वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री का पालन न होने पर पति को तलाक का अधिकार: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1A)(ii) के तहत पति को तलाक की डिक्री देते हुए कहा कि पत्नी यह साबित नहीं कर सकी कि पति अपने ही किसी गलत आचरण का लाभ उठाकर विवाह विच्छेद की राहत मांग रहा था।

न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति महेश्वर राव कुंचेम की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट, तिरुपति के 6 अगस्त 2004 के फैसले को रद्द कर दिया। फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने अपील मंजूर करते हुए पक्षकारों के बीच 5 फरवरी 1992 को हुए विवाह को भंग घोषित कर दिया।

मामला क्या था?

पक्षकारों का विवाह 5 फरवरी 1992 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। उनसे एक पुत्र भी है। वैवाहिक विवादों के बाद पति ने वर्ष 1999 में तलाक की याचिका दाखिल की थी, जबकि पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका दाखिल की थी।

12 जुलाई 2001 को फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी और पत्नी की वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका स्वीकार कर ली। पत्नी को पूर्व में भरण-पोषण कार्यवाही में अपने और पुत्र के लिए भरण-पोषण का आदेश भी मिला था।

पति का कहना था कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री के बावजूद पत्नी उसके साथ रहने नहीं आई। इसलिए एक वर्ष की वैधानिक अवधि पूरी होने के बाद उसने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1A)(ii) के तहत तलाक की मांग की।

पत्नी ने इसका विरोध किया। उसका कहना था कि उसने पति के घर जाने और साथ रहने की कोशिश की, लेकिन पति ने उसे घर में प्रवेश नहीं करने दिया। पत्नी ने यह भी कहा कि वह अब भी पति के साथ रहने को तैयार है।

फैमिली कोर्ट ने क्या कहा था?

फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट का मानना था कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री का पालन न होने भर से तलाक की डिक्री अपने आप नहीं दी जा सकती, खासकर जब पति की ओर से डिक्री के पालन को लेकर सद्भावना न दिखाई दे।

फैमिली कोर्ट ने पत्नी और उसके गवाहों के बयान पर भरोसा करते हुए माना था कि पत्नी ने पति के साथ रहने की कोशिश की, लेकिन पति ने उसे स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट के सामने दलीलें

हाईकोर्ट में पति की ओर से दलील दी गई कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री का पालन नहीं हुआ। डिक्री पारित होने के बाद एक वर्ष से अधिक समय तक दांपत्य संबंधों की बहाली नहीं हुई, इसलिए पति को धारा 13(1A)(ii) के तहत तलाक मांगने का वैधानिक अधिकार था।

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पत्नी की ओर से कहा गया कि पति अपने ही गलत आचरण का लाभ नहीं उठा सकता। उसका तर्क था कि पति ने स्वयं पत्नी को साथ रखने से इनकार किया और अब उसी आधार पर तलाक मांग रहा है।

हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 13(1A)(ii) के तहत पति या पत्नी, दोनों में से कोई भी तलाक की याचिका दाखिल कर सकता है, यदि वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री के बाद एक वर्ष या उससे अधिक समय तक दांपत्य अधिकारों की बहाली नहीं हुई हो।

कोर्ट ने नोट किया कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री 12 जुलाई 2001 को पारित हुई थी। एक वर्ष की अवधि 12 जुलाई 2002 को पूरी हो गई थी और पति ने 22 जुलाई 2002 को तलाक की याचिका दाखिल की थी।

इसके बाद कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23(1)(a) पर विचार किया। इस प्रावधान के तहत अदालत को यह देखना होता है कि राहत मांगने वाला पक्ष अपने ही गलत आचरण का लाभ तो नहीं उठा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि केवल पुनर्मिलन के प्रस्ताव पर अनिच्छा दिखाना अपने आप में ऐसा “गलत आचरण” नहीं है, जिससे तलाक की राहत रोकी जा सके।

कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

“धारा 23(1)(a) के अर्थ में ‘गलत आचरण’ साबित करने के लिए आरोपित आचरण केवल पुनर्मिलन के प्रस्ताव को स्वीकार करने की अनिच्छा से कुछ अधिक होना चाहिए। वह इतना गंभीर दुराचरण होना चाहिए, जो उस राहत से वंचित करने को उचित ठहराए, जिसके लिए पति या पत्नी अन्यथा पात्र है।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री से पहले का आचरण इस प्रश्न के लिए प्रासंगिक नहीं है। धारा 23 के तहत केवल डिक्री के बाद का आचरण देखा जाना चाहिए।

