फिक्स्ड डिपॉजिट के नाम पर वरिष्ठ नागरिक से धोखाधड़ी: उपभोक्ता आयोग का बीमा कंपनी को 1.10 लाख रुपये लौटाने का आदेश

केरल के एक उपभोक्ता आयोग ने एक बीमा कंपनी को 62 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक को 1.10 लाख रुपये 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया है। कंपनी के एजेंटों ने कथित तौर पर उच्च ब्याज वाले फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) का झांसा देकर बुजुर्ग को नियमित बीमा पॉलिसी बेच दी थी। इसके अलावा, आयोग ने पीड़ित को हुई मानसिक परेशानी और वित्तीय क्षति के लिए 30,000 रुपये का मुआवजा और 10,000 रुपये कानूनी खर्च के रूप में भुगतान करने का भी निर्देश दिया है।

कैंसर से पीड़ित पत्नी के इलाज के पैसों पर डाला डाका

अध्यक्ष जॉर्ज बेबी और सदस्य निषाद थंकप्पन की पीठ ने 17 जुलाई के अपने आदेश में कहा कि तथ्यों को छिपाकर ‘सिंगल प्रीमियम एफडी’ को ‘रेगुलर प्रीमियम पॉलिसी’ में बदलना स्पष्ट रूप से अनुचित व्यापार प्रथा है। आयोग ने टिप्पणी की कि शिकायतकर्ता 62 वर्ष का एक वरिष्ठ नागरिक है, उसकी पत्नी कैंसर से पीड़ित है और यह राशि विशेष रूप से उसकी पत्नी के इलाज के लिए बचाकर रखी गई थी। उपभोक्ता आयोग में पीड़ित का पक्ष अधिवक्ता के. श्रीलाल ने रखा।

झांसा देकर दो बार में जमा कराए पैसे

मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता को कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी की विशेष जानकारी नहीं थी। दिसंबर 2019 में बीमा कंपनी के दो अधिकृत एजेंटों ने उनसे संपर्क किया और उच्च ब्याज दर वाली “सिंगल प्रीमियम फिक्स्ड डिपॉजिट” योजना का प्रस्ताव दिया। एजेंटों के वादे पर भरोसा करके बुजुर्ग ने एफडी समझकर 35,000 रुपये दे दिए। हालांकि, कंपनी के प्रतिनिधि ने इस राशि को उनके नाम पर जारी बीमा पॉलिसी के पहले प्रीमियम के रूप में संसाधित कर दिया।

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इसके एक महीने बाद, एजेंटों ने उन्हें एक महीने के भीतर ब्याज सहित मूलधन वापस मिलने का आश्वासन देकर 1.10 लाख रुपये और निवेश करने के लिए राजी कर लिया। इस राशि को उनके बेटे के नाम पर जारी एक अन्य बीमा पॉलिसी के पहले प्रीमियम के रूप में जमा कर लिया गया, जबकि पॉलिसी के भौतिक दस्तावेज लगभग दो महीने बाद सौंपे गए।

बिना अनुमति बैंक खाते से काटी गई नवीनीकरण राशि

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धोखाधड़ी का यह मामला जनवरी 2021 में और गंभीर हो गया, जब शिकायतकर्ता के बैंक बचत खाते से उनकी बिना जानकारी और सहमति के 1.10 लाख रुपये और काट लिए गए। इस राशि को उनके बेटे की पॉलिसी के नवीनीकरण (रिन्यूअल) प्रीमियम के रूप में दर्ज किया गया। बुजुर्ग ने स्पष्ट किया कि उन्होंने बैंक को ऑटो-डेबिट या स्वतः कटौती की कोई अनुमति कभी नहीं दी थी।

बीमा कंपनी ने नहीं रखा अपना पक्ष

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आयोग ने नोट किया कि नोटिस दिए जाने के बावजूद बीमा कंपनी के एजेंटों ने आरोपों का खंडन नहीं किया। आयोग ने अपने निष्कर्ष में कहा कि शिकायतकर्ता को पॉलिसी की शर्तें, नवीनीकरण के नियम और अन्य महत्वपूर्ण विवरण कभी नहीं समझाए गए। एफडी का झूठा वादा करके बीमा पॉलिसी बेचना और मुख्य शर्तों को छिपाना उपभोक्ता अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है, जिससे पीड़ित को भारी मानसिक और वित्तीय आघात पहुंचा है।

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