सुप्रीम कोर्ट ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC) के तहत रिजॉल्यूशन प्लान वापस लेने को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) द्वारा रिजॉल्यूशन प्लान को मंजूरी दिए जाने और उसे निर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) के समक्ष पेश किए जाने के बाद न तो दिवाला प्रक्रिया शुरू करने वाला आवेदन वापस लिया जा सकता है और न ही स्वीकृत रिजॉल्यूशन प्लान।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बैंक ऑफ इंडिया और CoC के पांच अन्य सदस्यों की अपील का निपटारा करते हुए राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। NCLAT ने CoC द्वारा पहले से स्वीकृत रिजॉल्यूशन प्लान वापस लेने के फैसले को खारिज कर दिया था।
कंपनी की आर्थिक स्थिति सुधरने पर CoC ने बदला फैसला
मामले में CoC ने एक कंसोर्टियम द्वारा प्रस्तुत रिजॉल्यूशन प्लान को मंजूरी दी थी। हालांकि, राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) से अंतिम स्वीकृति मिलने से पहले CoC ने सर्वसम्मति से इसे वापस लेने का निर्णय लिया।
CoC का कहना था कि रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल के प्रबंधन के दौरान कॉरपोरेट देनदार कंपनी की वित्तीय स्थिति में काफी सुधार हुआ है। ऐसे में पहले से स्वीकृत योजना लागू होने पर सफल रिजॉल्यूशन आवेदक (SRA) को अप्रत्याशित आर्थिक लाभ मिलेगा।
NCLT ने CoC को योजना वापस लेने की अनुमति दे दी थी, लेकिन NCLAT ने इस आदेश को पलट दिया। अपीलीय न्यायाधिकरण ने कहा कि CoC को स्वीकृत रिजॉल्यूशन प्लान वापस लेने का निर्णय करने का अधिकार नहीं है।
इसके साथ ही NCLAT ने रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल द्वारा योजना की मंजूरी के लिए दाखिल आवेदन और कॉरपोरेट देनदार की होल्डिंग कंपनी के आवेदन को दोबारा विचार के लिए बहाल कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि योजना लागू होने में देरी पहले की कार्यवाही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए स्थगन आदेश के कारण हुई थी।
₹172.55 करोड़ की योजना और कंपनी की बढ़ती नकदी पर विवाद
अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने दलील दी कि रिजॉल्यूशन प्लान में ₹172.55 करोड़ का प्रस्ताव दिया गया था। उस समय कॉरपोरेट देनदार के पास शुरुआती नकद शेष ₹30 करोड़ था, जो पिछली विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज होने तक बढ़कर ₹165 करोड़ हो गया।
उन्होंने कहा कि इस बदलाव से सफल रिजॉल्यूशन आवेदक को अप्रत्याशित लाभ मिलेगा। उन्होंने यह भी बताया कि राष्ट्रीय राजमार्ग-45 पर टोल वसूली करने वाली कंपनी का कारोबार कोविड-19 महामारी के कारण प्रभावित हुआ था और उसी अवधि में योजना को मंजूरी दी गई थी।
अपीलकर्ताओं ने CoC के व्यावसायिक विवेक (Commercial Wisdom) को प्राथमिकता देने की दलील देते हुए Kalyani Transco v. Bhushan Power & Steel Ltd. के फैसले का हवाला दिया।
दूसरी ओर, सफल रिजॉल्यूशन आवेदक की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता निधेश गुप्ता ने Ebix Singapore (P) Ltd. v. Committee of Creditors of Educomp Solutions Ltd. के फैसले पर भरोसा किया। उन्होंने कहा कि CoC अपनी मंजूरी से बंधी हुई है और कंपनी की वित्तीय स्थिति में संभावित सुधार का पहलू पहले से ही रिजॉल्यूशन प्लान में शामिल था।
होल्डिंग कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता निखिल नैयर ने कहा कि यदि वन टाइम सेटलमेंट (OTS) लागू कर दिया जाए तो कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) को ही समाप्त किया जा सकता है।
CoC भी अपने स्वीकृत रिजॉल्यूशन प्लान से बंधी है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने IBC की धारा 12-A को धारा 30 और 31 के साथ पढ़ते हुए स्पष्ट किया कि रिजॉल्यूशन प्लान की मंजूरी के बाद उसे वापस लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
पीठ ने कहा:
“इन प्रावधानों को एक साथ पढ़ने पर हमारी राय है कि आवेदन वापस लेने की अनुमति केवल उस समय तक हो सकती है, जब तक CoC रिजॉल्यूशन प्लान को मंजूरी नहीं दे देती। इसके बाद, जब योजना निर्णायक प्राधिकरण के समक्ष प्रस्तुत कर दी जाती है, तो न तो आवेदन वापस लिया जा सकता है और न ही स्वीकृत रिजॉल्यूशन प्लान।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Ebix Singapore मामले में सफल रिजॉल्यूशन आवेदक द्वारा योजना वापस लेने का प्रश्न था, लेकिन उस फैसले में निर्धारित सिद्धांत CoC पर भी पूरी तरह लागू होता है।
वहीं, Kalyani Transco मामले का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि रिजॉल्यूशन प्लान लागू होने तक CoC का अस्तित्व बने रहने से यह तथ्य प्रभावित नहीं होता कि उसकी मंजूरी प्राप्त योजना बाध्यकारी होती है।
CoC के फैसले पर SRA की आपत्ति का भी लिया संज्ञान
सुप्रीम कोर्ट ने सफल रिजॉल्यूशन आवेदक की उस दलील पर भी ध्यान दिया, जिसमें CoC के अपना रुख बदलने के पीछे व्यावसायिक विवेक के बजाय अवसरवादी सोच होने का आरोप लगाया गया था।
पीठ ने कहा:
“सफल रिजॉल्यूशन आवेदक की इस दलील को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि CoC ने अपना रुख व्यावसायिक विवेक के कारण नहीं, बल्कि अदूरदर्शी अवसरवाद के चलते बदला है, जो संस्थागत स्तर पर अत्यधिक लालच को दर्शाता है।”
केवल मुनाफा बढ़ने से रिजॉल्यूशन प्लान की मंजूरी नहीं रोकी जा सकती
सुप्रीम कोर्ट ने NCLT को निर्देश दिया कि वह रिजॉल्यूशन प्लान की शर्तों के संदर्भ में कॉरपोरेट देनदार की वर्तमान वित्तीय स्थिति और नकद शेष की जांच करते हुए योजना पर विचार करे।
पीठ ने स्पष्ट किया:
“केवल लाभप्रदता में सुधार होना रिजॉल्यूशन प्लान को मंजूरी देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता, यदि योजना धारा 30 की उपधारा (2) के तहत निर्धारित आवश्यकताओं को पूरा करती है।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि CoC और सफल रिजॉल्यूशन आवेदक के संबंध में रिजॉल्यूशन प्लान की बाध्यकारी प्रकृति को लेकर दिए गए निष्कर्षों को छोड़कर उसकी अन्य टिप्पणियां प्रथम दृष्टया हैं।
अंत में सुप्रीम कोर्ट ने NCLT से अनुरोध किया कि वह लंबित दोनों आवेदनों पर एक साथ सुनवाई करे और उनका शीघ्र निस्तारण करे।
केस डिटेल्स
केस का नाम: Bank of India & Ors. v. S.M. Kamal Pasha & Ors.
केस नंबर: Civil Appeal No. 12045 of 2026
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
फैसले की तारीख: 26 अक्टूबर 2026