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पत्नी के साक्ष्य को हाईकोर्ट ने अविश्वसनीय पाया

हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी यह साबित नहीं कर सकी कि पति ने डिक्री के पालन में बाधा डाली थी। पत्नी ने कहा था कि वह पति के साथ रहने को तैयार थी, लेकिन पति ने उसे वापस नहीं लिया। हालांकि जिरह में उसने माना कि डिक्री मिलने के बाद उसने कोई निष्पादन कार्यवाही शुरू नहीं की और पति द्वारा कथित रूप से वापस न लेने के बावजूद कोई वकील नोटिस भी नहीं भेजा।

कोर्ट ने उस गवाह के बयान पर भी भरोसा नहीं किया जिसने कहा था कि वह पत्नी के साथ पति के घर गई थी। हाईकोर्ट ने पाया कि गवाह के बयान के अनुसार यह घटना लगभग 1992 की बनती थी, जबकि वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री 2001 में पारित हुई थी। इसलिए इस बयान से डिक्री के बाद पति के किसी गलत आचरण को साबित नहीं किया जा सकता।

दूसरे गवाह के संबंध में कोर्ट ने कहा कि वह पक्षकारों से संबंधित थी। कोर्ट ने पत्नी के बयान और इस गवाह के बयान में भी असंगतियां पाईं। गवाह ने कहा था कि वह दिसंबर 2001 में पत्नी को पति के घर ले गई थी, लेकिन पत्नी ने खुद ऐसा स्पष्ट रूप से नहीं कहा था।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी और गवाहों के साक्ष्य को साथ में भी देखा जाए, तो अधिकतम यही कहा जा सकता है कि पति पत्नी को वापस लेने के लिए इच्छुक नहीं था। लेकिन ऐसी अनिच्छा को धारा 23(1)(a) के तहत “wrong” नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा:

“भले ही पति के साक्ष्य पर विचार न किया जाए, फिर भी रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संभावनाओं की प्रबलता के मानक पर यह साबित नहीं होता कि पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23(1)(a) के अर्थ में कोई ‘गलत आचरण’ किया था।”

पत्नी पर था आरोप साबित करने का भार

हाईकोर्ट ने कहा कि जब पत्नी का आरोप था कि पति अपने ही गलत आचरण का लाभ उठा रहा है, तो यह साबित करने का भार पत्नी पर था कि उसने डिक्री का पालन करने की कोशिश की और पति ने उसे रोका।

कोर्ट ने पाया कि पत्नी यह भार पूरा नहीं कर सकी। खंडपीठ ने कहा कि पत्नी और उसके गवाहों के बयान विरोधाभासों से भरे हैं और एक-दूसरे की पुष्टि नहीं करते।

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कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने साक्ष्य की सही दृष्टि से जांच नहीं की और कानून को तथ्यों पर सही तरीके से लागू नहीं किया।

डिक्री के निष्पादन का रास्ता खुला था

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री पत्नी के पक्ष में और पति के विरुद्ध थी। यदि डिक्री का पालन नहीं हो रहा था, तो पत्नी के लिए उसे निष्पादित कराने का उपाय उपलब्ध था।

कोर्ट ने आदेश 21 नियम 31 CPC का उल्लेख किया, जिसके तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री का पालन न होने पर उसे संपत्ति की कुर्की के माध्यम से लागू कराया जा सकता है। हालांकि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं था कि पत्नी ने डिक्री के निष्पादन के लिए कोई कदम उठाया हो।

हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 13(1A)(ii) के तहत तलाक का आधार बन चुका था और फैमिली कोर्ट को पति की याचिका स्वीकार करनी चाहिए थी।

कोर्ट ने कहा:

“हमारा मत है कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1A) के तहत तलाक का आधार सिद्ध था और फैमिली कोर्ट द्वारा याचिका खारिज करना सही नहीं था। याचिका स्वीकार की जानी चाहिए थी।”

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली, फैमिली कोर्ट का 6 अगस्त 2004 का फैसला और डिक्री रद्द कर दी तथा पक्षकारों के विवाह को भंग घोषित कर दिया। कोर्ट ने खर्चे के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: T. Ravi v. T. Lakshmi Devi
केस नंबर: Civil Miscellaneous Appeal No. 4279 of 2004
पीठ: न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति महेश्वर राव कुंचेम
फैसला सुरक्षित: 10 फरवरी 2026
फैसला सुनाया गया: 28 अप्रैल 2026

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