दिल्ली हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न और पीछा करने (stalking) के आरोपी को बरी करने के खिलाफ राज्य द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब प्राथमिक आरोप भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354A के तहत हो, तो धारा 354 को दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 222 के तहत “लघु अपराध” (minor offence) नहीं माना जा सकता। जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने कहा कि चूंकि इन दोनों धाराओं की सामग्री और दंड के प्रावधानों में महत्वपूर्ण अंतर है, इसलिए अदालत उस आरोप के लिए आरोपी को दोषी ठहराने की शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकती जो कभी तय ही नहीं किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 20 मार्च 2013 को रात करीब 10:00 बजे नई दिल्ली के नारायणा गांव में आरोपी ने 17 वर्षीय एक लड़की (PW2) पर आपराधिक बल का प्रयोग किया था। प्रथम सूचना विवरण (FIS) के मुताबिक, पीड़िता जब साझा बाथरूम से अपने कमरे की ओर लौट रही थी, तब आरोपी ने उसका हाथ पकड़ लिया। पीड़िता किसी तरह खुद को छुड़ाकर अपने कमरे में गई और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया, जिसके बाद आरोपी ने दरवाजा खटखटाया और “गंदी गालियां” दीं।
आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 354A (यौन उत्पीड़न), 354D (पीछा करना) और पॉक्सो (POCSO) एक्ट की धारा 12 के तहत आरोप तय किए गए थे। 29 जनवरी 2015 को ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ राज्य ने Cr.P.C. की धारा 378(1)(b) के तहत हाईकोर्ट का रुख किया।
पक्षों की दलीलें
राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने तर्क दिया कि पीड़िता (PW2) की गवाही सुसंगत रही है और उसे किसी भी तरह से गलत साबित नहीं किया गया। राज्य का कहना था कि यह घटना देर रात हुई जब पीड़िता अकेली थी, जो आरोपी के इरादे को दर्शाता है। राज्य ने यह भी तर्क दिया कि पॉक्सो एक्ट की धारा 29 के तहत वैधानिक धारणा के अनुसार निर्दोषता साबित करने का भार आरोपी पर था, जिसे वह निभाने में विफल रहा।
आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कमी नहीं है और बरी किए जाने के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन
हाईकोर्ट ने धारा 164 Cr.P.C. के तहत पीड़िता के बयान सहित सभी दस्तावेजी सबूतों की पुन: जांच की। जस्टिस सुधा ने पाया कि हालांकि एक अजनबी द्वारा रात के समय पीड़िता का हाथ पकड़ना “आपराधिक बल” के उपयोग के दायरे में आता है और यह मर्यादा भंग करने के इरादे से किया गया था, लेकिन यह लगाए गए विशिष्ट आरोपों (धारा 354A, 354D) की शर्तों को पूरी तरह से पूरा नहीं करता था।
धारा 354A, 354D और पॉक्सो पर: हाईकोर्ट ने नोट किया कि “आरोपी के कथित कृत्य स्पष्ट रूप से IPC की धारा 354A, 354D या पॉक्सो एक्ट की धारा 12 के अंतर्गत नहीं आते हैं।” अदालत ने समझाया कि धारा 354A के लिए अवांछित यौन आचरण या स्पष्ट यौन टिप्पणियों की आवश्यकता होती है, जबकि धारा 354D के लिए अरुचि के बावजूद बार-बार संपर्क की आवश्यकता होती है।
धारा 354 IPC (मर्यादा भंग करना) पर: हाईकोर्ट ने पाया कि बिना सहमति के पीड़िता का हाथ पकड़ना “निश्चित रूप से आपराधिक बल का प्रयोग” है और यह कृत्य यौन प्रकृति का था, जिसका उद्देश्य मर्यादा भंग करना था। हालांकि, अदालत ने एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक कमी की ओर इशारा किया: “अपीलकर्ता/आरोपी के खिलाफ धारा 354 IPC के तहत कोई आरोप (Charge) तय नहीं किया गया था।”
धारा 222 Cr.P.C. की कानूनी व्याख्या: अदालत ने इस पर विचार किया कि क्या औपचारिक आरोप की अनुपस्थिति में भी आरोपी को धारा 354 के तहत “लघु अपराध” मानकर दोषी ठहराया जा सकता है। एस.एम. मुल्तानी बनाम कर्नाटक राज्य (2001) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“यदि दो अपराध सजातीय (cognate) अपराध हैं, जिनमें मुख्य सामग्री समान है, तभी उनमें से कम सजा वाले अपराध को दूसरे अपराध के सापेक्ष ‘लघु अपराध’ माना जा सकता है।”
हाईकोर्ट ने पाया कि धारा 354 और 354A की सामग्री अलग-अलग है। इसके अलावा, धारा 354A की कुछ उप-धाराओं के लिए सजा धारा 354 की तुलना में कम है। इसलिए, धारा 354 IPC को धारा 354A IPC के सापेक्ष लघु अपराध नहीं कहा जा सकता।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि धारा 354 IPC एक लघु अपराध नहीं था और इसके तहत कोई आरोप तय नहीं किया गया था, इसलिए बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
अदालत ने कहा:
“इन परिस्थितियों में, इस मामले में Cr.P.C. की धारा 222 की उप-धारा (1) या (2) लागू नहीं की जा सकती। इसलिए, मुझे हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं दिखता।”
इसी के साथ राज्य की अपील को गुणदोष के अभाव में खारिज कर दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: राज्य बनाम नीतू सिंह
केस संख्या: CRL.A. 265/2018
पीठ: जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा
दिनांक: 28 अप्रैल, 2026

