इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा है कि पुलिस जांच में खामियां होने मात्र से आरोपी को बरी नहीं किया जा सकता, यदि प्रत्यक्षदर्शियों की विश्वसनीय गवाही और चिकित्सकीय साक्ष्य अपराध की पुष्टि करते हों।
जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस जफीर अहमद की डिवीजन बेंच ने इस सिद्धांत के आधार पर सुल्तानपुर में वर्ष 2012 में धर्मेंद्र सिंह की गोली मारकर हत्या के मामले में तीन दोषियों की उम्रकैद बरकरार रखी।
कोर्ट ने पंकज सिंह, बृजेश सिंह और सतीश उर्फ सोनू सिंह की दो आपराधिक अपीलें खारिज कर दीं। तीनों दोषी अपनी सजा पूरी करने के लिए जेल में रहेंगे।
प्रधान चुनाव की रंजिश में हत्या का मामला
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 9 जून 2012 की रात करीब आठ बजे धर्मेंद्र सिंह अपने भाई जगजीवन सिंह के साथ राज बहादुर सिंह के घर गए थे। वे उनके पोते अनिल सिंह के व्यवहार की शिकायत करने पहुंचे थे।
जब धर्मेंद्र ने अनिल का पीछा किया, तो आरोपी कथित तौर पर देसी तमंचों के साथ वहां पहुंचे।
आरोप था कि पंकज सिंह ने अन्य आरोपियों को धर्मेंद्र की हत्या के लिए उकसाया। उसने अपने परिवार से ग्राम प्रधान का पद छिनने और राशन का कोटा रद्द होने के लिए धर्मेंद्र को जिम्मेदार ठहराया था।
इसी दौरान धर्मेंद्र नाली में गिर गए और सतीश ने कथित तौर पर उनके सिर में गोली मार दी।
अगले दिन लखनऊ के ट्रॉमा सेंटर में धर्मेंद्र की मृत्यु हो गई।
धर्मेंद्र की पत्नी सुनीता सिंह ने ग्राम प्रधान चुनाव में पंकज सिंह की पत्नी को हराया था।
11 जून 2012 को एफआईआर दर्ज हुई। इसके बाद 23 दिसंबर 2017 को सुल्तानपुर के अपर सत्र न्यायाधीश/एफटीसी-2 ने तीनों आरोपियों को IPC की धारा 302/34 के तहत उम्रकैद और प्रत्येक पर 50,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
धारा 504 और 506 के तहत भी सजाएं सुनाई गईं। सतीश को आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 के तहत अतिरिक्त सजा मिली।
चौथा आरोपी रितेश सिंह सुनवाई के दौरान हिरासत से फरार हो गया था, जिसके बाद उसका मामला अलग कर दिया गया।
बचाव पक्ष ने जांच और गवाहों की विश्वसनीयता पर उठाए सवाल
अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता नागेंद्र मोहन ने दलीलें दीं। उनकी सहायता अधिवक्ता सलिल मोहन ने की।
बचाव पक्ष ने कहा कि मामला चुनावी रंजिश से जुड़ा था। एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई और शुरुआती शिकायत में कई महत्वपूर्ण बातें दर्ज नहीं थीं।
उन्होंने कथित तौर पर पेट में दूसरी गोली लगने के आरोप को चिकित्सकीय साक्ष्यों से असंगत बताया। साथ ही घायल गवाह राहुल सिंह की घटनास्थल पर मौजूदगी पर भी सवाल उठाए।
बचाव पक्ष ने कहा कि जांच अधिकारी ने खून से सने सामान एकत्र नहीं किए और बरामद हथियार तथा गोली के बीच फोरेंसिक संबंध स्थापित नहीं किया।
राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता अनुराग वर्मा तथा शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता बृज मोहन सहाय ने अपीलों का विरोध किया। शिकायतकर्ता के अधिवक्ता की सहायता शैला जुबैर ने की।
अभियोजन पक्ष ने कहा कि चिकित्सकीय साक्ष्य सिर में लगी घातक गोली की पुष्टि करते हैं। केवल पुरानी रंजिश के आधार पर झूठा फंसाने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
एफआईआर में हर छोटी बात लिखना जरूरी नहीं: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने में देरी को संतोषजनक रूप से स्पष्ट पाया।
