बॉम्बे हाईकोर्ट ने सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय (एसपीपीयू) में लगभग तीन दशकों से सेवारत एक वरिष्ठ विधि अधिकारी के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विश्वविद्यालय द्वारा वित्तपोषित पद पर किए गए कार्य को पेंशन और वेतन संरक्षण की गणना से अलग नहीं रखा जा सकता। इसी के साथ अदालत ने महाराष्ट्र सरकार के उस कदम को निरस्त कर दिया, जिसके जरिए अधिकारी के वेतन लाभ वापस लेने और उनसे वित्तीय वसूली की तैयारी की जा रही थी।
जस्टिस जी. एस. कुलकर्णी और जस्टिस डॉ. नीला गोखले की खंडपीठ ने 21 सितंबर को दिए अपने आदेश में कहा कि अधिकारी को पेंशन देने से इनकार करने का न तो कोई कानूनी आधार है और न ही प्रशासन को उनसे किसी तरह की वसूली करने का अधिकार है। अदालत ने वरिष्ठ विधि अधिकारी डॉ. परवीन परवेज़ सय्यद की याचिका को पूरी तरह स्वीकार करते हुए उन्हें सभी राहतें प्रदान करने का निर्देश दिया।
वेतन और पेंशन गणना को लेकर उपजा विवाद
कानून में पीएचडी की उपाधि रखने वाली डॉ. सय्यद ने 9 जून 1997 को सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में विधि अधिकारी के रूप में अपनी सेवा शुरू की थी। वह 31 जुलाई 2010 तक इस पद पर रहीं, जिसका वित्तीय भार सीधे विश्वविद्यालय वहन करता था।
इसी पद पर रहते हुए उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा विज्ञापित वरिष्ठ विधि अधिकारी के पद की चयन प्रक्रिया में हिस्सा लिया। महाराष्ट्र सरकार ने इस वरिष्ठ पद को अनुदानित (एडेड) पद के तौर पर मंजूरी दी थी, जिसका वेतन राज्य सरकार के कोष से दिया जाना तय हुआ। डॉ. सय्यद ने 1 अगस्त 2010 को वरिष्ठ विधि अधिकारी का कार्यभार संभाला और वह बीते लगभग 16 वर्षों से इसी पद पर सेवाएं दे रही हैं। इस प्रकार विश्वविद्यालय में उनका कुल सेवाकाल करीब 29 वर्षों का हो चुका है।
विवाद तब खड़ा हुआ जब राज्य सरकार ने यह फैसला लिया कि विधि अधिकारी के तौर पर उनके शुरुआती 13 साल के कार्यकाल को वेतन संरक्षण और पेंशन के लिए नहीं गिना जाएगा, क्योंकि वह पद सरकार द्वारा नहीं बल्कि विश्वविद्यालय द्वारा वित्तपोषित था। इसके आधार पर प्रशासन ने उन्हें पूर्व में दिए गए वेतन संरक्षण के लाभ को वापस लेने और अतिरिक्त राशि की वसूली के आदेश जारी कर दिए। डॉ. सय्यद ने राज्य के इस रुख को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने सरकारी फैसले को बताया मनमाना
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की इस कार्रवाई को मनमाना और अनुचित करार दिया। खंडपीठ ने कहा कि इतने लंबे समय तक पूरी तरह विश्वविद्यालय को समर्पित की गई मूल्यवान सेवा को पेंशन के लिए न गिनना घोर अन्याय होगा। अदालत के अनुसार, पेंशन से वंचित करना वास्तव में 1997 से विश्वविद्यालय में दी गई जनसेवा को नकारने जैसा है।
न्यायाधीशों ने ध्यान दिलाया कि जब डॉ. सय्यद का चयन वरिष्ठ विधि अधिकारी के रूप में हुआ था, तब राज्य सरकार ने आयु सीमा में छूट देते समय और उनका वेतन तय करते समय उन 13 वर्षों की सेवा को पहले ही मान्यता दी थी। अदालत ने सवाल उठाया कि जब पूर्व सेवा को एक बार आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर लिया गया था, तो बाद में उसे अमान्य ठहराकर लाभ वापस लेना किसी भी तरह से तर्कसंगत नहीं है।
अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता को राहत पाने का पूरा अधिकार है और राज्य सरकार द्वारा जारी सभी प्रतिकूल पत्राचार को रद्द कर दिया। इस मामले में याचिकाकर्ता डॉ. सय्यद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व सहायक सरकारी वकील डी. एस. देशमुख ने किया।

