के समय आरोपी की घर में मौजूदगी, बच्ची की मौत के बाद परिवार के व्यवहार, जल्दबाजी में किए गए अंतिम संस्कार और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज मौत के कारण सहित मामले की परिस्थितियों को देखते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपी दादा की जमानत अर्जी खारिज कर दी।

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