कोर्ट ने कहा कि परिवार पहले घायल धर्मेंद्र के इलाज में व्यस्त था और उनकी मृत्यु के बाद पोस्टमार्टम संबंधी औपचारिकताएं पूरी कर रहा था।
एफआईआर में कुछ विवरण नहीं होने की दलील पर बेंच ने कहा:
“एफआईआर अभियोजन पक्ष के मामले का विश्वकोश नहीं है और इसमें घटना का हर छोटा विवरण दर्ज होना आवश्यक नहीं है।”
जांच में कमी और अपराध के सबूत में कमी अलग-अलग बातें
हाईकोर्ट ने माना कि मामले की पुलिस जांच संतोषजनक नहीं थी।
जांच अधिकारी ने खून से सने कपड़े एकत्र नहीं किए, राहुल सिंह का बयान दर्ज करने में देरी की और बैलिस्टिक रिपोर्ट भी उपलब्ध नहीं कराई।
हालांकि, बेंच ने स्पष्ट किया कि इन कमियों से अभियोजन पक्ष के अन्य विश्वसनीय साक्ष्य अपने आप कमजोर नहीं हो जाते।
कोर्ट ने कहा:
“अदालत को जांच में कमी और अपराध के मूल साक्ष्यों में कमी के बीच अंतर करना होगा। पहली कमी का परिणाम अपने आप दूसरी कमी नहीं हो सकता।”
बैलिस्टिक रिपोर्ट के अभाव पर हाईकोर्ट ने पाया कि न्यूरोसर्जन ने मृतक के सिर में गोली फंसी होने की पुष्टि की थी।
बेंच ने कहा:
“बैलिस्टिक तुलना के अभाव का अर्थ यह नहीं है कि अदालत के पास गोली से लगी जानलेवा चोट के संबंध में कोई साक्ष्य नहीं है।”
पुलिस जांच के तरीके पर असहमति जताते हुए कोर्ट ने आगे कहा:
“लेकिन अदालत इन जांच संबंधी खामियों को विश्वसनीय मूल साक्ष्यों पर हावी होने या ऐसा कृत्रिम संदेह पैदा करने की अनुमति नहीं दे सकती, जिसका समग्र साक्ष्य समर्थन नहीं करते।”
एक आरोपी ने गोली चलाई, फिर भी तीनों की साझा जिम्मेदारी
हाईकोर्ट ने पेट में दूसरी गोली लगने के विवरण को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया माना।
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि सतीश द्वारा धर्मेंद्र के सिर में घातक गोली मारने का मुख्य आरोप चिकित्सकीय साक्ष्यों से पुष्ट होता है।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि यदि गोली केवल सतीश ने चलाई, तो अन्य आरोपियों को हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
इस दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने IPC की धारा 34 के तहत साझा इरादे के सिद्धांत का उल्लेख किया।
बेंच ने कहा:
“धारा 34 का उद्देश्य ठीक ऐसी स्थिति से निपटना है, जहां कई व्यक्ति साझा इरादे के तहत किसी आपराधिक कृत्य में भाग लेते हैं, भले ही अंतिम कृत्य शारीरिक रूप से उनमें से केवल एक व्यक्ति ने किया हो।”
घटनास्थल पर मौजूद नहीं होने की दलील भी खारिज
हाईकोर्ट ने आरोपियों की उस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि वे घटना के समय वहां मौजूद नहीं थे।
कोर्ट ने पाया कि इस दावे के समर्थन में पेश गवाह आरोपी के रिश्तेदार या परिचित थे। उन्होंने घटना के पांच साल बाद आरोपियों के अनुरोध पर गवाही दी थी।
बेंच ने इसे पर्याप्त आधार के बिना किया गया दावा माना।
तीनों दोषियों की उम्रकैद बरकरार
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई ऐसी कानूनी त्रुटि या अनुचित निष्कर्ष नहीं था, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जाए।
बेंच ने दोनों आपराधिक अपीलें खारिज करते हुए पंकज सिंह, बृजेश सिंह और सतीश उर्फ सोनू सिंह की दोषसिद्धि तथा सजाएं बरकरार रखीं।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: Satish @ Sonu v. State of U.P., along with Pankaj Singh & Anr. v. State of U.P.
केस नंबर: Criminal Appeal No. 54 of 2018 with Criminal Appeal No. 47 of 2018
पीठ: जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस जफीर अहमद
फैसले की तारीख: 30 अक्टूबर 2026
