‘दौलत और रसूख से नरम इंसाफ नहीं खरीदा जा सकता’: घर खरीदारों से ₹126 करोड़ की धोखाधड़ी के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की पीएमएलए जमानत याचिका

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने घर खरीदारों से जुटाए गए 126.30 करोड़ रुपये के गबन से जुड़े धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) के एक मामले में आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने टिप्पणी की कि सफेदपोश अपराधों (व्हाइट-कॉलर क्राइम) से सख्ती और कड़े हाथों से निपटा जाना चाहिए। जस्टिस कृष्ण पहल की एकल पीठ ने कहा कि आवेदक धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) के तहत राहत पाने का हकदार नहीं है। अदालत ने पाया कि स्वतंत्र ऑडिट रिपोर्ट में घर खरीदारों की रकम को दूसरी जगह लगाए जाने की पुष्टि हुई है और ट्रायल कोर्ट के समक्ष बचाव पक्ष के वकीलों ने सुनवाई में देरी करने का रुख अपनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा लखनऊ में 23 दिसंबर 2024 को पीएमएलए की धारा 3 सपठित धारा 4 के तहत दर्ज ईसीआईआर/एलकेजेडओ/19/2024 से जुड़ा है। इसका मुख्य मूल अपराध (प्रेडिकेट ऑफेंस) लखनऊ के एसआईटी थाने में विशेष सचिव (प्रशासन) की प्रारंभिक जांच के बाद 24 नवंबर 2022 को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120-बी और 420 के तहत दर्ज एफआईआर संख्या 0030/2022 पर आधारित है। इसके अतिरिक्त, गौतमबुद्ध नगर के फेज-3 थाने में आईपीसी की धारा 420 के तहत चार अन्य प्राथमिकियां भी दर्ज की गई थीं।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, आवेदक ने “अरण्य” प्रोजेक्ट में 1,468 यूनिटों के लिए घर खरीदारों से 522.90 करोड़ रुपये जुटाए थे। हालांकि, इनमें से केवल 35 खरीदारों को ही कब्जा सौंपा गया। निजी फर्म ‘करी एंड ब्राउन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ की ऑडिट रिपोर्ट में शुरुआत में 107 करोड़ रुपये के विचलन (डायवर्जन) का खुलासा हुआ। पीएमएलए की धारा 3 के तहत जांच पूरी करने के बाद ईडी ने 13 जून 2025 को गाजियाबाद स्थित सीबीआई/भ्रष्टाचार निवारण विशेष न्यायाधीश की अदालत में छह अनुसूचित अपराधों का ब्योरा देते हुए अभियोजन शिकायत (पीएमएलए-एससी संख्या 08/2025) दाखिल की। विशेष अदालत ने 18 अगस्त 2025 को इस शिकायत पर संज्ञान लिया।

आवेदक की ओर से दी गई दलीलें

वरिष्ठ अधिवक्ता विनय सरन ने अधिवक्ता सौमित्र द्विवेदी और पंकज साहनी के साथ आवेदक की ओर से दलीलें पेश करते हुए कहा कि संबंधित ईसीआईआर अस्पष्ट, अनिश्चित और दुर्भावनापूर्ण इरादे से दर्ज की गई है। उन्होंने दलील दी कि आवेदक की गिरफ्तारी संविधान के अनुच्छेद 22 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 47 और 48 के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन है। इसके समर्थन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य और प्रबीर पुरकायस्थ बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) के फैसलों का हवाला दिया, जिसे लेकर क्रिमिनल मिस. रिट पिटीशन संख्या 11384/2025 भी दाखिल की जा चुकी है।

बचाव पक्ष ने अभियोजन के दस्तावेजों में विरोधाभास को रेखांकित करते हुए कहा कि ईसीआईआर में पांच अनुसूचित अपराधों का उल्लेख था, जबकि बाद में दाखिल शिकायत में छह अपराध जोड़ दिए गए। इसमें अपराध संख्या 63/2017 को बिना किसी साक्ष्य के शामिल कर लिया गया। उन्होंने कहा कि आवेदक एक प्रतिष्ठित बिल्डर है और उसकी कंपनी मेसर्स उन्नति फॉर्च्यून होल्डिंग्स लिमिटेड ने इस परियोजना में 950 आवंटियों को कब्जा सौंप दिया है।

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यह भी कहा गया कि किसानों के साथ भूमि विवाद, दीवानी मुकदमों और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) द्वारा निर्माण पर लगाई गई रोक के कारण कंपनी गंभीर वित्तीय संकट में घिर गई थी। इसके चलते एनसीएलटी, दिल्ली ने 27 मार्च 2019 को अंतरिम समाधान पेशेवर (आईआरपी) नियुक्त कर कंपनी का प्रबंधन सौंप दिया था। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि आईआरपी की नियुक्ति के लगभग पांच वर्ष आठ महीने बाद और एनजीटी द्वारा 21 नवंबर 2024 को निर्माण कार्य शुरू करने की अनुमति दिए जाने के महज एक महीने बाद ही यह ईसीआईआर दर्ज की गई।

आवेदक ने दलील दी कि उसके पास अपराध की कोई आय (प्रोसीड्स ऑफ क्राइम) मौजूद नहीं है। कंपनी को खरीदारों से लगभग 500 करोड़ रुपये मिले थे, जबकि निर्माण पर लगभग 670 करोड़ रुपये खर्च किए गए। जिस राशि के डायवर्जन का आरोप है, वह वास्तव में प्रमोटर का अंशदान, अंतर-कॉर्पोरेट ऋण, संस्थागत उधारी या सुरक्षा जमा थी। इसके अलावा आवेदक ने मार्च और अप्रैल 2025 में चार बार पेश होकर जांच में सहयोग किया, वह अग्न्याशय (पैनक्रियाज) की गंभीर बीमारी से जूझ रहा है और 16 अप्रैल 2025 से करीब 16 महीने से हिरासत में है।

जमानत के समर्थन में आवेदक ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का सहारा लिया:

  • सुशील सेठी व अन्य बनाम अरुणाचल प्रदेश राज्य व अन्य, जिसमें माना गया था कि धारा 420 सपठित 120-बी के तहत अपराध के लिए लेनदेन की शुरुआत से ही बेईमानी का इरादा साबित होना चाहिए।
  • प्रो. आर.के. विजयसारथी व अन्य बनाम सुधा सीथारमा व अन्य, जिसमें धोखाधड़ी (चीटिंग) के वैधानिक तत्वों को स्पष्ट किया गया था।
  • विजय मदनलाल चौधरी व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य, जिसमें कहा गया कि जमानत के चरण में अदालत को केवल व्यापक संभावनाओं (ब्रॉड प्रोबेबिलिटीज) के आधार पर यह देखना होता है कि क्या आरोपी का कोई आपराधिक इरादा था और क्या वह भविष्य में अपराध कर सकता है।
  • मनीष सिसोदिया बनाम प्रवर्तन निदेशालय, श्री गुरबख्श सिंह सिब्बिया व अन्य बनाम पंजाब राज्य, और संजय चंद्रा बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो, जिनमें दोहराया गया कि “जमानत एक नियम है और जेल अपवाद”।
  • वी. सेंथिल बालाजी बनाम उप निदेशक, प्रवर्तन निदेशालय, जहां 15 महीने की हिरासत अवधि के आधार पर जमानत दी गई थी।
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प्रवर्तन निदेशालय की दलीलें

जमानत का विरोध करते हुए ईडी के वकील सुशांत चंद्रा ने तर्क दिया कि वित्तीय जांच से यह साबित हुआ है कि निवेशकों और घर खरीदारों से जुटाए गए 126.30 करोड़ रुपये को इक्विटी निवेश, डिबेंचर, बॉन्ड, तरजीही शेयरों और सहयोगी कंपनियों को दिए गए ऋण व अग्रिम के जरिए दूसरी जगह लगाया गया। इसमें 88 करोड़ रुपये का एक ऐसा अग्रिम भी शामिल है, जिसे कंपनी के बही-खातों में डूबत (इररिकवरेबल) दर्शा दिया गया था।

ईडी ने कहा कि आवेदक का नौ मामलों का आपराधिक इतिहास रहा है, जिनमें मुख्य रूप से धोखाधड़ी, अमानत में खयानत और जालसाजी के आरोप शामिल हैं। इसमें एफआईआर संख्या 285/2019 भी शामिल है, जिसमें एक ही फ्लैट को कई लोगों को बेचने का आरोप है। एजेंसी ने यह भी कहा कि आवेदक के फरार होने का अंदेशा है, क्योंकि दिल्ली ईओडब्ल्यू द्वारा दर्ज एफआईआर संख्या 63/2017 में उसके खिलाफ पहले ही सीआरपीसी की धारा 82 के तहत भगोड़ा घोषित करने की कार्रवाई शुरू की जा चुकी थी।

जांच एजेंसी ने कहा कि आवेदक पीएमएलए की धारा 45 की अनिवार्य दोहरी शर्तों को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहा है। इसके समर्थन में ईडी ने विभिन्न फैसलों पर भरोसा जताया:

  • प्रवर्तन निदेशालय बनाम आदित्य त्रिपाठी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने फरार होने की आशंका और आपराधिक इतिहास के आधार पर आरोपी को दी गई जमानत रद्द कर दी थी।
  • आदित्य कृष्णा बनाम प्रवर्तन निदेशालय (दिल्ली हाईकोर्ट), जिसमें स्पष्ट किया गया कि प्रेडिकेट ऑफेंस और पीएमएलए अपराध पूरी तरह अलग हैं। प्रेडिकेट अपराध में जमानत मिलने से पीएमएलए मामले में स्वतः जमानत का अधिकार नहीं मिल जाता और किसी भी आरोपी की भूमिका को पूरी आपराधिक साजिश के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
  • गौतम कुंडू बनाम प्रवर्तन निदेशालय, जिसमें माना गया कि मनी लॉन्ड्रिंग एक स्वतंत्र अपराध है और अदालत को पीएमएलए की धारा 45 की शर्तों को कड़ाई से लागू करना चाहिए।
  • वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो, जिसमें यह प्रतिपादित किया गया था कि आर्थिक अपराध एक अलग वर्ग में आते हैं और जमानत पर विचार करते समय उनके प्रति अलग दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

मुकदमे की प्रगति का सत्यापन करने के लिए हाईकोर्ट ने निचली अदालत से 14 अगस्त 2026 की ट्रायल स्टेटस रिपोर्ट मंगाई। रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ कि कई तारीखों पर आरोपी अदालत में उपस्थित रहा, लेकिन उसके वकील कई अवसरों पर अनुपस्थित रहे। इसमें यह भी सामने आया कि आरोप तय करने पर बहस 30 जुलाई 2026 को पूरी हो चुकी थी और मामला संज्ञान आदेश के लिए 24 अगस्त 2026 को तय किया गया था।

जस्टिस पहल ने बड़े पैमाने पर होने वाली वित्तीय धोखाधड़ी के सामाजिक प्रभावों और कठोर कार्रवाई की आवश्यकता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

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“सफेदपोश अपराध (व्हाइट-कॉलर क्राइम) अब इतना व्यापक और भारी नुकसानदेह हो चुका है कि इससे सख्त और अटूट प्रवर्तन के साथ ही निपटा जाना चाहिए। कॉर्पोरेट धोखाधड़ी, गबन, इनसाइडर ट्रेडिंग और बड़े पैमाने पर वित्तीय धोखेबाजी लोगों की पेंशन, जीवनभर की बचत और आजीविका को इस हद तक बर्बाद कर देती है, जिसका नुकसान कई बार सड़कों पर होने वाले अपराधों से भी कहीं बड़ा होता है। इसके बावजूद ऐसे अपराधियों को अक्सर अपेक्षाकृत हल्की सजाएं मिलती हैं, ऐसे जुर्माने लगते हैं जिन्हें उनकी कंपनियां कारोबार की लागत मानकर वहन कर लेती हैं, या फिर ऐसे समझौते होते हैं जिनसे वे वास्तविक जवाबदेही से बच निकलते हैं। ऐसे अपराधों से कड़े हाथों से निपटना—जिसमें अनिवार्य रूप से जेल की सजा, कॉर्पोरेट ढाल की परवाह किए बिना अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करना, संपत्तियों की कुर्की और आक्रामक अभियोजन शामिल है—इस धारणा को समाप्त करेगा कि दौलत और रसूख से नरम किस्म का इंसाफ खरीदा जा सकता है। एक सख्त रुख यह स्पष्ट संदेश देता है कि आर्थिक अपराध, ठीक इसलिए क्योंकि उनके नुकसान अक्सर अदृश्य और बिखरे हुए होते हैं, किसी हथियार से किए गए अपराधों से कम गंभीरता के हकदार नहीं हैं।”

अदालत का निर्णय

अदालत ने पाया कि स्वतंत्र ऑडिट रिपोर्ट में आवंटियों के 126.30 करोड़ रुपये के डायवर्जन की बात स्थापित हुई है और साथ ही आवेदक के वकील भी “ट्रायल में टालमटोल कर रहे हैं।” इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने माना कि आवेदक को जमानत देने का यह उचित मामला नहीं है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया। हालांकि, अदालत ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि यदि कोई कानूनी अड़चन न हो, तो वह दोनों पक्षों को अनावश्यक स्थगन दिए बिना लंबित मामले का विधि अनुसार शीघ्रता से निस्तारण करे। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत अर्जी के निस्तारण तक ही सीमित हैं और मुकदमे के दौरान मामले के गुण-दोष पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: अनिल मिठास बनाम प्रवर्तन निदेशालय
वाद संख्या: क्रिमिनल मिस. बेल एप्लिकेशन संख्या 40366/2025
पीठ: जस्टिस कृष्ण पहल
निर्णय की तिथि: 16 सितंबर 2026

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